‘बरुआ’ की ‘हवा’: बाहरी ‘बाधा-हवा’ की चपेट में इंदौर
KHULASA FIRST
संवाददाता

नए प्रदेश अध्यक्ष की नई कार्यसमिति की पहली बैठक के बाद फिर जागी इंदौर की उम्मीदें
मौजूदा दावेदारों से हटकर अब नए नाम को लेकर सरकार व संगठन सक्रिय
बड़े नेताओं के परस्पर टकरा रहे हित, बार-बार टल रही आईडीए अध्यक्ष के नाम की घोषणा
‘लाभ के पद’ के लिए विधायकों की हुई खेमेबंदी, सांसद, मंत्री, मेयर ने ओढ़ रखी है खामोशी
ताजा हालातों में अब तो प्राधिकरण की कुर्सी के लिए ‘सरकार’ व ‘संगठन’ भी हुए ‘आमने-सामने’
आपसी लड़ाई में एक बार फिर प्राधिकरण की कमान इंदौर के बाहर के नेता को देने की सुगबुगाहट
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर विकास प्राधिकरण की कुर्सी के तमाम दावेदार भी ‘उकता’ गए हैं कि ‘अब तो हद हो गई, देते हो तो वक्त पर क्यों नहीं देते। बात भी सही है, मिशन-2028 में अब महज दो-ढाई बरस शेष हैं।
इसमें भी चुनावी आचार संहिता के दिन-महीने की बंदिशें जोड़ लें तो अब तमाम निगम, मंडल, आयोग व प्राधिकरण के अध्यक्ष के लिए कुछ कर दिखाने के लिए वक्त नहीं बचा। बावजूद इसके अध्यक्ष की कुर्सी व डायरेक्टर मंडल में समा जाने की दावेदारों में ललक बरकरार है। ‘सरकार’ व ‘संगठन’ के इर्द-गिर्द मंडराते, डोलते, दंडवत करते दावेदार इस बात के भी गवाह हैं कि वाकई कुर्सी ‘लाभ के पद’ की ही है।
अब ‘लाभ’ है तो न सिर्फ क्षत्रपों, बल्कि ‘सरकार’ व ‘संगठन’ में भी ठन जाती है। ये ठनठनाहट अपने आदमी को कुर्सी पर देखने की है। इसी ‘अपने’ के लिए जिनमें अपनापन था, वे बड़े नेता एक-दूजे से अदावत पर आमादा हैं।
ये हाल समूचे सूबे के हैं। इंदौर इससे अछूता नहीं। यहां सबसे ज्यादा चर्चा प्राधिकरण अध्यक्ष यानी चेयरमैन की है। किसके हाथ में होगी कमान? कौन गुट का होगा अध्यक्ष? किस क्षत्रप ने मारी बाजी? सरकार की चली या संगठन की? सिद्धांत चले कि परिवारवाद और भाई-भतीजावाद चला। ये कयास ‘पहलवान’ के आगमन से ही चल रहे हैं कि आईडीए में कौन आएगा?
हर दूसरे महीने कमलदल की सरकार निगम मंडल, प्राधिकरण, आयोग वगैरह में नियुक्ति करती नजर आती है। ‘खाली पड़े पद भरे जाएंगे’ के रस्मी बयान जारी होते ही कागजी घोड़े दौड़ने लगते। कलमें दावेदारों के दम तौलने और ‘जिधर दम-उधर हम’ का समवेत गान गाने लग जाती हैं।
जो 20-30 साल से एक के बाद एक पद पा रहे हैं, वे एक बार फिर लाभ की कुर्सी के लिए लालायित हैं। कुछ ‘चिरलाभार्थी’ हैं। ऐसे ही घर बैठे लाभार्थी जब भी सरकार या संगठन की तरफ से देने की बारी आती है तो ‘देने वाला श्री भगवान’ की तर्ज पर फिर याचक बने हुए हैं। इस मसले पर विधायकों के खेमे बन गए हैं। गुटीय घमासान इस कदर हो गए कि इंदौर के मामले में अब तो सरकार व संगठन भी आमने-सामने हैं।
‘पार्टी विथ ए डिफरेंस’ का दम भरने वाले दल में इंदौर विकास प्राधिकरण अध्यक्ष को लेकर इसी तरह शह-मात का खेल चल रहा है। कई बार लगा कि फैसला बस हो गया, घोषणा की देर है, लेकिन फिर बात महीनों टल जाती।
अब बीते एक-दो दिन से एक बार फिर अध्यक्ष की सुरसुरी चली है। सुरसुरी ने रफ्तार इसलिए पकड़ी कि इसमें पारंपरिक दावेदारों को धता बताते हुए एकदम एक ‘भाई साहब’ अध्यक्ष के नाम से प्रकट हो गए।
इन भाई साहब के सामने आते ही इंदौर भाजपा में सन्नाटे खिंच गए। ऐसे ही एक भाई साहब के जरिये इंदौर भाजपा पहले लुट-पिट चुकी है। ये वाले भाई साहब भी उन्हीं के पद-कद के समकक्ष रहे हैं। फिलहाल प्रदेश भाजपा में उपाध्यक्ष हैं और संगठन मुखिया की प्रबंधन की भूमिका से जुड़े हैं।
ये ‘भाई साहब’ हाल ही इंदौर में डेरा डाले हुए थे। ‘सरकार’ भी इन्हें अपने साथ दशहरा मैदान से चिड़ियाघर तक लिए-लिए फिर रही थी। माननीय ने पार्टी के झंडावंदन में भी हिस्सा लिया और सरकार के साथ वे मंच, स्थान भी शेयर किए, जो सरकार की अगुआई में शहर के डेवलपमेंट से जुड़े थे।
इस बीच भाई साहब ने जनता से चुने गए चुनिंदा नुमाइंदों से अलग से बात भी की। इसके बाद ‘सरकार’ इन्हें स्वयं ‘चित्रकूट’ लेकर अपने साथ गई। वहां ‘बड़े भाई साहब’ से मेल-मुलाकात हुई।
यही नहीं, भाई साहब ने इंदौर के महालक्ष्मी नगर इलाके में एक दोमंजिला घर भी किराए से ले लिया है। अब इतना सब एकाएक हुआ तो ‘सुरसुरी’ तो चलना ही थी कि इस बार इंदौर ‘बरुआ’ की ‘हवा’ की चपेट में आ गया है।
स्थानीय भाजपा नेताओं में पसरे परस्पर मतभेद के बीच एक बार फिर अहिल्यानगरी में इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष की सुरसुरी चली है। ऐसी सुरसुरी अब भाजपा में नई बात नहीं, बल्कि न सिर्फ पार्टीजन, बल्कि आमजन भी अब भाजपा की लेटलतीफी से आजिज आ गए।
शिवराजसिंह चौहान के दौर से ही पार्टी कार्यकर्ताओं व योग्य दावेदार को लाभ के पद को लेकर ऐसे ही ‘टुंगाने’ की प्रवृति चलन में आ गई है। ‘मामा’ भी एेन चुनाव मुहाने तक इंदौर विकास प्राधिकरण जैसे निगम, मंडल, प्राधिकरणों में नियुक्ति नहीं करते थे। इसी पटरी पर ‘पहलवान’ भी चल पड़े हैं।
लिहाजा अब इंदौर में, इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पर सरकार द्वारा नियुक्ति की खबरों पर चुट्कुले, मीम, रील चलते हैं। इस बार जो सुरसुरी चली, वह बता रही है कि इंदौर विकास प्राधिकरण की कुर्सी फिर एक बार ‘बाहरी बाधा’ और ‘बाहरी हवा’ की चपेट में आ सकती है। कारण है इंदौरी नेताओं के बीच की गुटबाजी।
क्या इंदौर भाजपा फिर ठगा जाएगी?
ये हवा भी बाहरी है, जो अकस्मात बवंडर जैसी इंदौर पर वैसे ही छाई है, जैसे पहले ‘देवास’ की छाई थी। इस ‘हवा’ को भी स्थानीय स्तर पर पार्टी नेताओं के बीच उपजे मतभेदों से हवा मिली है। ये ‘हवा’ भी उसी तरह सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा इंदौरी नेतृत्व को रोकने में इस्तेमाल की जा रही है, जैसे ‘मामा राज’ में हुआ था।
तब भी इंदौर के तमाम योग्य व दावेदार नेता ठगे-से रह गए थे और पड़ोस के शहर से लाकर एक ‘भाई साहब’ उनके सिर पर बैठा दिए गए थे। इस बार भी ठीक वैसा ही, हूबहू होने की संभावना से इंदौर भाजपा किंकर्त्तव्यविमूढ़ है। दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर का फायदा वाली ‘बंदरबांट’ का इंदौर फिर शिकार होगा या नहीं? इस पर अब भाजपा ही नहीं, इंदौर की नजरें भी हैं।
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