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माय बस मेरी मोटर मेरा सम्मान: आम आदमी की बस

Khulasa First

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संवाददाता

25 सितंबर 2026, 1:43 pm
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माय बस मेरी मोटर मेरा सम्मान

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश में सरकारी लोक परिवहन बसों की वापसी को आम जनता केवल एक आवागमन के साधन के रूप में नहीं, बल्कि ‘माय बस, मेरी बस और मेरा सम्मान’ के रूप में देख रही है। दशकों बाद शुरू हुई इस सुरक्षित और सुलभ सेवा ने आम आदमी के जीवन में एक नया आत्मसम्मान और विश्वास जगाया है।

मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों को उस दौर में मोटर कहा जाता था, अब यह तेज रफ्तार वाले वाहन बस में बदल गई है। पहले लोकल, यानी जगह-जगह रुकने वाली बस को डाकगाड़ी कहा जाता था, अब यह एक्सप्रेस और सुपर एक्सप्रेस बस हो गई है।

मोटर से बस तक का यह सफर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कारण मंजिल तक पहुंच पाया है। जिस तरह मुख्यमंत्री ने यह परिवहन सेवा आरंभ की, उसने इसे आम आदमी की आधुनिक सर्वसुविधा युक्त लग्जरी बस बना दिया है। इस सुविधा ने आम यात्री को मेरी बस और मेरा सम्मान जैसा एहसास कराया।

अपनी बस होने का अहसास... शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों व छोटे कस्बों तक पहुंचने वाली ये बसें अब केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि आम जनमानस के लिए अपनी खुद की व्यवस्था होने का एक गहरा गर्व और अपनापन महसूस कराती हैं। यह सेवा महज सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियां नहीं, बल्कि हर आम नागरिक की गरिमा, सुरक्षा और स्वतंत्र आवाजाही के अधिकार की मुहर है।

...और साकार कर दिखाई कल्पना...यह सुविधा और यह आम यात्री का सम्मान लौट कर आएगा, इसके बारे में प्रदेशवासियों ने कल्पना भी नहीं की थी। यानी ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी।

सच भी है, बीते 30 वर्षों में प्रदेश में सरकारी राज्य परिवहन सेवा को जिस तरह से पूर्ण सरकारों ने सोचीसमझी योजना के तहत जमींदोज किया, ऐसी स्थिति में इसके लौटने की उम्मीद कैसे की जा सकती थी।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे पहले दिन से ही समझ लिया था। पूर्व की सरकारों के उलट प्रदेश में लोक परिवहन की योजना पर शांति से काम करना शुरू किया और इसे साकार कर दिखाया। यह एक कुशल शासक की दूरदृष्टि है कि वह जनता की समस्या का ठोस समाधान देता है।

आमजन की परेशानियों को करीब से जाना...मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की दृढ़ इच्छाशक्ति और जनता के प्रति गहरी संवेदनशीलता के परिणामस्वरूप शुरू हो सकी ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ ने प्रदेश के आम नागरिकों के सफर को सुलभ, सुरक्षित और आधुनिक बना दिया है।

जब राज्य के गांवों और छोटे कस्बों से लोग शहरों की ओर सफर करते थे, तो निजी वाहनों की कमी, महंगे किराए और असुरक्षित यात्रा साधनों के कारण उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

मुख्यमंत्री ने जनता की इन तकलीफों को गंभीरता से लेते हुए महसूस किया कि चहुंमुखी विकास और शानदार सड़कों के जाल के बावजूद यदि आम आदमी को सस्ती, भरोसेमंद और सुरक्षित बस सेवा नहीं मिलती, तो विकास का वह पहिया अधूरा है। इसके साथ ही उन्होंने प्रदेश में सरकारी लोक परिवहन सेवा दोबारा जीवित करने का दृढ़ संकल्प लिया।

तमाम चुनौतियों को किया दरकिनार...दो दशक से बंद पड़ी सरकारी बस सेवा को फिर से पटरी पर लाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। ढांचागत तैयारियां, वित्तीय प्रबंधन और निजी ऑपरेटरों के साथ संतुलन बैठाना एक पेचीदा काम था।

अधिकांश निजी ऑपरेटर सांसदों, विधायकों, सरकार में बैठे मंत्रियों और संगठन के प्रतिनिधि बताए जाते हैं। उनके धंधे पर चोट करने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए थी। और यह काम मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के अलावा दूसरे के बस का नहीं था, जो उन्होंने साबित कर दिया।

पगडंडी से सड़क तक सुगम सफर...मुख्यमंत्री से प्रदेश के ग्रामीण और जनजाति क्षेत्र में लोगों को खासी उम्मीद बंध गई है। जैसा जनजाति शोधार्थी और ग्रामीण अंचल बड़वानी के पानसेमल से आने वाले युवा राहुल डाबर कहते हैं कि ग्रामीण जीवन के लिए नई बस सेवा उम्मीद की नई राह है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं, जिनके लिए रोज-रोज निजी वाहन, टैक्सी या महंगे साधनों से यात्रा करना आर्थिक रूप से आसान नहीं होता। कई बार किराया बचाने के लिए लोग आसपास के कस्बे तक पैदल, साइकिल या स्थानीय साधनों से जाने को मजबूर होते हैं।

कहीं-कहीं ग्रामीण आज भी मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए पगडंडियों और कच्चे रास्तों का सहारा लेते हैं। ऐसे में नियमित और अपेक्षाकृत कम किराए वाली बस सेवा ग्रामीण परिवारों के लिए समय और पैसे दोनों की बचत का माध्यम बन सकती है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अहम...समाजशास्त्र के शोधकर्ता और सामाजिक विषयों के जानकार सुनील चौहान कहते हैं कि इस सुविधा से ग्रामीण और जनजाति क्षेत्र में महत्वपूर्ण शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्यगत बदलाव आएंगे।

कम किराया ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। ग्रामीण परिवार की आय और खर्च का संतुलन शहरों की तुलना में अलग होता है। छोटी-सी यात्रा के लिए भी यदि बार-बार अधिक किराया खर्च हो जाए तो वह परिवार के मासिक बजट पर असर डालता है।

इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि बसों के रूट, समय और फ्रीक्वेंसी गांवों तथा छोटे कस्बों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप कितनी अच्छी तरह तय किए जाते हैं।

विद्यार्थियों के लिए खुलेंगे नए अवसर...ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए प्रतिदिन नजदीकी शहर या कस्बे की ओर जाते हैं। परिवहन की सीमित सुविधा उनके सामने बड़ी चुनौती होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में गंभीर बीमारी या आपात स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती अक्सर अस्पताल तक पहुंचने की होती है। हर परिवार के पास निजी वाहन उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में यह सुविधा महिलाओं और बुजुर्गों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगी।

असली सफलता गांव के अंतिम छोर पर...इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल 351 बसों का संचालन नहीं, बल्कि आने वाले समय में शीघ्रता से इन सेवाओं का ग्रामीण क्षेत्रों तक किया जाना जरूरी है।

सरकार की ओर से 2031 तक 15 हजार सार्वजनिक बसों और 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों को बस सेवा से जोड़ने का लक्ष्य बताया गया है। इस योजना को सिंहस्थ-2028 तक पूरा कर देना चाहिए।

योजना की सफलता तभी मानी जाएगी, जब बसें केवल बड़े शहरों और मुख्य मार्गों तक सीमित न रहें, बल्कि छोटे कस्बों, ब्लॉक मुख्यालयों और ग्रामीण क्षेत्रों को भी नियमित कनेक्टिविटी दें। इससे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, बाजार और अन्य अवसर से भी गांव जुड़ सकेंगे।

मौत का सफर बन गई थी निजी बस सेवा... मध्य प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान निजी ऑपरेटरों की बसों से जुड़ी दुर्घटनाओं और उनमें हुई बेकसूर नागरिकों की मौतों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। सड़क परिवहन मंत्रालय और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में हर साल बसों से जुड़े सैकड़ों हादसे होते हैं, जिनमें सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।

निजी बसों की बेलगाम रफ्तार, फिटनेस नियमों की अनदेखी, ओवरलोडिंग और सुरक्षा मानकों के अभाव के कारण सूबे की सड़कों और पहाड़ी-घाटियों पर कई दिल दहला देने वाली घटनाएं सामने आई हैं।

निजी बस हादसों का दर्दनाक सच एक नजर में
आधिकारिक आंकड़े : केंद्रीय परिवहन मंत्रालय और राज्य के पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार मध्य प्रदेश में बसों से होने वाली दुर्घटनाओं का ग्राफ चिंताजनक रहा है। सालभर में ही प्रदेश में बसों की टक्कर या पलटने से 400 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी और दो हजार से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इनमें एक बड़ा हिस्सा निजी और अनुबंधित बसों का है।

धार बस हादसा : कुछ साल पहले धार जिले में नर्मदा नदी (खलघाट पुल) पर एक भीषण हादसे में निजी बस रेलिंग तोड़कर नदी में जा गिरी थी, जिसमें 12 से अधिक यात्रियों की दर्दनाक मौत हो गई।

मैहर और अन्य घाटी हादसे : विंध्य क्षेत्र के मैहर और प्रदेश के अन्य घाटी व घुमावदार रास्तों पर कई बार अनियंत्रित निजी बसें गहरी खाइयों में पलटीं, जिसमें कई मासूमों और परिवारों ने अपनी जान गंवाई।

लंबी दूरी की स्लीपर बसों के हादसे : बिना परमिट, ओवरलोड और तकनीकी खामियों के साथ चलने वाली कई निजी स्लीपर बसों में आग लगने या भीषण टक्कर हुई, जिसमें यात्रियों के जिंदा जलने या दम घुटने जैसी हृदयविदारक घटनाएं घटी।

निजी बसों में मुनाफे की अंधी दौड़ : निजी ऑपरेटर अक्सर तय समय से कम समय में ज्यादा चक्कर लगाने के चक्कर में बसों को तेज और लापरवाहीपूर्वक दौड़ाते हैं।

सुरक्षा मानकों की अनदेखी : कई निजी बसों में फिटनेस सर्टिफिकेट, अग्निशमन यंत्र, आपातकालीन द्वार और गति नियंत्रण उपकरण की उपलब्धता नहीं होती।

ओवरलोडिंग और चालकों की थकान : क्षमता से अधिक सवारियां भरना और एक ही ड्राइवर से लगातार कई घंटों तक लंबी दूरी की बसें चलवाना इन हादसों का बड़ा कारण बनता है।

निजी बसों की इन जानलेवा लापरवाहियों और बार-बार उजड़ते परिवारों के दर्द को देखते हुए ही शासन स्तर पर सरकारी नियंत्रण वाली ‘लोक परिवहन सेवा’ का लौटना बेहद आवश्यक माना गया, ताकि मुनाफा कमाने की होड़ के बजाय जनता की सुरक्षा सर्वोपरि रह सके।

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