उजियारे का उल्लास: शुक्रिया इंदौर, खूब परवान चढ़ी परंपरा; भुनसारे से भोर होने तक चला उत्सव
KHULASA FIRST
संवाददाता

अलसाई आंखों ने बयां किया रोशन रात का नजारा
अंधेरा छाने के बाद ही जगमगाए झांकियों के रंग-बिरंगे लट्टू, लाखों कद्रदानों ने दी दिल खोलकर दाद
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
ये ही तो इंदौर है...उत्सवधर्मिता के लिए यूं ही नहीं जग में सिरमौर है। एक पूरी रात ये शहर सड़क पर जागकर गुजार देता है, बिना पलक झपकाए...बिना सुस्ताए…बिना अलसाए...उल्लासित, उत्साहित पूरी रात फिरा करता है सड़क पर बाल-बच्चों के संग, परिवार के संग, संगी-साथियों संग। कुर्राटे मारता हुआ, पुंगी बजाता हुआ।
उस पल को जीता है, जो उसके सुनहरे अतीत से जुड़े हैं और जो सबसे अनूठे हैं। लोकोत्सव से जुड़ी पुरखों की इस परंपरा को इंदौर ने एक बार पूरी शान-ओ-शौकत से जीया। वे श्रमिक धन्य हुए, जो महीनों से उन पुतलों में प्राण फूंक रहे थे, जो तकनीक के इस दौर में भी लाखों लाख को आज भी लुभाते हैं।
गद्गद् हुए इस शहर के पुरखे की उनकी पीढ़ियों ने उनके उत्सव को एक बार फिर सूर्यास्त से सूर्योदय तक एक समान जीया। शुक्रिया इंदौर... धन्यवाद इंदौरियों। एआई टेक्नोलॉजी के दौर में भी इस ‘स्मार्ट सिटी' ने एक बार फिर बता दिया कि हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, अपनी जड़ों से दूर कभी न होंगे। शाबाश अहिल्यानगरी।
अ पने डीएनए में रचे-बसे उत्सव को मनाकर लौटा इंदौर दूसरे दिन पूरा समय उनींदा-उनींदा सा रहा। शहर के बाजारों के हाल भी ऐसे थे, जैसे वह सुस्ता रहे हों। दुकानें तो खुली थीं, लेकिन माहौल में ग्राहकी की जगह आराम पसरा हुआ था।
हर अलसाई आंख बयां कर रही थी, उस रोशन रात का नजारा, जिसे हमारे पुरखे लालटेन की मद्धिम रोशनी से रोशन कर गए थे। दिन ढलने के साथ शुरू हुआ लोकोत्सव भुनसारे से कहीं आगे दिन उगने तक एक समान चला।
कोई हायतौबा नहीं हुई। न उत्सव को तुरत-फुरत निपटाकर सुस्ताने के प्रयास हुए। इंदौर के इस लोकपर्व को, इंदौर व इंदौरियों के ही हवाले किया गया। अंतिम तीन झांकियों का क्रम जरूर गड़बड़ाया, लेकिन उत्सव का उल्लास-उत्साह रत्तीभर कम नहीं हुआ।
झांकियां मंथर गति से ही गतिमान हुईं। अखाड़ों को दमखम दिखाने का भरपूर वक्त मिला। उस्ताद, खलीफाओं को खूब मान मिला। लिहाजा बरसों बरस बाद फिर ऐसी भीड़ उमड़ी कि स्मृतियों में 70-80-90 का दशक फिर उमड़ आया।
बंदोबस्त इतने बढ़िया रहे कि विघ्नहर्ता की विदाई का अनंत उल्लासित पर्व अनंत चतुर्दशी की रात निर्विघ्न पूर्ण हुआ। शुक्रिया इंदौर। कोई जोड़ ही नहीं इस शहर की उत्सवप्रियता का। अगले बरस फिर दूनी ताकत, दूने उत्साह के साथ ये लोकपर्व मनेगा। लंबोदर गजाजन से ये ही करबद्ध प्रार्थना है।
जैसे ही झिलमिल झांकियों का कारवां सड़क पर उतरा, वाकई लगा कि गगन के सितारे जमीं पर उतर आए। आसमान से चांद भी सितारों की इस बरात को अपलक निहारने लगा। धरा पर तो जैसे जनसैलाब बह निकला।
उत्साह का कोई और-छोर ही नजर नहीं आ रहा था। कहां भंडारी मिल तिराहा और कहां गौराकुंड चौराहा। कहां जेलरोड और कहां जवाहर मार्ग, नृसिंह बाजार, उत्सव का उल्लास और उत्साह एक समान हिलोरे मार रहा था।
परिवार के परिवार, झुंड के झुंड उमड़े जा रहे थे। एक नजर उस कलाकारी को निहारने, जिसे श्रमिकों ने अपने परिश्रम से आकार दिया था। बेजान पुतलों में फूंके गए प्राण को देख लोगों का कलेजा मुंह को आ गया और सब तरफ बस वाह...वाह... वाह का शोर समा गया।
बंद हो चुकीं मिलों की झांकियों ने एक बार फिर मालवा के इस सबसे बड़े लोकपर्व को ऐसे परवान चढ़ाया कि बरसों की परंपरा फिर जीवंत हो उठी। नतीजतन एक के बाद एक नयनाभिराम झांकियों को अपलक निहारने में इंदौरी ऐसे मशगूल हुए कि कब भुनसारा हुआ, कब भोर हुई और कब दिन निकल आया...अहसास ही नहीं हुआ।
इस बरस डीआरपी लाइन पर रखा फोकस, समयक्रम नहीं गड़बड़ाया... तंत्र ने बीते बरस से सबक लेते हुए इस बरस डीआरपी लाइन पर फोकस किया। नतीजा ये रहा कि चल समारोह मार्ग के इस हिस्से में झांकियों को लेकर खींचतान नहीं हुई और न अखाड़े आपस में गुत्थमगुत्था हुए।
बीते बरस यहां जिम्मेदार बड़े अफसरों की मोर्चाबंदी के अभाव में मिल की झांकियों का क्रम ऐसा गड़बड़ाया कि पुराने इंदौर तक उत्सव का उल्लास बाधित हुआ। पुराने इंदौर के एक बड़े हिस्से तक पहुंचने के पहले ही झांकियां लौट गई थीं।
बीते बरस अखाड़े वाले अपनी मिल की झांकी छोड़ दूसरी झांकी में शामिल हो गए। इस तनातनी में इस तिराहे पर डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक झांकियां अटकी रह गई थीं। इसका खामियाजा पश्चिमी इंदौर को उठाना पड़ा था।
इस बार ऐसा नहीं हुआ। प्रत्येक झांकी व अखाड़ा गोराकुंड तक आया, वह भी समय पर। शुरुआत की तीन सरकारी झांकी तो सरपट निकलीं और इसके बाद तीन मिल की झांकियां भंडारी मिल, कल्याण मिल व मालवा मिल भी, लेकिन बाद में हुकुमचंद, स्वदेशी व राजकुमार मिल की झांकियां आराम से आईं। सुबह 6.30 बजे अंतिम झांकी खजूरी बाजार पहुंच गई थी।
इंदौरियों का रतजगा, परवान पर परंपरा...इंदौरियों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अहिल्या नगरी को प्रदेश का सांस्कृतिक शहर क्यों कहा जाता है। जबलपुर शहर को भले ही सूबे की संस्कारधानी कहां जाता हो, लेकिन संस्कृति-संस्कार-तीज-त्योहार को अपने अंदाज में जीने में इंदौर के बाशिंदों की कोई होड़-जोड़ नहीं।
लाखों लाख लोगों में इस उत्सव को ऐसा मनाया, जैसा ये एक कुल-कुटुंब का आयोजन हो। सड़क पर उमड़ी भीड़ के बीच का तालमेल व भाईचारा इस बात का अहसास दिला रहा था कि उत्सव इंदौरियों के खून में रचा-बसा है।
100 बरस से भी पुरानी परंपरा को हूबहू वैसे ही जी लेना, जैसे कभी हमारे पुरखे जीते थे...कम नहीं। परिवार सहित लोग पूरी रात जागे। चल समारोह मार्ग में घूमे...नाचे-गाए...कुर्राटी मारी...पुंगी बजाई, लेकिन कहीं कोई अनहोनी नहीं हुई। जैसे इस उत्सव, इस मालवा के सालाना जलसे, पुरखों की परंपरा को विघ्नहर्ता भगवान गणेश का साक्षात् आशीर्वाद हो।
हर बरस यूं ही शहर पूरी रात जागता है, लेकिन उत्सव में आज तक कोई बड़ा खलल नहीं आया, न कोई होनी-अनहोनी हुई। ये बताता है कि मन से मनाए जाने वाले त्योहार को ईश्वर का वरदान भी मिलता है।
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