चरनोई जमीनों के नामांतरण का खेल: सरकारी रिकॉर्ड से हटकर निजी मालिकाना हक का दावा
KHULASA FIRST
संवाददाता

1925-26 के मिसल बंदोबस्त में शासकीय मद में दर्ज भूमि के नामांतरण का मामला, विनायक इंटरप्राइजेस को राहत
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महू तहसील में शासकीय चरनोई जमीनों के रिकॉर्ड, नामांतरण और निजी स्वामित्व के दावों को लेकर राजस्व व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्राम हरसोला में चरनोई भूमि निजी नाम पर दर्ज किए जाने के मामले में संभागायुक्त स्तर पर जांच और आरोप पत्र जारी होने की जानकारी सामने आई।
सोमवार को ग्राम बारडिया के एक अन्य मामले में हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी और 50 हजार रुपए की कॉस्ट की कार्रवाई की चर्चा के बीच अब ग्राम कवटी की जमीन का मामले का खुलासा हुआ है। यहां 1925-26 के मिसल बंदोबस्त में शासकीय चरनोई मद में दर्ज भूमि को लेकर निजी स्वामित्व और नामांतरण का विवाद सामने आया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ऐतिहासिक राजस्व रिकॉर्ड में जमीन शासकीय चरनोई दर्ज थी, तो बाद के रिकॉर्ड में निजी अधिकारों का आधार क्या बना और संबंधित जमीनों के उपयोग की जांच किस स्तर पर हुई?
ग्राम कवटी में श्री विनायक इंटरप्राइजेस तर्फे गुरमीत सिंह भाटिया और राजेंद्र श्रीवास्तव के नाम से जुड़ी जमीनों पर कॉलोनी विकसित किए जाने की बात सामने आई है। उपलब्ध राजस्व आदेशों में अलग-अलग सर्वे नंबरों और अलग-अलग वर्षों की कार्यवाही दर्ज है।
वर्ष 2023 में तहसीलदार ने कुछ जमीनों का नामांतरण किया, जबकि सर्वे नंबर 111 और 112 को मिसल बंदोबस्त में शासकीय चरनोई दर्ज बताते हुए निजी मद में दर्ज करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं होने का उल्लेख भी उसी आदेश में किया गया था।
इसके बाद वर्ष 2026 में सर्वे नंबर 111/2/3/2 और 111/3/3/2 के नामांतरण को लेकर अपील स्वीकार कर ली गई। इन आदेशों के बीच जमीनों के रिकॉर्ड, स्वामित्व के आधार और कॉलोनी विकास की वैधानिकता की विस्तृत जांच जरूरी हो गई है।
2026 में एसडीओ के आदेश से बदली स्थिति
राजस्व अपील प्रकरण क्रमांक 188/अपील/2025-26 में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, डॉ. आंबेडकर नगर, महू ने 19 फरवरी 2026 को आदेश पारित किया। मामला सर्वे नंबर 111/2/3/2, रकबा 0.218 हेक्टेयर और सर्वे नंबर 111/3/3/2, रकबा 0.210 हेक्टेयर से संबंधित था।
तहसीलदार ने 13 जनवरी 2026 को इन जमीनों के नामांतरण का आवेदन निरस्त कर दिया था। इसके पीछे मिसल बंदोबस्त वर्ष 1925-26 में जमीन के शासकीय मद में दर्ज होने का आधार बताया गया था। इसके खिलाफ श्री विनायक इंटरप्राइजेस और अन्य अपीलार्थियों ने अपील की।
अपील में पक्षकारों ने तर्क दिया कि बाद के राजस्व रिकॉर्ड में जमीन निजी नामों पर दर्ज रही और पूर्व में भी क्रय-विक्रय तथा नामांतरण हुए। प्रकरण में प्रस्तुत राजस्व अभिलेखों के आधार पर एसडीओ ने माना कि संबंधित भूमि संहिता लागू होने से पहले निजी नाम पर दर्ज थी।
आदेश में मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 158 सहित संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लेख किया गया। एसडीओ ने तहसीलदार का 13 जनवरी 2026 का आदेश निरस्त करते हुए अपील स्वीकार की और संबंधित जमीनों के राजस्व रिकॉर्ड में अपीलार्थियों के नाम दर्ज करने के निर्देश दिए।
हालांकि, नामांतरण का आदेश अपने आप में कॉलोनी विकास की अनुमति या जमीन के प्रत्येक उपयोग की वैधानिकता का प्रमाण नहीं है। इसलिए यह जांच का विषय है कि संबंधित जमीन पर कॉलोनी विकास के लिए आवश्यक अनुमतियां प्राप्त हैं या नहीं और विकास की स्थिति राजस्व तथा नगर एवं ग्राम निवेश के रिकॉर्ड से मेल खाती है या नहीं।
बारडिया में हाई कोर्ट की सख्ती, महू के राजस्व आदेश फिर चर्चा में
सोमवार को ग्राम बारडिया से जुड़े एक अन्य राजस्व मामले में महू एसडीएम राकेश परमार के आदेश को लेकर हाई कोर्ट की सख्त कार्रवाई की जानकारी सामने आई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कोर्ट ने आदेश निरस्त करते हुए 50 हजार रुपये की कॉस्ट लगाई और राशि सात दिन में जमा करने का निर्देश दिया।
इस घटनाक्रम को ग्राम हरसोला में चरनोई भूमि से जुड़े विवाद और अब कवटी के राजस्व रिकॉर्ड के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, बारडिया मामले और कवटी की जमीन के प्रकरण को अलग-अलग मामलों के रूप में ही देखना होगा।
इनके तथ्य, आदेश और कानूनी आधार अलग हैं। हरसोला मामले में भी शासकीय चरनोई जमीन को निजी नाम पर दर्ज किए जाने के आरोपों के बाद संभागायुक्त स्तर पर जांच और आरोप पत्र जारी होने की जानकारी सामने आई थी।
इन घटनाओं के बीच महू तहसील में शासकीय भूमि के संरक्षण, राजस्व रिकॉर्ड के परीक्षण और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
2023 के आदेश में चरनोई दर्ज होने का स्पष्ट उल्लेख
तहसीलदार डॉ. आंबेडकर नगर, महू के न्यायालय में राजस्व प्रकरण क्रमांक 1131/3-6/2023-24 में 23 मई 2023 को पारित आदेश के अनुसार, ग्राम कवटी के सर्वे नंबर 122/2/2 और 121/2/2 की क्रमशः 0.081 और 0.370 हेक्टेयर भूमि पर श्री विनायक इंटरप्राइजेस के भागीदारों के नाम दर्ज करने का आदेश दिया गया था।
इसी आदेश में सर्वे नंबर 111 और 112 के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणी भी दर्ज है। आदेश के अनुसार, ये जमीनें मिसल बंदोबस्त वर्ष 1925-26 में शासकीय चरनोई मद में अंकित थीं।
साथ ही, इन्हें शासकीय से निजी मद में विधिवत दर्ज किए जाने की अनुमति प्रमाणित करने वाले दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए थे। इसी आधार पर इन सर्वे नंबरों की जमीनों का नामांतरण संभव नहीं माना गया था।
ऐसे में सवाल उठता है कि जिन सर्वे नंबरों को लेकर राजस्व न्यायालय ने पहले शासकीय चरनोई दर्ज होने और निजीकरण के पर्याप्त प्रमाण नहीं होने की बात कही, उन्हीं से संबंधित जमीनों के नामांतरण की आगे की कार्यवाही किन दस्तावेजों और कानूनी आधारों पर हुई?
जांच के घेरे में ये अहम सवाल
ग्राम कवटी के सर्वे नंबर 111 और 112 की जमीनों के स्वामित्व का पूरा रिकॉर्ड क्या है?
वर्ष 1925-26 के मिसल बंदोबस्त और बाद के राजस्व अभिलेखों में दर्ज प्रविष्टियों के बीच अंतर का आधार क्या है?
वर्ष 2023 के आदेश में निजीकरण की अनुमति से संबंधित दस्तावेज नहीं होने का उल्लेख था, तो बाद की कार्यवाही में किन प्रमाणित अभिलेखों पर भरोसा किया गया?
श्री विनायक इंटरप्राइजेस से संबंधित जमीन पर कॉलोनी विकास के लिए सक्षम प्राधिकरण की अनुमति ली गई है या नहीं?
क्या संबंधित जमीनों की सीमाओं, सर्वे नंबरों और वर्तमान उपयोग का संयुक्त राजस्व एवं भू-अभिलेख परीक्षण कराया गया है?
महू एसडीएम राकेश सिंह ने बताया कि भूमि स्वामी का निर्धारण 1959-60 में दर्ज नाम और मद के अनुसार होता है।
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