कंधों पर साथी की अर्थी: आंखों में आंसू और दिल में कभी न भूल पाने वाला दर्द
KHULASA FIRST
संवाददाता

टीआई दिलीप पुरी की विदाई में वर्दी में छिपे जज्बात हुए आंखों से बयां
एसपी आदित्य मिश्रा ने दिया कंधा तो भावुक हुए सहकर्मी, निवर्तमान एसपी पुनीत गहलोत भी अपने आंसू नहीं रोक सके
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
वर्दी को अक्सर सख्त मिजाज, अनुशासन और कर्तव्य की मिसाल के रूप में देखा जाता है। अपराधियों के सामने मजबूती से खड़े रहने वाले, मुश्किल हालात में मोर्चा संभालने वाले और दूसरों को हिम्मत देने वाले ये लोग जब अपने किसी साथी को अंतिम विदाई देते हैं, तो उनके भीतर का इंसान भी सामने आ जाता है।
सोमवार को थाना प्रभारी दिलीप पुरी की अंतिम विदाई के दौरान ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। कंधों पर साथी की अर्थी थी, दूसरी तरफ आंखों में आंसू और मन में ऐसे सवाल, जिनका शायद किसी के पास कोई जवाब नहीं था। शराब माफिया के कारण एक निष्ठावान पुलिस अधिकारी की जान चली गई।
जिसके साथ बैठकर कभी अपराधियों के खिलाफ रणनीति बनाई होगी, मिलकर मुश्किल अभियानों को अंजाम दिया होगा, उन्हीं साथियों के हाथ अपने प्रिय सहकर्मी की अर्थी को कंधा दे रहे थे।
पुलिस की वर्दी पर लगे सितारे और कंधों पर लगे बैज उस वक्त मानो छोटे पड़ गए थे। एसपी आदित्य मिश्रा ने भी अर्थी को कंधा दिया। उनकी नम आंखें और चेहरे के भाव दुख को बयां कर रहे थे।
एक तस्वीर, जिसमें बहुत कुछ कह गई खामोशी... अंतिम विदाई के दृश्य उन रिश्तों की कहानी भी बयां कर रहे थे, जो साथ काम करते-करते बन जाते हैं। जब किसी साथी की अर्थी उठती है तो उसके साथ केवल शरीर विदा नहीं होता, बल्कि साथ बिताए गए दिन, साझा अनुभव, ड्यूटी के दौरान की गई बातचीत, मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ और अनगिनत यादें भी आंखों के सामने घूमने लगती हैं।
अर्थी को कंधा देने वाले पुलिसकर्मियों के मन में भी शायद यही भाव रहे होंगे कि कल तक जो साथी उनके साथ ड्यूटी पर था, वह हमेशा के लिए दूर जा रहा है। जिस आवाज को वायरलेस सेट पर सुनने की आदत थी, जिस अधिकारी के साथ किसी अभियान में जाने की तैयारी होती थी, उसकी जगह हमेशा खाली रहेगी।
पुनीत गहलोत भी नहीं रोक सके अपने आंसू... इस विदाई का एक और भावुक पहलू निवर्तमान एसपी पुनीत गहलोत रहे रहा। दिलीप पुरी के निधन की खबर ने उन्हें भी भीतर तक झकझोर दिया।
अपने साथी अधिकारी को अंतिम विदाई देते समय उनकी आंखों से भी आंसू छलक पड़े। करीब दो महीने पहले पुनीत गहलोत ने ही दिलीप पुरी को खातेगांव थाना प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी थी। जिस अधिकारी को उन्होंने कुछ समय पहले ही नई जिम्मेदारी के साथ थाने की कमान सौंपी थी, उसी की पार्थिव देह के सामने खड़े होकर उन्हें अंतिम विदाई देनी पड़ रही थी।
एक वरिष्ठ अधिकारी के लिए यह क्षण कितना पीड़ादायक रहा होगा, इसका अंदाजा उनकी नम आंखों से लगाया जा सकता है। प्रशासनिक व्यवस्था में पदस्थापना और जिम्मेदारी सौंपना एक सामान्य प्रक्रिया होती है, लेकिन इस प्रक्रिया के बीच बनने वाला विश्वास और पेशेवर जुड़ाव कई बार गहरे मानवीय रिश्तों में बदल जाता है। गहलोत की आंखों से निकले आंसू भी इसी भावनात्मक जुड़ाव को बयां कर रहे थे।
फूलों से सजी अर्थी, पुष्पहारों से श्रद्धांजलि और हर चेहरे पर उदासी... अंतिम विदाई के दौरान पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों ने दिवंगत दिलीप पुरी के पार्थिव शरीर पर पुष्पहार अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
हर कोई अपने तरीके से अंतिम सलाम कर रहा था। किसी ने हाथ जोड़कर नमन किया, किसी ने पुष्प अर्पित किए तो किसी ने कंधा देकर अंतिम कर्तव्य निभाया। उस समय वहां मौजूद लोगों के लिए शब्दों से अधिक मौन बोल रहा था।
दिलीप पुरी ने ड्यूटी के दौरान अवैध शराब तस्करी के खिलाफ कार्रवाई कर जान गंवाई। शराब से भरे ट्रक का पीछा करने के दौरान हुए दर्दनाक घटनाक्रम ने महकमे को झकझोर दिया, लेकिन अंतिम विदाई के दृश्य ने इस घटना का एक दूसरा पक्ष भी सामने रखा।
अपराध और कानून व्यवस्था की चुनौति से रोज जूझने वाले पुलिसकर्मियों के जीवन में भी दोस्ती, अपनापन, संवेदना और बिछड़ने का दर्द उतना ही गहरा होता है, जितना किसी दूसरे परिवार में। आमतौर पर पुलिसकर्मियों को सख्त कार्यशैली के आधार पर देखा जाता है, लेकिन दिलीप पुरी की अंतिम विदाई ने याद दिलाया वर्दी भावनाओं को खत्म नहीं करती।
उसके पीछे भी परिवार होता है, रिश्ते होते हैं, दोस्त होते हैं और ऐसे साथी होते हैं, जिनके साथ जिंदगी का बड़ा हिस्सा ड्यूटी करते हुए गुजरता है। उस दिन कंधों पर अर्थी का भार था, लेकिन मन पर बिछड़ने का बोझ कहीं ज्यादा भारी था।
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