दूषित पानीकांड की जांच रिपोर्ट से मचा बवाल: टेंडर से पाइपलाइन तक कई स्तरों पर लापरवाही; इतने दिनों की देरी पर उठे सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में एक सदस्यीय जांच आयोग की अंतिम रिपोर्ट सामने आने के बाद बवाल मच गया है। अब जिम्मेदारी तय करने का मुद्दा गरमा गया है।
रिपोर्ट ने इस त्रासदी को किसी एक अधिकारी की चूक नहीं माना है, बल्कि इंजीनियरिंग, पाइपलाइन मेंटेनेंस, निगरानी और टेंडर प्रक्रिया में लंबे समय से चली आ रही खामियों को प्रमुख वजहों में शामिल किया है।
रिपोर्ट में पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया में करीब 600 दिन की देरी और टेंडर प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में कुल 859 दिन से अधिक की देरी का उल्लेख है।
रिपोर्ट के मुताबिक, लीकेज और पानी की गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं की जानकारी सामने आने के बावजूद समय पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
अब सवाल यह है कि रिपोर्ट में सामने आई जिम्मेदारियों के आधार पर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई होगी या आपराधिक जांच भी शुरू की जाएगी।
पाइपलाइन की निगरानी और समय पर मरम्मत की जिम्मेदारी
जांच आयोग ने सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव की भूमिका पर विशेष टिप्पणी की है। वे वर्ष 2013 से 2026 तक संबंधित व्यवस्था में पदस्थ रहे।
रिपोर्ट के मुताबिक पाइपलाइन की नियमित जांच, लीकेज की पहचान, प्रिवेंटिव मेंटेनेंस और क्षतिग्रस्त लाइन को समय पर बदलना उनकी जिम्मेदारी से जुड़ा था। आयोग ने इन कामों में कमी के साथ पाइपलाइन रिप्लेसमेंट की प्रक्रिया में हुई लंबी देरी का भी उल्लेख किया है।
टेंडर प्रक्रिया में भी लंबी देरी
रिपोर्ट में टेंडर शाखा से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आई है। प्राग्य तिवारी, असिस्टेंट ग्रेड-III और नीति चौरसिया खरे, सब इंजीनियर को टेंडर से जुड़े कामों में हुई देरी के संदर्भ में जिम्मेदार माना गया है।
हालांकि आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन चरणों में फाइल उच्च अधिकारियों के स्तर पर लंबित रही, वहां संबंधित अधिकारियों की भूमिका अलग से देखी जानी चाहिए।
वहीं रोहित सिसोनिया और आशीष पाठक से जुड़े कुछ चरणों में हुई देरी को आयोग ने सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के दायरे में माना है।
नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव को घटना और टेंडर देरी की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी से मुक्त रखा गया है। लीकेज और पानी की गुणवत्ता की जानकारी के बावजूद कार्रवाई में देरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकारियों के संज्ञान में पाइपलाइन लीकेज, पानी में बदबू और बैक्टीरिया से जुड़ी समस्याएं थीं। इसके बावजूद समय रहते ऐसी कार्रवाई नहीं हुई, जिससे दूषित पानी की समस्या को रोका जा सके।
रिपोर्ट में तत्कालीन अपर कमिश्नर भव्या मित्तल, रोहित सिसोनिया, प्रभारी असिस्टेंट इंजीनियर सरोज कुमार प्रजापति, सब इंजीनियर शुभम श्रीवास्तव, असिस्टेंट इंजीनियर योगेश जोशी, प्राग्य तिवारी और नीति चौरसिया की भूमिकाओं का उल्लेख किया गया है।
इन सभी की जवाबदेही और आगे की कार्रवाई का निर्धारण संबंधित जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होगा।
2019 की पानी जांच रिपोर्ट भी बनी अहम कड़ी
आयोग ने वर्ष 2019 में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से की गई पानी की जांच को भी महत्वपूर्ण माना है। रिपोर्ट के अनुसार उस समय लिए गए कई पानी के नमूने निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए थे।
इससे यह सवाल भी उठता है कि शुरुआती संकेत मिलने के बावजूद बाद के वर्षों में पानी की सप्लाई व्यवस्था में स्थायी सुधार क्यों नहीं किया गया।
30 साल पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था पर भी सवाल
जांच में पुराने इंजीनियरिंग नेटवर्क को भी महत्वपूर्ण कारण माना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्र में 1990-95 के दौरान सीवरेज नेटवर्क और 1999-2004 के बीच पेयजल पाइपलाइन बिछाई गई थी।
कई स्थानों पर सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन एक-दूसरे के बेहद करीब या क्रॉसिंग में पाई गईं। ऐसी स्थिति में पाइपलाइन में लीकेज होने पर दूषित पानी के पेयजल लाइन में पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।
यानी मौजूदा घटना के पीछे केवल हाल की लापरवाही नहीं, बल्कि पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर और लंबे समय से चली आ रही मेंटेनेंस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
एक्सपर्ट बोले- जांच रिपोर्ट के आधार पर तय हो आपराधिक जिम्मेदारी
सीनियर एडवोकेट मनीष यादव के मुताबिक, यदि जांच रिपोर्ट में किसी अधिकारी या कर्मचारी की ऐसी लापरवाही सामने आती है, जिसका सीधा संबंध मौतों से स्थापित होता है, तो मामले की आपराधिक जांच भी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवल विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। हालांकि किस व्यक्ति पर कौन-सी आपराधिक धारा लागू होगी, यह पुलिस की जांच, साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तय होगा।
उनके मुताबिक रिपोर्ट में जिन लोगों की भूमिका सामने नहीं आई है, यदि आगे की जांच में उनके खिलाफ भी तथ्य सामने आते हैं तो उन्हें भी जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए।
मुआवजे को लेकर भी उठी मांग
भागीरथपुरा कांड में मृतकों के परिजन को दिए गए मुआवजे को बढ़ाने की मांग भी उठी है। एडवोकेट यादव ने मृतकों के परिवारों को दिए गए 2 लाख रुपए के मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की है। दूषित पानी से बीमार हुए लोगों के लिए भी मुआवजा बढ़ाने की बात कही गई है।
अब रिपोर्ट के बाद अगली कार्रवाई पर नजर
जांच आयोग की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि भागीरथपुरा की त्रासदी को केवल एक दिन की गलती के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था, लीकेज, मॉनिटरिंग की कमी, मेंटेनेंस में देरी और टेंडर प्रक्रिया में लंबा समय, इन सभी कड़ियों को रिपोर्ट में जोड़ा गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन और जांच एजेंसियां आगे क्या कार्रवाई करती हैं। क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर केवल विभागीय कार्रवाई होगी या आपराधिक जवाबदेही भी तय की जाएगी? यही कार्रवाई इस रिपोर्ट की वास्तविक गंभीरता और उसके असर को तय करेगी।
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