खाद्य सुरक्षा की कसौटी पर अंडा विवाद और नियामक जिम्मेदारी: बड़ा सवाल: हम विज्ञान को कितना समझते हैं
Khulasa First
संवाददाता

प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’ लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दिसंबर 2025 में आई एक लैब रिपोर्ट ने खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को लेकर व्यापक और तीखी बहस छेड़ दी। सोशल मीडिया पर यह आरोप तेजी से फैल गया कि बाजार में उपलब्ध अंडों में कैंसर उत्पन्न करने वाला रसायन पाया गया है। कुछ ही समय में यह विषय वैज्ञानिक पड़ताल से हटकर भय और संदेह के वातावरण में बदल गया।
उपभोक्ताओं में आशंका फैली, पोल्ट्री उद्योग संदेह के घेरे में आया और संपूर्ण तथ्यों के बिना ही निष्कर्ष तय किए जाने लगे। यह विवाद किसी एक उत्पाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने यह मूल प्रश्न खड़ा कर दिया कि हम खाद्य सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों को कितनी जिम्मेदारी और वैज्ञानिक दृष्टि से समझते हैं।
विवाद की जड़ एक प्रमुख ब्रांड (एग्गोज़) के कुछ चुनिंदा बैच में नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट्स (एओजेड) की अत्यंत कम मात्रा पाए जाने की रिपोर्ट थी। नाइट्रोफ्यूरान पुराना एंटीबायोटिक है, जिसका उपयोग अतीत में पोल्ट्री में संक्रमण नियंत्रण के लिए किया जाता था। इसके जीनोटॉक्सिक गुणों के कारण लंबे समय तक और अधिक मात्रा में सेवन को संभावित रूप से हानिकारक माना गया है।
इस वजह से भारत, यूरोपीय संघ, अमेरिका और अन्य कई देशों में पोल्ट्री और अंडा उत्पादन में इसका उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है। भारत में एफएसएसएआई के 2011 के नियम इसे स्पष्ट रूप से निषिद्ध घोषित करते हैं बावजूद कुछ रिपोर्टों को संदर्भ से काटकर ऐसे प्रस्तुत किया गया मानो नियमों की खुलेआम अवहेलना हो रही हो।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने 20 दिसंबर 2025 को जारी अपने आधिकारिक बयान में तथ्यात्मक और वैज्ञानिक स्पष्टीकरण दिया। एफएसएसएआई ने स्पष्ट किया नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट्स के लिए निर्धारित 1.0 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम की सीमा कोई स्वास्थ्य-आधारित सुरक्षित या असुरक्षित स्तर नहीं है।
यह एक नियामक संदर्भ मानक (ईएमआरएल - एक्सपेक्टेड मैक्सिमम रेज़िड्यू लेवल) है, जिसे आधुनिक प्रयोगशालाओं की अत्यधिक संवेदनशील जांच क्षमता को ध्यान में रखकर तय किया गया है। इस सीमा से नीचे पाई गई ट्रेस मात्रा न तो नियम उल्लंघन मानी जाती है और न ही इससे स्वास्थ्य को वास्तविक खतरा उत्पन्न होता है।
कुछ अलग-थलग बैचों में पाए गए ट्रेस अवशेषों को पूरे अंडा उद्योग से जोड़ना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है। ऐसे अवशेष कई बार चारे में अनजानी मिलावट, कच्चे माल की आपूर्ति से जुड़ी खामियों या किसी विशिष्ट उत्पादन चरण की तकनीकी समस्या के कारण सामने आ सकते हैं।
इसे जानबूझकर की गई मिलावट या संगठित लापरवाही के रूप में प्रस्तुत करना न केवल भ्रामक बल्कि उद्योग और उपभोक्ता, दोनों के खिलाफ है। नियामक तंत्र का उद्देश्य जोखिम की पहचान करना है, न कि अप्रमाणित आशंकाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालना। जन स्वास्थ्य दृष्टिकोण से भी स्थिति स्पष्ट है।
कैंसर का कारण नहीं नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट्स
एफएसएसएआई ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा ट्रेस स्तर पर नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट्स के सेवन और कैंसर या अन्य गंभीर बीमारियों के बीच कोई प्रत्यक्ष और प्रमाणित संबंध स्थापित नहीं हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (ईएफएसए) और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने भी सामान्य अंडा खपत को स्वास्थ्य जोखिम से नहीं जोड़ा है।
भारत का खाद्य सुरक्षा ढांचा वैश्विक मानकों के अनुरूप है और जोखिम मूल्यांकन में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहमति को आधार बनाता है। यह विवाद वास्तव में सोशल मीडिया के दौर में सूचना के प्रसार की एक गंभीर समस्या का खुलासा करता है। अधूरी जानकारी, तकनीकी शब्दों की गलत व्याख्या और सनसनीखेज प्रस्तुतिकरण आम जनता में अनावश्यक भय पैदा कर देते हैं।
विज्ञान संभावनाओं नहीं प्रमाणों पर आधारित है। किसी भी रसायन की उपस्थिति मात्र से खतरा सिद्ध नहीं होता, उसका स्तर, संपर्क अवधि और वास्तविक प्रभाव, ये सभी कारक निर्णायक होते हैं। इस बुनियादी वैज्ञानिक समझ के अभाव में फैलाया गया डर जनस्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह बन जाता है।
भारत जैसे देश में, जहां पोषण और खाद्य उपलब्धता पहले से ही एक चुनौती है, किसी भी खाद्य पदार्थ को लेकर फैलाई गई गलत जानकारी व्यापक प्रभाव डाल सकती है। बिना ठोस वैज्ञानिक आधार के उपभोक्ता व्यवहार में अचानक बदलाव न केवल उद्योग को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि खाद्य विकल्पों पर असंतुलन भी पैदा करता है। इसलिए यह आवश्यक है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों में जिम्मेदार संवाद हो, न कि वायरल कंटेंट के आधार पर निष्कर्ष।
इस प्रकरण का सबसे सकारात्मक पक्ष यह रहा कि खाद्य सुरक्षा से जुड़ा निगरानी तंत्र और अधिक सतर्क तथा सक्रिय हुआ। एफएसएसएआई ने देशव्यापी व्यापक सैंपलिंग और वैज्ञानिक जांच का अभियान आरंभ कर स्पष्ट किया नियामक संस्थाएं किसी भी आशंका को हल्के में नहीं लेतीं।
यह पहल पोल्ट्री उद्योग के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है चारे की गुणवत्ता, उत्पादन प्रक्रियाओं और आपूर्ति श्रृंखला में पूर्ण पारदर्शिता अब अनिवार्य है साथ ही, उपभोक्ताओं के लिए भी यह समझना जरूरी है खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अंतिम और विश्वसनीय निष्कर्ष केवल आधिकारिक वैज्ञानिक संस्थानों से ही प्राप्त होते हैं।
विवाद फिर स्पष्ट करता है खाद्य सुरक्षा की बुनियाद भय, आशंकाओं या अफवाहों पर नहीं, बल्कि ठोस वैज्ञानिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित है। एफएसएसएआई की संतुलित, तथ्यपरक और समयबद्ध प्रतिक्रिया ने न केवल भ्रम दूर किया, बल्कि इस विश्वास को भी सुदृढ़ किया नियामक संस्थाएं जनस्वास्थ्य की रक्षा के प्रति सतर्क, जिम्मेदार और सक्षम हैं।
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