हो गया दूध-पानी अलग-अलग: क्रोधित-कुपित ‘शिव’ के ‘गण’ निकले वनभूमि के कब्जेदार
KHULASA FIRST
संवाददाता

सीहोर कलेक्टर ने शासन को सौंपी जांच रिपोर्ट, 31.48 हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण
केंद्रीय मंत्री शिवराज जिनके पक्ष में धरने पर बैठे, उन्होंने 78 हजार सागौन के पौधे नष्ट कर वनभूमि कब्जाई
मोहन सरकार ने ‘दूध और पानी' कर दिया अलग, गूगल अर्थ की तस्वीरों के पकड़ में आई चोरी
सीहोर कलेक्टर की जांच में हुआ सनसनीखेज खुलासा, हजारों सागौन के पेड़ काटकर झोपड़ियां तानीं
शिवराज दिल्ली में व्यस्त हुए तो धरना स्थल की जवाबदेही बेटे कार्तिकेय के हवाले
जांच रिपोर्ट: शिवराज जिनके पक्ष में अपनी ही सरकार पर गुस्साए, वे वनभूमि के अतिक्रमणकारी
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा अंतर्गत कोसमी गांव में वनभूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर जारी राजनीतिक और प्रशासनिक घमासान में एक बेहद चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। इस पूरे मामले की जांच कर रहे सीहोर कलेक्टर ने राज्य सरकार को अपनी विस्तृत और सनसनीखेज रिपोर्ट सौंप दी है।
इस रिपोर्ट ने प्रभावित आदिवासियों और उनके समर्थन में उतरे केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के दावों को पूरी तरह से पलट कर रख दिया है। रिपोर्ट में डिजिटल और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर इस बेदखली को पूरी तरह से नियम सम्मत और वन संपदा की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया गया है।
इस रिपोर्ट के आने के बाद अब पूरे मामले का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मौका मुआयना कर वन विभाग की इस कार्रवाई को "जुल्म की पराकाष्ठा’ बताया था और जिला वन अधिकारी को हटवा दिया था, लेकिन अब कलेक्टर की इस तथ्यात्मक और तकनीकी रिपोर्ट के बाद वन विभाग का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।
बुधनी (सीहोर) के कोसमी गांव में आदिवासियों को बेदखल करने के मामले में सीहोर कलेक्टर की जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी गई है। इस रिपोर्ट में सैटेलाइट इमेज (गूगल अर्थ) के प्रमाणों के साथ कई बेहद चौंकाने वाले और सनसनीखेज खुलासे किए गए हैं, जो प्रभावित आदिवासियों और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के दावों के ठीक विपरीत हैं। कलेक्टर द्वारा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव को सौंपी गई इस जांच रिपोर्ट के बाद अब कहानी में नया मोड़ आ गया है।
रिपोर्ट में सबसे बड़ा खुलासा यह किया गया है कि वर्ष 2021 में वन विकास निगम ने इस क्षेत्र में 3.37 लाख पौधों का रोपण किया था। अतिक्रमणकारियों ने इस सरकारी प्लांटेशन में से सागौन के 78,700 पौधे काटकर नष्ट कर दिए और कुल 31.48 हेक्टेयर वनभूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर झोपड़ियां बना लीं।
आदिवासी परिवारों का दावा था कि वे इस जमीन पर साल 2004 से रह रहे हैं, लेकिन कलेक्टर की रिपोर्ट में संलग्न सैटेलाइट और गूगल अर्थ की तस्वीरों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
तस्वीरों से प्रमाणित हुआ है कि वर्ष 2021 तक यह वनभूमि पूरी तरह से खाली थी। इस जमीन पर पेड़ों को काटने और अवैध कब्जा करने की शुरुआत साल 2022 से हुई है। जांच रिपोर्ट में यह सनसनीखेज दावा भी किया गया है कि वनभूमि पर कब्जा करने वाले लोग वहां के मूल निवासी नहीं हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दूसरे जिलों से आए लोगों ने संगठित तरीके से कीमती सागौन के पेड़ों को साफ किया और वहां खेती व झोपड़ियां बनाना शुरू कर दिया। 11 अक्टूबर को की गई कार्रवाई में कुल 9 बड़े कब्जाधारियों को वहां से बेदखल किया गया था।
रिपोर्ट में शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ शिकायत का भी जिक्र
इस मामले में एक और नया मोड़ सामने आया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और विभागीय सूत्रों के अनुसार, मुख्य वन संरक्षक कार्यालय को एक शिकायत भी मिली थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बुधनी क्षेत्र के आदिवासियों को इस अतिक्रमण के लिए कथित रूप से उकसाया गया था।
इस बिंदु पर भी वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को जांच रिपोर्ट सौंपी गई है। इस रिपोर्ट के आने के बाद मामला पूरी तरह पलट गया है। जहां एक तरफ शिवराज सिंह चौहान इसे "जुल्म की पराकाष्ठा’ बताकर आदिवासियों के मानवाधिकारों और उनके 2004 से रहने की बात कर रहे थे, वहीं कलेक्टर की इस आधिकारिक रिपोर्ट ने इसे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने वाला एक नया और अवैध कब्जा साबित कर दिया है। शासन अब इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की विधिक रणनीति तैयार कर रहा है।
सैटेलाइट तस्वीरों ने किया खुलासा, 2021 तक खाली था जंगल
कलेक्टर की जांच रिपोर्ट में सबसे पुख्ता सबूत के तौर पर गूगल अर्थ और सैटेलाइट की तस्वीरें संलग्न की गई हैं। पीड़ित आदिवासी परिवारों का दावा था कि वे इस जमीन पर साल 2004 से यानी वन अधिकार कानून लागू होने के पहले से निवास कर रहे हैं।
परंतु, जांच रिपोर्ट में शामिल सैटेलाइट इमेज से यह साफ प्रमाणित हुआ है कि वर्ष 2021 तक संबंधित 31.48 हेक्टेयर वनभूमि पूरी तरह से खाली थी और वहां घना जंगल था। इस जमीन पर पेड़ों की कटाई और झोपड़ियां बनाने का काम पूरी तरह से साल 2022 के बाद शुरू हुआ, जो इसे एक नया और पूरी तरह से अवैध अतिक्रमण साबित करता है।
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