एक बेबस पिता, ढहती उम्मीदें और जिंदगी की जंग लड़ता हमारा साथी शेखर मालवीय
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर के अरबिंदो अस्पताल की दूसरी मंजिल का कमरा नंबर 208। पलंग पर बेबस लेटे शेखर मालवीय की आंखें बिना पलक झपकाए सामने खड़ी पत्नी, बेटी और बेटे को निहार रही हैं। कुछ ही पलों में वो आँखें भर आती हैं और आंसू गालों से होते हुए तकिए में जज्ब हो जाते हैं।
पत्नी और बच्चे ढाढस बंधाते हैं—"पापा, आप जल्दी ठीक हो जाओगे!’ लेकिन शेखर को भीतर तक अहसास है कि अब जिंदगी शायद हमेशा के लिए दवाओं और खून के सहारे की मोहताज हो चुकी है। अस्पताल का खर्च, घर की जिम्मेदारियां और अनिश्चित भविष्य की चिंता उसे इस पलंग पर भी सुकून से सोने नहीं दे रही है।
शेखर मालवीय को पत्रकारिता जगत में कई लोग एक बेहतरीन वीडियो जर्नलिस्ट और जिंदादिल कैमरामैन के रूप में जानते हैं। एक समय था जब शेखर न सिर्फ अपने परिवार का बोझ उठा रहे थे, बल्कि अपने साथ जुड़े चार अन्य साथियों के घरों के चूल्हे जलने का जरिया भी बने हुए थे।
जिम्मेदारियों का पहाड़ इतना भारी था कि दो बेटियों और एक बेटे के भविष्य को संवारने की जद्दोजहद में वे दिन-रात दौड़ते रहे। उनकी छोटी बेटी (लल्ली) बचपन से ही गंभीर डायबिटीज से जूझ रही है और इंसुलिन पर निर्भर है।
लल्ली से शेखर को इस कदर मोहब्बत है कि उन्होंने उसका नाम अपने हाथ पर गुदवा रखा है। अस्पताल के बिस्तर पर भी उनकी जुबान पर बस एक ही फिक्र है—"मुझे कुछ हो गया तो मेरे बच्चों का क्या होगा? मेरी लल्ली का क्या होगा?’
घर की लगातार बनी रहने वाली परेशानियां, जिम्मेदारियां और तनाव के बीच शेखर अनजाने में गलत संगत का शिकार हो गए। शराब की एक बुरी लत ने इस कर्मठ और हँसते-खेलते इंसान को आज मौत से जूझने पर मजबूर कर दिया है। डॉक्टरों के मुताबिक, शेखर का लिवर पूरी तरह काम करना बंद कर चुका है और इसका सीधा असर अब उसकी किडनी पर भी पड़ने लगा है।
शेखर की पत्नी रुआंसे गले से बताती हैं कि उनके पास जो कुछ भी जमापूंजी थी, वह सब इनके इलाज में लग चुकी है। अब अस्पताल का खर्च उठा पाना इस परिवार के बूते से बाहर होता जा रहा है।
बूढ़ी मां, पत्नी और बच्चे दिन-रात शेखर की सेवा में जुटे हैं, लेकिन इलाज की दवाइयां और अस्पताल के बिल उनकी उम्मीदों को तोड़ रहे हैं। इस घड़ी में शेखर और उनके परिवार को केवल आर्थिक मदद की ही दरकार नहीं है, बल्कि उसे उस मानसिक संबल की भी जरूरत है जो उसे इस निराशा से बाहर निकाल सके।
यदि आप शेखर को जानते हैं, उसके साथ कभी काम किया है, या एक इंसान के नाते उसके इस दर्द को महसूस कर पा रहे हैं, तो कृपया आगे आएं और उसे मानसिक संबल दें..यदि आप इंदौर में हैं, तो एक बार अरबिंदो अस्पताल (दूसरी मंजिल, कमरा नंबर 208) जाकर शेखर से जरूर मिलें।
हाथ थामकर यह कहना कि "शेखर, चिंता मत कर, हम सब हैं ना, सब ठीक हो जाएगा..." आपके कहे गए ये शब्द शायद उसे वो सुकून दे सके जिसकी उसे इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत है।
परिवार इस समय पूरी तरह से टूट चुका है। छोटी बेटी की इंसुलिन से लेकर शेखर के इलाज तक के लिए आर्थिक रूप से भी उसे आवश्यकता है। आपकी एक छोटी सी मदद इस बिखरते हुए परिवार को नई जिंदगी दे सकती है।
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