‘राज’ के लिए ‘अराजकता’: आंदोलन का आज ‘टी ब्रेक’; राहुल ने विपक्षी नेताओं को अपने घर चाय पर बुलाया
KHULASA FIRST
संवाददाता

सड़कों पर संग्राम, विदेशी शक्तियों का हाथ, विपक्ष के आंदोलनों पर छिड़ी ‘नैरेटिव’ की जंग
सत्तापक्ष का गंभीर आरोप- ‘विदेशी ताकतों के इशारे पर देश में अस्थिरता और अराजकता फैलाने की कोशिश’
विपक्ष का पलटवार- ‘महंगाई, बेरोजगारी और जन-मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए गढ़े जा रहे मनगढ़ंत आरोप’
भाजपा बोली- ‘राहुल गांधी मानसिक संतुलन खो चुके, न्यायपालिका के खिलाफ धरना प्रदर्शन इसका सबूत’
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में राहुल और विपक्षी नेताओं की याचिका में एक-दो नहीं, 14 गलतियां
प्रतिबंध के बावजूद जंतर मंतर पर फिर पहुंचे ‘कॉकरोच’, हिरासत में लिए गए सौरव दास व आशुतोष रांका
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राहुल गांधी और ‘इंडिया’ गठबंधन के नेतृत्व में देश की सड़कों पर चल रहे निरंतर आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों ने राष्ट्रीय राजनीति के पारे को गरमा दिया है। एक ओर जहां इन आंदोलनों को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी जारी है, वहीं अब इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़े ‘विमर्श युद्ध’ यानी नैरेटिव वॉर का रूप ले लिया है।
भाजपा और सत्तापक्ष के नीति-निर्धारकों ने विपक्ष पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि इन आंदोलनों का मूल मकसद देश की प्रगति को रोकना और बाहरी शक्तियों के दबाव में भारत में अराजकता का माहौल पैदा करना है।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस सहित समूचे ‘इंडिया’ गठबंधन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे सरकार की विफलताओं से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी रणनीति करार दिया है। भाजपा ने तो नेता प्रतिपक्ष को पागल करार देते हुए ये आरोप भी लगाया कि राहुल गांधी अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट तक धरना प्रदर्शन इस बात का सबूत है। इस बीच आज आंदोलन का ‘टी-ब्रेक’ हो गया है। राहुल ने आज शाम विपक्षी नेताओं को अपने घर चाय पर बुलाया है, जहां रणनीति बनेगी। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी ने आज सुबह प्रतिबंधित जंतर मंतर में प्रवेश का प्रयास किया। नतीजे में सीजेपी नेता सौरव दास व आशुतोष रांका को हिरासत में ले लिया गया।
क्या हिंदुस्तान की सड़कों पर राहुल गांधी की अगुआई में हो रहा आंदोलन देश को अस्थिर करने का प्रयास है? क्या राहुल गांधी व विपक्ष अपने राज के लिए देश को अराजकता में धकेल रहे हैं? क्या विदेशी ताकतें राहुल गांधी व इंडिया गठबंधन के जरिये भारत का हाल भी नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान व वेनेजुएला जैसा करना चाहती हैं?
ये तमाम सवाल देश की राजधानी में 2 अक्टूबर से चल रहे प्रदर्शन, आंदोलन व लांग मार्च से निकलकर समूचे देश के जनमानस को मथ रहे हैं। सत्तापक्ष के रणनीतिकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का दावा है कि इन विरोध-प्रदर्शनों का पैटर्न सामान्य लोकतांत्रिक विरोध से अलग है।
उनका आरोप है कि वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती आर्थिक और भू-राजनीतिक साख को चोट पहुंचाने के लिए कुछ बाहरी ताकतें सक्रिय हैं, जो देश के भीतर असंतोष की भावना को हवा दे रही हैं।
आलोचकों के अनुसार सड़कों पर होने वाले चक्काजाम, रैलियों और प्रदर्शनों से न केवल आम जनता को भारी असुविधा होती है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को भी अस्थिर करने का प्रयास किया जाता है।
इन आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए विपक्ष के नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज उठाना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना कोई अपराध या साजिश नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है।
विपक्षी खेमे का तर्क है कि देश इस समय बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असमानता जैसे बुनियादी संकटों से जूझ रहा है। राहुल गांधी और उनके सहयोगी दलों के नेताओं के अनुसार जब भी विपक्ष इन वास्तविक मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करता है, तो जवाब देने के बजाय सत्तापक्ष द्वारा ‘विदेशी हाथ’ और ‘अराजकता’ जैसे आवरण तैयार कर दिए जाते हैं, ताकि मुख्य मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाला जा सके।
इस राजनीतिक घमासान के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जीवंत लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन जब इन आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों या देश को अस्थिर करने जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठते हैं, तो उनकी सत्यता की प्रामाणिकता केवल सुरक्षा एजेंसियों और स्वतंत्र न्यायपालिका की निष्पक्ष जांच के बाद ही सिद्ध हो सकती है।
फिलहाल देश की सड़कों पर शुरू हुआ यह राजनीतिक संघर्ष अब दोनों पक्षों के बीच ‘सही और गलत’ साबित करने की एक बड़ी वैचारिक जंग में तब्दील हो चुका है।
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