350 करोड़ की बेशकीमती जमीन का मामला: भूमाफिया के पक्ष में आया फैसला; प्रशासन की भूमिका पर सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अयोध्यापुरी की विवादित चार एकड़ जमीन को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में जिला अदालत ने प्रतीक संघवी, दीपक मद्दा के डायरेक्टर वाली कंपनी के पक्ष में फैसला दिया है।
रहवासी संघ का दावा खारिज
अदालत ने कंपनी के पक्ष में 24 फरवरी 2007 को हुई जमीन की रजिस्ट्री को वैध माना और अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ तथा देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था के दावों को खारिज कर दिया।
350 करोड़ रुपये बताई जा रही जमीन
संबंधित जमीन की मौजूदा बाजार कीमत करीब 350 करोड़ रुपये बताई जा रही है। जिला अदालत की न्यायाधीश डॉ. शुभ्रा सिंह ने 65 पन्नों के आदेश में कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि कंपनी को बेची गई चार एकड़ जमीन पर रहवासी संस्था के सदस्यों के भूखंड स्थित थे।
4 करोड़ रुपये में हुआ था जमीन का सौदा
विवादित जमीन मूल रूप से देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था से जुड़ी थी। जानकारी के मुताबिक, वर्ष 1986 में सीलिंग से मुक्त हुई 15.52 एकड़ जमीन संस्था ने धारा 20 के तहत खरीदी थी। इसमें कुल 369 प्लॉटधारक होने की बात कही गई है।
इन कंपनी को बेच दिया
हालांकि, मास्टर प्लान में जमीन का उपयोग स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों के लिए निर्धारित होने के कारण कॉलोनी की वैधता और नगर निगम की मंजूरी को लेकर विवाद सामने आया। फरवरी 2007 में संस्था ने इस जमीन में से चार एकड़ हिस्सा सिम्पलेक्स इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस कंपनी को बेच दिया।
सौदे की कीमत चार करोड़ रुपये तय हुई थी। भुगतान के लिए कंपनी की ओर से 20 चेक दिए जाने की बात सामने आई, लेकिन उपलब्ध विवरण के अनुसार इनमें से केवल 1.80 करोड़ रुपये के चेक ही भुगतान हुए और 2.20 करोड़ रुपये बकाया रह गए।
2008 में रहवासी संघ ने उठाया था सवाल
वर्ष 2008 में अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ का गठन हुआ। संघ ने दावा किया कि कंपनी को बेची गई चार एकड़ जमीन पर उसके सदस्यों के भूखंड हैं। इसी आधार पर कंपनी के पक्ष में हुए सौदे को अवैध बताते हुए शिकायतें की गईं।
दूसरी ओर, कंपनी ने जमीन पर अपना अधिकार जताते हुए जिला अदालत का रुख किया। मामले में एसडीओ इंदौर, कलेक्टर इंदौर, अयोध्यापुरी रहवासी समिति और देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था को पक्षकार बनाया गया था।
अदालत ने नक्शे और दस्तावेजों को माना अहम
अदालत के आदेश के मुताबिक, संस्था के पास कुल 6.75 लाख वर्गफीट जमीन थी। इसमें 1,250-1,250 वर्गफीट के भूखंड काटकर 178 सदस्यों को जमीन देने का उल्लेख किया गया है। इन भूखंडों का कुल क्षेत्रफल 2,22,500 वर्गफीट बताया गया है।
इसके बाद संस्था के पास करीब 4.53 लाख वर्गफीट जमीन बचने की बात कही गई। आदेश के अनुसार, इसी शेष जमीन में से लगभग 1.74 लाख वर्गफीट हिस्सा कंपनी को बेचा गया था, जिसे चार एकड़ बताया गया है।
अदालत ने माना कि विवादित हिस्से पर संस्था के सदस्यों के भूखंड होने या उनकी रजिस्ट्री होने के पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए।
जमीन का स्पष्ट नक्शा भी पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि कंपनी को बेची गई जमीन और सदस्यों को आवंटित भूखंड एक ही स्थान पर हैं।
इसी आधार पर रहवासी संघ का दावा स्वीकार नहीं किया गया।
2020 में भूमाफिया कार्रवाई के दौरान दर्ज हुआ था केस
वर्ष 2020 में तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह के कार्यकाल में भूमाफिया के खिलाफ कार्रवाई के दौरान इस जमीन से जुड़े मामले में प्रतीक संघवी, दीपक मद्दा और मुकेश खत्री के खिलाफ धोखाधड़ी सहित विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई थी।
यह कार्रवाई संस्था के सदस्यों की जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े आरोपों के संदर्भ में हुई थी। वर्तमान में जिला अदालत के फैसले में विवादित चार एकड़ जमीन की रजिस्ट्री को वैध माना गया है।
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