अब हर खर्च से पहले लेना पड़ेगी अनुमति: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती; आस्था एजुकेशन सोसायटी के फंड पर निगरानी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आस्था एजुकेशन सोसायटी और उससे संचालित शिक्षण संस्थानों के नियंत्रण तथा वित्तीय प्रबंधन को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि संस्थाओं के संचालन, शिक्षकों एवं गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों के वेतन सहित किसी भी प्रकार का खर्च करने से पहले फर्म्स एवं सोसायटीज, इंदौर के सहायक पंजीयक से अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
यह आदेश विवादित फंड के उपयोग पर लगाम लगाने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
मामला अनिल सांघवी एवं एक अन्य बनाम रजिस्ट्रार, फर्म्स एंड सोसायटीज एवं अन्य के रूप में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। 27 मई को न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापाम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवालिया और निधेश गुप्ता ने पक्ष रखा, जबकि अन्य अधिवक्ताओं में अर्जुन गर्ग, अभिनव मल्होत्रा, अमृता अर्जुन गर्ग, अरुषि कुलश्रेष्ठ, सारांश शुक्ला, प्रगति और साजल सांघवी शामिल रहे।
प्रतिवादी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, मनिंदर सिंह, पुनीत जैन, वीवीएस मूर्ति सहित कई अधिवक्ताओं ने पैरवी की। राज्य शासन की ओर से वरिष्ठ अपर महाधिवक्ता मनीषा टी. कारिया उपस्थित रहीं।
विवाद का केंद्र संस्थाओं के फंड का उपयोग- सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विवाद का केंद्र संस्थाओं के फंड का उपयोग है। अदालत ने कहा संस्थानों के संचालन, वेतन भुगतान व अन्य वित्तीय व्ययों को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद हैं।
ऐसे में किसी भी राशि के व्यय से पहले संबंधित सहायक पंजीयक की अनुमति लेना होगी। सूत्रों के अनुसार सोसायटी के नियंत्रण और करोड़ों रुपए के वित्तीय प्रबंधन को लेकर लंबे समय से संघर्ष चल रहा है।
यही विवाद पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ तक पहुंचा और बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। अब सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद सोसायटी के वित्तीय निर्णयों पर सरकारी निगरानी बढ़ गई है।
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