बाबा महाकाल की आ रही है पालकी: काल के स्वामी का जन-दरबार; आस्था, परंपरा और छह सोमवार की गाथा
KHULASA FIRST
संवाददाता

अवंतिका के ‘नाथ’ जब अपनी प्रजा का हाल पूछने निकलते हैं शहर की सड़कों पर
कालचक्र के स्वामी का नगर-उत्सव, जब चांदी की पालकी में विराजते हैं महाकाल
ढोल की थाप पर धड़कती अवंतिका की विरासत, शिप्रा के तट पर समय की अमर परिक्रमा
गुलाल से रंग जाएंगी सड़कें, मोक्षदायिनी के तट पर उमड़ेगा श्रद्धा का सैलाब
जहां रुक जाता है समय का पहिया अवंतिका की गलियों में गूंजेगा ‘महाकाल’ का हुक्म
प्रजा के द्वार ‘राजा’ का पहरा शंख, भस्म और चांदी की पालकी में सिमटा सावन
मराठा ढालों से लोकतंत्र की सलामी तक राजाधिराज महाकाल की राजसी नगर परिक्रमा
नागपंचमी का योग, भादौ की विदाई इस बार क्यों खास है महाकाल का नगर-भ्रमण
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
सावन का मेघ जब काल भैरव की भूमि पर पहला जल-बिंदु गिराता है, तो महाकालेश्वर मंदिर के अलौकिक और विशाल प्रांगण में एक अजीब-सी थिरकन तैरने लगती है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा की आहट नहीं, यह उस अनादि उत्सव का न्योता है, जहां समय खुद हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है।
इस वर्ष 3 अगस्त से शुरू होकर 7 सितंबर तक चलने वाला यह छह हफ्तों का कालखंड ज्योतिर्लिंग नगरी उज्जैन के लिए केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं। यह वो दौर है जब राजाधिराज महाकाल अपने गर्भगृह के एकांत को छोड़कर, मिट्टी और पसीने से रची अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने सड़कों पर उतर आते हैं।
धर्मधानी उज्जैन में इस वर्ष बाबा महाकाल की कुल छह सावन-भादौ सवारियां निकाली जाएंगी। हर सोमवार को जब पालकी के कपाट खुलेंगे तो श्रद्धालुओं को भगवान के अलौकिक मुखारविंद के दर्शन होंगे।
इतिहास के झरोखे से-जब मराठा ढालों ने दिया राजकीय वैभव... अवंतिका की गलियों में गूंजती इस परंपरा का ताना-बाना इतिहास और लोक-आस्था से मिलकर बना है। 18वीं सदी के उस दौर की कल्पना कीजिए, जब मालवा राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहा था।
तब सिंधिया राजवंश के संस्थापक राणोजी सिंधिया और उनके चतुर अमात्य रामचंद्र बाबा शेणवी ने न केवल खंडित महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, बल्कि इस नगर की आत्मा को एक नया संकल्प दिया।
मराठा शासकों ने एक अनूठा जन-संदेश दिया-‘अवंतिका का वास्तविक राजा कोई नश्वर इंसान नहीं, बल्कि भगवान महाकाल हैं।’ उसी दौर में सवारी को ‘राजकीय संरक्षण’ मिला, जो आज भी बदस्तूर जारी है। लोकतंत्र के इस आधुनिक युग में भी जब मध्य प्रदेश पुलिस बल के सशस्त्र जवान चांदी की पालकी के सामने अपनी बंदूकें झुकाकर ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ देते हैं, तो लगता है मानो 18वीं सदी का वह स्वाभिमान आज भी जीवंत हो उठा है।
शास्त्र से लोक तक: पुराणों की ‘अवंतिका’ का सच... ‘स्कंद पुराण’ के अवंतिका खंड और ‘शिव पुराण’ की ऋचाओं को पलटें, तो उज्जैन को ‘मोक्षदायिका’ कहा गया है। शास्त्रों में वर्णन है कि महाकाल इस नगरी के रक्षक हैं। यद्यपि आज जिस व्यवस्था से पालकी सजती है और ढोल-ताशों के साथ जुलूस निकलता है, उसका तकनीकी ब्यौरा प्राचीन पुराणों में नहीं मिलता, लेकिन इसका ‘दर्शन’ पूरी तरह पौराणिक है।
जब रामघाट पर क्षिप्रा का जल रजत-मुखारविंद को स्पर्श करता है, तो शास्त्रों में लिखी ‘अवंतिका रक्षा’ की अवधारणा सीधे धरातल पर उतर आती है। यह लोक और शास्त्र का वह दुर्लभ संगम है, जहां भक्ति किसी भाषा की मोहताज नहीं रहती।
सत्ता का समर्पण: जब मुख्यमंत्री भी बनते हैं आम ‘प्रजा’
महाकाल की इस शाही परंपरा का सबसे अद्भुत पहलू यह है कि यहां आधुनिक सत्ता का अहंकार पल भर में हवा हो जाता है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, जो स्वयं उज्जैन की माटी में जन्मे और पले-बढ़े हैं, इस सवारी में एकाधिक बार किसी प्रशासनिक प्रमुख की हैसियत से नहीं, बल्कि राजाधिराज के एक निष्ठावान प्रजाजन और डमरू-वादक के रूप में शामिल हुए हैं। वे न केवल सवारी के पूरे मार्ग में आम श्रद्धालुओं के साथ पैदल चलते हैं, बल्कि स्वयं झांज-मंजीरे और डमरू बजाकर भक्ति के इस उल्लास में लीन दिखाई देते हैं। उनका यह सहज रूप इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र का कोई भी ऊंचा पद क्यों न हो, अवंतिका की सीमा में प्रवेश करते ही हर कोई सिर्फ बाबा महाकाल का सेवक बनकर रह जाता है।
छह सवारियां और कारवां का विस्तार: मुखौटों की प्रामाणिक व्यवस्था
महाकाल की सवारी का एक ख़ास नियम है- हर सोमवार को लवाजमे में एक नया मुखारविंद और नया रथ जुड़ता जाता है, जिससे यह कारवां विशाल से विशालतम होता जाता है।
1. प्रथम सवारी (3 अगस्त )
श्रावण के प्रथम सोमवार को राजा महाकाल केवल एक रूप में नगर भ्रमण पर निकलते हैं। चांदी की पालकी में श्री मनमहेश का रजत मुखारविंद सवार रहता है।
2. द्वितीय सवारी (10 अगस्त )
इस सवारी से व्यवस्था बदलती है। चांदी की पालकी में श्री चंद्रमौलेश्वर विराजते हैं (जो आगे हर सवारी में पालकी में ही रहेंगे) और श्री मनमहेश का मुखारविंद पीछे गजरथ (हाथी) पर सवार हो जाता है। (कुल 2 स्वरूप)
3. तृतीय सवारी (17 अगस्त नागपंचमी संयोग)
इस बार पालकी और हाथी के साथ गरुड़ रथ जुड़ता है। पालकी में श्री चंद्रमौलेश्वर, हाथी पर श्री मनमहेश और गरुड़ रथ पर श्री शिव-तांडव का ओजस्वी मुखारविंद चलता है। (कुल 3 स्वरूप)
4. चतुर्थ सवारी (24 अगस्त)
लवाजमे में नंदी रथ शामिल होता है। पालकी (चंद्रमौलेश्वर), हाथी (मनमहेश) और गरुड़ रथ (शिव-तांडव) के साथ नंदी रथ पर श्री उमा-महेश का दिव्य स्वरूप विराजित होता है। (कुल 4 स्वरूप)
5. पंचम सवारी (31 अगस्त - भादौ प्रथम सोमवार)
इस दिन कारवां में डोल रथ जुड़ता है, जिस पर होल्कर स्टेट द्वारा प्रदत्त ‘श्री होल्कर स्टेट का मुखारविंद’ विराजमान होता है। (कुल 5 स्वरूप)
6. छठी एवं अंतिम राजसी सवारी (7 सितंबर)
यह वर्ष का सबसे भव्य रूप होता है। पांचों लवाजमों के साथ पांचवां रथ भी शामिल होता है, जिस पर ‘श्री सिंधिया स्टेट का मुखारविंद’ सवार होता है। इस प्रकार सभी 6 दिव्य स्वरूप एक साथ नगर परिक्रमा करते हैं।
नागपंचमी का दुर्लभ संयोग और 7 सितंबर का महाकुंभ
इस बार 17 अगस्त (तीसरी सवारी) का दिन बेहद खास है, क्योंकि इसी दिन नागपंचमी का महापर्व भी है। मंदिर के शिखर पर स्थित ‘नागचंद्रेश्वर मंदिर’ के कपाट साल में केवल इसी दिन खुलते हैं। ऐसे में पालकी में ‘शिव-तांडव’ रूप के दर्शन और ऊपर नागचंद्रेश्वर की उपस्थिति उज्जैन को एक अलौकिक ऊंचाई पर ले जाएगी। वहीं 7 सितंबर को निकलने वाली ‘शाही सवारी’ आस्था का चरम बिंदु होगी। गुदरी चौराहा, बख्शी बाजार और रामघाट की संकरी गलियों में तिल रखने की जगह नहीं होगी। छज्जों से बरसती गुलाब की पंखुड़ियां, अबीर-गुलाल के उड़ते बादल और क्षिप्रा के तट पर गूंजते ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे पूरे शहर को एक वृहद मंदिर में बदल देंगे।
परंपरा का निर्वहन: सिंधिया राजवंश की भेंट और अटूट नाता
18वीं सदी से चली आ रही इस राजकीय परंपरा की कड़ियों को सिंधिया राजघराना आज भी पूरी शिद्दत से जोड़े हुए है। राजवंश के वर्तमान प्रतिनिधि (केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं उनका परिवार) विशेष रूप से सवारी में शामिल होने उज्जैन पहुंचते हैं। पूजन-अर्चन के दौरान सिंधिया परिवार की ओर से भगवान महाकाल को पारंपरिक रेशमी वस्त्र, छत्र और विशेष भेंट अर्पित की जाती है। ‘रामघाट’ पर क्षिप्रा नदी के तट पर जब सिंधिया परिवार पालकी का पूजन कर राजशाही जमाने के ऐतिहासिक संबंधों को पुनर्जीवित करता है, तो अतीत और वर्तमान का यह संगम पूरे माहौल में एक अलग ही गरिमा और राजकीय वैभव भर देता है।
जब 7 सितंबर की देर रात राजसी सवारी वापस गर्भगृह पहुंचेगी, तो गलियों में छूटा गुलाल शांत हो जाएगा, लेकिन उज्जैन की धड़कनों में वह गूंज पूरे साल जिंदा रहेगी- ‘राजा महाकाल की जय!’
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