मजबूत शासक जनहित में कठोर फैसले लेने वाले: बंद पड़ी राज्य परिवहन सेवा शुरू नहीं कर पाई कोई सरकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

दिग्विजय, उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज और कमलनाथ पर भारी मोहन यादव
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश की राजनीति में अब तक के बड़े धुरंधर और ताकतवर राजनेता कहे जाने वाले मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और कमलनाथ प्रदेश की जनता की बेहतरी के लिए कठोर फैसले लेने से पलायन करते रहे।
एक ऐसा ही फैसला राज्य की परिवहन सुविधा को लेकर बीते कई वर्षों से सरकार की प्राथमिकता में नहीं था या कहे लंबित था। इसकी कीमत जनता ने अदा की। राज्य की परिवहन सेवा का नहीं होना एक तरह से जनता के लिए सजा के रूप में था।
इस सेवा की वापसी को लोग पूरी तरह से भूल गए थे। बावजूद उसके मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव ने इस सेवा को फिर शुरू करके अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक दक्षता और क्षमता को साबित कर दिया।
मध्य प्रदेश में 21 साल बाद सार्वजनिक बस परिवहन सेवा की वापसी को केवल परिवहन व्यवस्था की शुरुआत मानना इस फैसले के राजनीतिक और प्रशासनिक अर्थ को छोटा करके देखना होगा।
जिस व्यवस्था को लंबे समय से बंद पड़े अध्याय के रूप में देखा जा रहा था, उसे नए मॉडल के साथ साहस के साथ मुख्यमंत्री ने फिर शुरू किया है। यही वजह है कि इस फैसले ने मुख्यमंत्री की कार्यशैली और उनकी राजनीतिक स्थिति को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है।
डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनते ही शुरुआती दौर में राजनीतिक हलकों में उनकी प्रशासनिक पकड़ और राजनीतिक प्रभाव को लेकर तरह-तरह के आकलन किए गए। भाजपा के भीतर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं और विपक्ष की ओर से भी उनके नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए जाते रहे, लेकिन पिछले कार्यकाल के फैसलों को देखें तो मुख्यमंत्री की शैली धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, कठिन विषयों को टालने के बजाय निर्णय लेना और फिर उसे जमीन पर उतारने की कोशिश करना।
‘कमजोर मुख्यमंत्री’ की धारणा को फैसलों से जवाब?... राजनीति में किसी मुख्यमंत्री की ताकत का आकलन केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं होता। उसका एक पैमाना यह भी होता है कि सरकार कठिन फैसलों पर कितनी तेजी से आगे बढ़ती है और अपने निर्णयों को लागू कराने की कितनी क्षमता दिखाती है।
डाॅ. मोहन यादव के मामले में सार्वजनिक परिवहन की वापसी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसे उनके समर्थक उनकी प्रशासनिक दृढ़ता का उदाहरण मानते हैं, जबकि विपक्ष स्वाभाविक रूप से इसके क्रियान्वयन और परिणामों पर सवाल उठा सकता है, लेकिन एक बात स्पष्ट है मुख्यमंत्री की राजनीतिक स्थिति का आकलन अब केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वे अपेक्षाकृत नए चेहरे हैं या भाजपा के भीतर उनसे वरिष्ठ नेता मौजूद हैं। उनके कार्यकाल में लिए गए फैसले भी उनके नेतृत्व की तस्वीर बनाने लगे हैं।
‘अंगद के पैर’ वाली राजनीति का संकेत... डॉ. मोहन यादव की मौजूदा कार्यशैली को यदि राजनीतिक रूप में समझें तो इसे ‘अंगद के पैर’ जैसा कहा जा सकता है यानी एक बार निर्णय लेने के बाद पीछे हटने के बजाय उसे परिणाम तक ले जाने का प्रयास।
हालांकि, किसी मुख्यमंत्री को वास्तव में कितना मजबूत या स्थिर माना जाए, इसका फैसला समय, प्रशासनिक परिणाम और राजनीतिक परिस्थितियां करेंगी। केवल एक योजना की शुरुआत से अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
फिर भी 21 साल से बंद सार्वजनिक परिवहन की वापसी एक ऐसा उदाहरण है, जो यह जरूर दिखाता है कि डाॅ. मोहन यादव सरकार कठिन और लंबे समय से लंबित मुद्दों पर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रही है।
विरोधियों के लिए भी संदेश... इस फैसले का राजनीतिक संदेश भाजपा के भीतर और विपक्ष, दोनों के लिए पढ़ा जा सकता है। मुख्यमंत्री की राजनीतिक ताकत केवल संगठन में उनके समर्थन से नहीं, बल्कि शासन के फैसलों और उनके क्रियान्वयन से भी बनती है।
मुख्यमंत्री के सामने अब चुनौती यह साबित करने की है कि बस सेवा की शुरुआत एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रदेश में टिकाऊ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की शुरुआत है। यदि सेवा नियमित, सुरक्षित, सस्ती और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचती है, तो इसका प्रभाव केवल यात्रियों तक सीमित नहीं रहेगा।
यानी मुख्यमंत्री के सामने अब सवाल यह नहीं है कि वे कितना बड़ा फैसला ले सकते हैं, बल्कि यह भी कि लिए गए बड़े फैसलों को कितनी मजबूती से परिणाम में बदल सकते हैं। 21 साल बाद बस सेवा की वापसी इसी परीक्षा का एक और बड़ा अध्याय है।
चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने वाले नेता... मध्य प्रदेश की सड़कों पर 21 साल बाद सार्वजनिक बस परिवहन की वापसी केवल एक नई परिवहन सेवा की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह उस पुराने सवाल का भी जवाब है कि प्रदेश में आम आदमी के लिए राज्य की बस सेवा आखिर कब लौटेगी।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 25 सितंबर को ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ की शुरुआत कर इस लंबे अंतराल को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। पहले चरण में सात शहरों के लिए 351 इंटरसिटी और इंट्रासिटी बसें शुरू की गई हैं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि करीब दो दशक से अधिक समय में प्रदेश में कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन बंद पड़ी राज्य परिवहन व्यवस्था को उसी रूप में वापस लाना संभव नहीं हो सका।
दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और कमलनाथ के कार्यकाल के बावजूद यह व्यवस्था पुनर्जीवित नहीं हो सकी। ऐसे में डाॅ. मोहन यादव सरकार के सामने चुनौती केवल बसें चलाने की नहीं थी, बल्कि वर्षों से बंद एक सार्वजनिक व्यवस्था को नए मॉडल के साथ खड़ा करने की थी।
इससे पहले भी डॉ. मोहन यादव ने जनहित के कई कठोर फैसले लेते हुए यह साबित करने की कोशिश की है कि वह चुनौतियों को साधारण रूप में नहीं लेते, बल्कि उनका ताकत से सामना करते हुए सफलतापूर्वक अपने फैसलों को परिणाम तक पहुंचाते हैं।
घोषणा पत्र से सड़क तक पहुंचा संकल्प... इस फैसले का एक राजनीतिक पहलू यह भी है कि भाजपा ने विधानसभा चुनाव के दौरान सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को लेकर जो संकल्प सामने रखा था, उसे सरकार ने अब जमीन पर उतारा है। यानी चुनावी घोषणा को केवल घोषणा बनाकर छोड़ने के बजाय उसे परिवहन व्यवस्था के रूप में लागू करने की कोशिश की गई है।
21 साल का इंतजार खत्म करना आसान फैसला नहीं
राज्य की सार्वजनिक बस सेवा लंबे समय से बंद थी। इस दौरान कई मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से लेकर उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान और कमलनाथ तक आए। अलग-अलग सरकारों के अपने राजनीतिक और प्रशासनिक एजेंडे रहे, लेकिन सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को उसी स्तर पर पुनर्जीवित नहीं किया जा सका।
ऐसे में 21 साल बाद बस सेवा की वापसी डॉ. मोहन यादव सरकार के लिए सिर्फ एक योजना शुरू करने का मामला नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक चुनौती को स्वीकार करने का संकेत है, जिसे पिछली सरकारें पूरी तरह हल नहीं कर सकीं।
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