वह वाली दीपावली अब कहां रही: दीयों की रोशनी में रिश्तों की मिठास और अपनों की तलाश
KHULASA FIRST
संवाददाता

स्वच्छता के साथ संवेदनाओं में भी नंबर वन बने इंदौर
दीपावली की चमक के बीच क्या कहीं खो गया पुराना शहर?
दीये तो खूब जलेंगे, क्या रिश्तों में भी लौटेगी पहले जैसी मिठास?
बाजारों की रौनक से आगे भी है दीपावली, किसी के अंधेरे घर में भी जलाइए उम्मीद का दीया
इस दीपावली घर ही नहीं, दिल भी रोशन कीजिए; अपनों के साथ जरूरतमंदों को भी याद रखिए
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राजबाड़ा से लेकर मोहल्लों की गलियों तक रोशनी की तैयारियां हैं। बाजारों में रौनक है, मिठाइयों की खुशबू है और घरों में सजावट का उत्साह। लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल मन में उठता है... क्या हमारी दीपावली उतनी ही मीठी रह गई है, जितनी कभी हमारे रिश्तों में हुआ करती थी? क्या दीये जलाते-जगमगाते हम अपनों के लिए वक्त निकालना भूलते जा रहे हैं?
इंदौर की दीपावली का अपना ही मिजाज रहा है। यह सिर्फ घर सजाने, मिठाइयां खरीदने और पटाखे फोड़ने का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले के एक परिवार बन जाने का अवसर हुआ करता था। पुराने इंदौर की गलियों में कई दिन पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं।
घरों की सफाई में पूरा परिवार जुटता था। कोई आंगन धोता, कोई रंगोली बनाता तो कोई छत और मुंडेर पर दीये सजाता था। पड़ोस में किसके घर क्या पक रहा है, किसके यहां मेहमान आए हैं, इसकी खबर भी सबको रहती थी।
तब दीपावली मनाने के लिए बहुत साधन नहीं चाहिए होते थे। मिट्टी के कुछ दीये, घर में बनी मिठाई, मां के हाथ के पकवान और अपनों का साथ ही त्योहार को खास बना देते थे। पड़ोसी के घर मिठाई पहुंचाना महज औपचारिकता नहीं, रिश्तों को निभाने का तरीका था।
बच्चे एक-दूसरे के घर बेझिझक आते-जाते थे। किसी एक घर में पकवान बनते तो उसका स्वाद पूरे मोहल्ले तक पहुंचता था। शायद इसीलिए उस दौर की दीपावली आज भी मन में एक मीठी कसक पैदा करती है। आज इंदौर बड़ा हुआ है।
बाजारों की चमक बढ़ी है, सजावट के तरीके बदले हैं और खरीदारी के विकल्प भी। लेकिन एक बदलाव साफ महसूस होता है। त्योहार की तैयारियां तो बढ़ी हैं, मगर एक-दूसरे के लिए वक्त निकालने की फुर्सत कम हुई है। मिठाइयों के डिब्बे महंगे और आकर्षक हो गए हैं, लेकिन क्या रिश्तों में पहले जैसी मिठास बची है?
बाजार में रौनक, लेकिन हर घर में खुशियां एक जैसी नहीं
दीपावली पर बाजारों में उमड़ती भीड़ खुशहाली का दृश्य दिखाती है, लेकिन हर परिवार की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। किसी के लिए त्योहार बोनस और खरीदारी का अवसर है तो किसी के लिए महीने का बजट संभालने की चुनौती।
एक मध्यमवर्गीय पिता दुकान पर बच्चों की पसंद के कपड़े देखता है। बच्चा किसी महंगे खिलौने या सजावटी सामान की जिद करता है। पिता मुस्कुराकर हामी भर देता है, लेकिन मन ही मन जेब का हिसाब भी लगाता है। बच्चों की खुशी के लिए वह अपनी शर्ट, जूते या कोई दूसरी जरूरत फिर टाल देता है।
बच्चे को इसका पता भी नहीं चलता। उसे बस इतना मालूम है कि पापा ने उसकी फरमाइश पूरी कर दी। ऐसे पिता दीपावली की सबसे अनकही कहानियों में शामिल हैं। वे अपनी चिंताओं को मुस्कान के पीछे छिपाकर पूरे परिवार की खुशियां जुटाते हैं। त्योहार पर उनकी जेब का हिसाब भी पढ़ा जाना चाहिए।
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह शहर की मेहनत और नागरिक भागीदारी का परिणाम है। लेकिन दीपावली हमें एक दूसरी कसौटी पर भी खुद को परखने का अवसर देती है। क्या हम अपने आसपास के जरूरतमंदों, बुजुर्गों और मेहनतकश लोगों के प्रति भी उतने ही संवेदनशील हैं?
शहर की सुंदरता केवल सड़कों और इमारतों से नहीं, नागरिकों के व्यवहार से भी बनती है। पटाखों के शोर से परेशान बुजुर्गों, छोटे बच्चों और बेजुबान पशुओं का ध्यान रखना जरूरी है। उत्सव की खुशी ऐसी हो जिसमें दूसरों की परेशानी शामिल न हो।
छोटे दुकानदारों से खरीदारी करना, स्थानीय कारीगरों के मिट्टी के दीये लेना और जरूरतमंदों की मदद करना भी त्योहार को सार्थक बना सकता है। जिस कुम्हार के हाथों से निकला छोटा-सा दीया हमारे घर की शोभा बढ़ाता है, उसकी मेहनत और आजीविका को भी याद रखना चाहिए।
इस बार एक दीपावली रिश्तों के नाम भी
बचपन वाली दीपावली कभी लौटकर नहीं आएगी। वह बेफिक्र बचपन, पूरा मोहल्ला, छतों पर दीये और बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के अपनों के घर पहुंच जाने की परंपरा अब पहले जैसी नहीं रही। लेकिन उस दौर का अपनापन आज भी लौटाया जा सकता है।
इसके लिए बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं। किसी पुराने मित्र को फोन कर लीजिए। पड़ोस में रहने वाले अकेले बुजुर्ग का हाल पूछ लीजिए। मां के पास कुछ देर बैठ जाइए। बेटी घर आ रही है तो उसकी पसंद का पकवान बनवा लीजिए। जिस कर्मचारी की मेहनत से आपका घर और शहर रोशन है, उसे सम्मान और शुभकामना दीजिए।
इस बार घर में कितने दीये जलाए, इसका हिसाब बाद में कीजिएगा। पहले यह देखिए कि कितने अपनों से मिले और कितने चेहरों पर मुस्कान लौटा सके। बाजारों की रोशनी कुछ दिनों बाद उतर जाएगी, सजावट भी हट जाएगी और पटाखों का शोर थम जाएगा।
लेकिन मां के साथ बिताया वक्त, पिता की याद में जलाया गया दीया और किसी जरूरतमंद के चेहरे पर आई मुस्कान लंबे समय तक याद रहेगी। आखिर शहर दीयों से जगमगाते हैं, लेकिन जिंदगी अपनों से रोशन होती है।
हमारे घर रोशन करने वाले भी तो किसी के अपने हैं- इंदौर की चमकती सड़कों, साफ-सुथरे रास्तों और जगमगाते बाजारों के पीछे अनेक ऐसे लोग हैं, जिनकी अपनी दीपावली अक्सर काम करते हुए गुजर जाती है। सफाईकर्मी, बिजली कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी, डिलीवरी बॉय और जरूरी सेवाओं से जुड़े कर्मचारी त्योहार पर भी अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं।
जब हम परिवार के साथ मिठाई खा रहे होते हैं, तब इनमें से कई लोग शहर की व्यवस्था संभाल रहे होते हैं। उनके भी बच्चे हैं, परिवार है और घर लौटने की इच्छा है। हमारी खुशियों में उनके हिस्से की थोड़ी-सी जगह क्यों नहीं होनी चाहिए?
फुटपाथों और जरूरतमंद बस्तियों में रहने वाले परिवारों की ओर भी नजर डालिए। किसी बच्चे के लिए नए कपड़े बड़ी खुशी हो सकते हैं तो किसी अकेले बुजुर्ग के लिए दो मीठे बोल और कुछ देर का साथ किसी महंगे उपहार से बढ़कर।
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