आठ माह में बहुत कुछ बदल जाएगी भाजपा की राजनीति
KHULASA FIRST
संवाददाता

इस बार 85 में से लगभग 55 सीटों पर बदले जा सकते हैं उम्मीदवार
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर भाजपा की राजनीति अगले 8 माह में बहुत कुछ बदल जाएगी। कई ताकतवर नेता कमजोर हो जाएंगे और कई कमजोर नेता ताकतवर बन जाएंगे। ये सारा गणित निगम चुनाव से बदलेगा, जो कि अगले वर्ष मई में होंगे। इससे पूर्व अप्रैल की शुरुआत में ही आचार संहिता लग जाएगी। यानी नेता जो भी करना चाहेंगे, उनके लिए अधिकतम 8 माह का समय है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि शुरुआती दौर में राजनीति के कच्चे खिलाड़ी माने जा रहे महापौर पुष्यमित्र भार्गव अब पूरी तरह मंज गए हैं और उन्होंने अपने समर्थकों को पूरे शहर में फैला लिया है। हर क्षेत्र में उनके समर्थक बन गए हैं। जब टिकट बंटवारे की बात होगी तो वे अपने समर्थकों के लिए लड़ेंगे।
ये उनके भावी राजनीतिक जीवन का बड़ा संघर्ष होगा। वे क्षेत्र-4 से या खरगोन से चुनाव लड़ने की प्लॉनिंग कर रहे हैं। हालांकि समर्थक पार्षदों का कहना है कि वे अगले लोकसभा उम्मीदवार भी हो सकते हैं। यानी उनकी तगड़ी प्लॉनिंग है। ऐसे में समर्थकों को निगम चुनाव में अधिकाधिक टिकट दिलाने की कोशिश होगी।
सांसद शंकर लालवानी ने पिछली बार संध्या यादव, कंचन गिदवानी और मुद्रा शास्त्री को टिकट दिलवाने में सफलता हासिल कर ली थी और तीनों को जितवाया भी था। अब वे इनकी संख्या और बढ़ाना चाहते हैं।
उनके भी समर्थकों की संख्या हर क्षेत्र में है और यदि उन्हें लोकसभा चुनाव में टिकट मिलने या न मिलने की स्थिति दोनों में अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर काम करना है, तो ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को टिकट दिलाना होंगे।
इंदौर की बदली हुई राजनीतिक फिजा में लालवानी आजकल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के करीबी हैं। कोशिश होगी कि वे इस बार 10 से ज्यादा वार्डों में अपने समर्थकों को टिकट दिलाने की कोशिश करेंगे। मुख्यमंत्री से नजदीकी उनकी इस इच्छा में सहायक होगी।
इधर, शहर अध्यक्ष से प्रदेश भाजपा महामंत्री बनकर इंदौर की भाजपाई राजनीति में हलचल पैदा कर देने वाले गौरव रणदिवे और प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. निशांत खरे को भी अपनी ठोस राजनीतिक जमीन की तलाश है।
दोनों नेता क्षेत्र-5 से तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि वर्तमान विधायक महेंद्र हार्डिया अब चुनाव लड़ने से इनकार कर चुके हैं। दोनों नेताओं के समर्थकों की संख्या कम नहीं है और वे भी बड़ी संख्या में निगम चुनाव में टिकट चाहेंगे। दोनों के समर्थक अधिकतर क्षेत्र-5 में निवास करते हैं। दोनों सत्ता-संगठन के शीर्ष नेतृत्व के नजदीकी हैं। वे टिकटों के लिए दबाव बनाएंगे।
मंत्री तुलसी सिलावट के टिकट पर एक तरह से दिग्विजय सिंह रोक का संकेत दे चुके हैं। गत दिनों एयरपोर्ट पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात के बाद बाहर निकले दिग्विजय ने सावन सोनकर को सामने देख कहा था कि तुम सांवेर से तैयारी करो, तुलसी को इस बार टिकट नहीं मिलेगा।
इससे इंदौर से भोपाल तक हलचल मच गई थी। यदि उन्हें टिकट नहीं मिला तो अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखने के लिए वे विधानसभा चुनाव के पूर्व होने वाले निगम चुनाव में अपने समर्थकों को टिकट दिलाना चाहेंगे।
नगराध्यक्ष सुमित मिश्रा के समर्थकों की भी भारी-भरकम संख्या शहर में बन गई है और वह भी अपने समर्थकों को निराश नहीं करना चाहेंगे। उनके सभी गुटों के नेताओं के साथ बेहतरीन समन्वय के बल पर वे समर्थकों को टिकट दिलवाने की कोशिश करेंगे।
मुख्यमंत्री का होगा सीधा दखल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इंदौर के प्रभारी मंत्री हैं। इस लिहाज से प्रत्याशियों के चयन में उनकी भूमिका बहुत ज्यादा होगी। स्थानीय नेताओं से भी ज्यादा। हालांकि वे किसी को नाराज न करने की नीति के चलते समन्वय बनाकर ही काम करेंगे।
ये तो रिपीट होना ही हैं...कहा जा रहा है कि इस बार भाजपा 85 में से लगभग 55 सीटों पर बदलाव करेगी। यानी नए नेताओं को मौका देगी। ऐसी स्थिति में जो रिपीट होंगे, उनमें क्षेत्र-1 के शिवम यादव शामिल हैं, जो वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व पार्षद केके यादव के पुत्र हैं और जीते भी कांग्रेस के टिकट पर ही थे, लेकिन अब भाजपा के साथ हैं।
क्षेत्र-2 से पूजा पाटीदार, राजेंद्र राठौर और मनोज मिश्रा के टिकट कटना मुश्किल हैं ही। क्षेत्र-3 में गोलू शुक्ला पहली बार के विधायक हैं। उनके समर्थकों की एक बड़ी संख्या पूर्व विधायक आकाश विजयवर्गीय के साथ है। माना जा रहा है कि वे अपने क्षेत्र के विभिन्न वार्डों में नए प्रत्याशियों को मैदान में उतारेंगे। इस बार युवा नेतृत्व आगे लाने की कोशिश होगी।
विधायक मालिनी गौड़ एक बार फिर युवा और अनुभवी कार्यकर्ताओं पर भरोसा करेंगी, ऐसा माना जा रहा है। राऊ में मधु वर्मा पहली बार के विधायक हैं और माना जा रहा है कि वे भी नए नेताओं को आगे लाकर समर्थकों की बड़ी टीम तैयार करेंगे। हालांकि अभिषेक बबलू शर्मा और प्रशांत बड़वे को लेकर कहा जा रहा है कि वे निगम के बजाय विधानसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं।
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