अधिकतर लोग ‘काहे खुमर रई’ को समझ रहे ‘काहे को मर रई...’
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
फिल्मों के गीत जब लोकभाषा और लोक संस्कृति से जुड़ते हैं तो उनकी लोकप्रियता केवल संगीत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके शब्द भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाते हैं। इन दिनों फिल्म ‘हनुमान अंश’का चर्चित गीत ‘पार्वती’ इंटरनेट मीडिया पर खूब लोकप्रिय हो रहा है।
गीत की धुन पर बड़ी संख्या में लोग छोटे वीडियो बना रहे हैं, नृत्य कर रहे हैं और इसे गुनगुना रहे हैं। इसी बीच गीत की एक पंक्ति के उच्चारण को लेकर भी लोगों में चर्चा शुरू हो गई है।
गीत में ‘काहे जिद कर रई, काहे खुमर रई, ऐसे वर के लाने...’पंक्ति सुनाई देती है। हालांकि, कई लोग इसे सुनने में गलती के कारण ‘काहे को मर रई’ गा रहे हैं। दरअसल, इस पंक्ति में ‘को मर’ नहीं, बल्कि बुंदेली शब्द ‘खुमर रई’ का प्रयोग बताया गया है।
क्या है ‘खुमर रई’ का अर्थ?... बुंदेली लोकबोली में ‘खुमर रई’ का भाव किसी को पाने की तीव्र चाह, तड़प, बेचैनी और जिद से जुड़ा बताया जाता है। यानी किसी प्रिय व्यक्ति को पाने की इच्छा में मन का व्याकुल होना और अपनी चाह पर अडिग रहना।
यही भाव गीत में माता पार्वती के भगवान शिव के प्रति समर्पण और उन्हें पति के रूप में पाने की दृढ़ इच्छा को सामने लाता है। गीत के प्रसंग में सप्तऋषि माता पार्वती को भगवान शिव के प्रति अपनी इच्छा छोड़ने के लिए समझाने का प्रयास करते हैं।
वे शिव के साधारण स्वरूप और जीवनशैली का वर्णन करते हुए सवाल करते हैं कि उनके लिए इतनी जिद और बेचैनी क्यों की जा रही है। इसी संवाद में ‘खुमर रई’ शब्द पार्वती की गहरी चाह और दृढ़ संकल्प को अभिव्यक्त करता है।
लोकबोली के शब्द ने बढ़ाई चर्चा... क्षेत्रीय बोलियों के शब्द अक्सर सामान्य हिंदी से अलग होते हैं। सुनने में समान लगने वाले शब्दों के कारण गीतों की पंक्तियों का उच्चारण बदल जाता है। ‘खुमर रई’ भी ऐसा ही बुंदेली शब्द है, जिसे सही अर्थ के साथ समझने पर गीत का भाव और स्पष्ट हो जाता है।
गीत की लोकप्रियता ने बुंदेली भाषा की मिठास को भी चर्चा में ला दिया है। इंटरनेट मीडिया पर लोग गीत के बोल और उनके अर्थ को जानने में रुचि दिखा रहे हैं। ऐसे में यह गीत मनोरंजन के साथ स्थानीय बोली और लोक संस्कृति से लोगों को जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है।
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