मिट्टी से मन तक की यात्रा: प्रतिमा की अनुपस्थिति में बप्पा की उपस्थिति
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
उत्सव समाप्त, शोर अब थम चुका है। चौराहों के भव्य पंडाल खाली हो रहे हैं। बांस-बल्लियां और कनात खुल रही हैं। लाउडस्पीकर खामोश हैं। जिन सड़कों पर कल तक अबीर-गुलाल-फूल उड़ रहे थे, वहां आज नगर निगम की गाड़ियां झाड़ू लगा रही हैं।
जिस पाट पर दस दिनों तक अगरबत्ती की महक और मोदक के भोग के साथ मंगलमूर्ति विराजे थे, वह पाट आज बिल्कुल खाली है।
इस खाली पाट को देखकर मन में एक सीधा सवाल उठता है। बप्पा के विसर्जन के बाद हमारे पास क्या बचा? सिर्फ सूनी दीवारें, अगरबत्ती की राख और अगले साल का औपचारिक इंतज़ार? या कुछ ऐसा भी है, जो मिट्टी के पानी में घुलने के बाद हमारे भीतर उतर सका?
मुद्गल पुराण का एक सरल विचार है, भगवान आकार में होकर भी निराकार हैं। विसर्जन से उनका लोप नहीं होता, वे शेष रह जाते हैं।ष इस बार उत्सव दस की जगह ग्यारह दिनों का रहा। कैलेंडर का यह ग्यारहवां दिन केवल एक अतिरिक्त तारीख नहीं है। यह उत्सव के उल्लास और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बीच एक ज़रूरी ठहराव है।
ग्यारह दिन तक हमने बप्पा के अलग-अलग रूपों को याद किया। हमने ईर्षा, घमंड, लालच और बेकाबू गुस्से को असुर मानकर देखा। हमने यह भी समझा कि ये विकार बाहर नहीं, हमारे अपने भीतर हैं। वे सोशल मीडिया की अंधी होड़, दिखावे और तीखी बहसों में बैठे हैं। दस दिन तक हम सब मर्यादित रहे, क्योंकि सामने बप्पा थे। पूजा का एक पवित्र माहौल था।
मगर आज बारहवां दिन उस सहज माहौल से बाहर निकलकर यथार्थ में लौटने का दिन है। आज से कैमरे बंद हैं। भक्ति की रील्स पूरी हो चुकी हैं। आज जब हम काम पर लौटेंगे, जब ट्रैफ़िक में कोई गलत दिशा से गाड़ी मोड़ देगा, जब घर या दफ्तर में किसी बात पर तनातनी होगी, तब हमारे भीतर कौन खड़ा होगा? लंबोदर का गहरा धैर्य, या वही पुराना उतावला गुस्सा?
ज़रा ठहरकर सोचिए। हमने धर्म को अक्सर सिर्फ़ एक आयोजन समझ लिया है। भव्य झांकियाँ, कानफोड़ू संगीत और विसर्जन का हुड़दंग। हम सोचते हैं कि कुछ दिन शोर मचाकर हमने कर्तव्य पूरा कर लिया।
इसके बाद हम वापस उसी तनाव, स्वार्थ और चिड़चिड़ेपन में लौटने को आज़ाद हैं। दस दिन हम बप्पा को देखते रहे। ग्यारहवें दिन बप्पा हमें देख रहे हैं कि हम अपने जीवन को कैसे संभालते हैं।
हमारे समाज में उत्सव का उल्लास सबको भाता है, मगर उसके बाद का सन्नाटा संभालना कम ही लोग जानते हैं। शादी बीत जाती है, तो बिखरी पत्तलें कोई और समेटता है। कल नदी किनारे मूर्तियां विसर्जित हुईं।
आज सुबह सफ़ाई कर्मी उसी घाट से पन्नी, सड़ी मालाएं और थर्माकोल समेट रहा है। हम फूल चढ़ाकर लौट आए, वह हमारे पीछे की गंदगी साफ़ कर रहा है। ऐसे में सोचिए, असली त्याग और कर्तव्य किसका बड़ा है?
जब बप्पा घर में थे, तो हम बेहतर इंसान बनने का जतन कर रहे थे। अब वे सामने नहीं हैं, तो क्या हम फिर से उसी उधेड़बुन, तनाव और तू-तू मैं-मैं में लौट जाएंगे? पंडाल का दृश्य याद कीजिए। वहां बप्पा सबके थे।
अमीर और ग़रीब एक ही कतार में खड़े थे। आज पंडाल हट गया। बांस गाड़ियों में लद गए। क्या बराबरी और अपनेपन का वह भाव भी उन गाड़ियों के साथ चला गया? शहर के चौराहों पर दस दिन जगमगाहट थी। आज रोशनी हट गई, मगर चौराहा वहीं है। हमारे साथ भी यही है। मूर्ति विसर्जित हो गई, मगर मन यहीं है। अब इस मन में समझदारी की रोशनी कौन जलाएगा?
बारहवें दिन का यही सबसे सुंदर पाठ है, अनुपस्थिति में भी दिव्यता की उपस्थिति महसूस करना। कल तक हम बप्पा से माँग रहे थे, सद्बुद्धि दीजिए, शांति दीजिए। आज बप्पा हम पर भरोसा जता रहे हैं।
वे कह रहे हैं कि जो संयम सीखा है, उसे रोज़ के व्यवहार में उतारो। किसी नाराज़ इंसान की बात धीरज से सुन लीजिए। किसी की ईर्षा पर मुस्कान का पानी डाल दीजिए। किसी सहकर्मी का मानसिक बोझ हल्का कर दीजिए। दस दिन बप्पा चौकी पर थे।
ग्यारहवें दिन से उन्हें हमारी आदतों में होना चाहिए। आज शाम एक छोटा-सा प्रयोग करके देखिए। उस खाली चौकी को आज खाली ही रहने दीजिए। बस पाँच मिनट उसके सामने शांत बैठिए।
वह खालीपन हमें सिखाएगा कि चीज़ों को बटोरना बहुत आसान है, मगर मन को खाली और हल्का रखना असली साधना है। हम मोबाइल में हज़ारों तस्वीरें और अनगिनत विचार भरते रहते हैं। विसर्जन हमें सिखाता है कि अनावश्यक बोझ को छोड़ना कितना ज़रूरी है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
विसर्जन कोई अंत नहीं है। यह बाहर की श्रद्धा को अपने भीतर स्थापित करने की शुरुआत है। अगर दफ्तर की मेज पर, घर की बातचीत में और सड़क के ट्रैफ़िक में हमारा मानसिक संतुलन बना रहे, तो मान लीजिए कि बप्पा कहीं नहीं गए हैं। वे हमारे आचरण में पूरी जीवंतता के साथ मौजूद हैं।
गणपति पंडाल में महाआरती, छप्पन भोग
इंदौर। खजूरी बाजार के राजा के कार्यक्रम में चिंटू जोशी द्वारा विशाल भंडारा आयोजित किया गया, जिसमें हजारों लोगों ने प्रसादी का आनंद लिया। आयोजन में करण सोनी, गणेश अग्रवाल, यश ठाकुर, अंकित चौहान, वेदांशु भाटी, शिवा बंसल, पप्पू टंकी, सरल जोशी, कैलाश बंसल, अमन व्यास का मुख्य सहयोग रहा।
डॉ. आंबेडकर नगर स्थित 174 नंबर गणेश पंडाल में बुधवार, 23 सितंबर को शिवशक्ति मंडल द्वारा भगवान श्री गणेश की भव्य महाआरती एवं छप्पन भोग प्रसादी का आयोजन किया गया। आयोजन को लेकर मंडल के सदस्यों ने विशेष तैयारियां की थीं। शाम होते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु पंडाल में पहुंचने लगे।
महाआरती के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान श्री गणेश की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। आरती के बाद भगवान गणेश को छप्पन प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया गया।
इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए छप्पन भोग प्रसादी का वितरण किया गया। कार्यक्रम के दौरान गणेश पंडाल में भक्ति और उत्साह का माहौल बना रहा। श्रद्धालु भगवान गणेश के जयकारे लगाते नजर आए।
आयोजन में नितिन तिलवे, मोहित डोबरे, मनीष ठाकुर, जीत सिरसात और जतिन चौहान सहित शिवशक्ति मंडल के सदस्य एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मंडल सदस्यों ने आयोजन में सहयोग देने वाले सभी श्रद्धालुओं का आभार जताया।
नौ से 15 वर्ष की उम्र के बच्चे निभा रहे परंपरा, करते हैं पूजन-अनुष्ठान
कम उम्र में शुरू की गई भक्ति की पहल अब किशोरावस्था तक पहुंचकर भी निरंतर जारी है। इंदौर-उज्जैन रोड स्थित कालिंदी गोल्ड सिटी में बच्चों ने करीब सात वर्ष पहले आठ वर्ष की उम्र में गणेश स्थापना की शुरुआत की थी। आज यही बच्चे 15 वर्ष की उम्र में पहुंच चुके हैं, लेकिन भगवान गणेश की आराधना का सिलसिला उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ जारी है।
कालिंदी गोल्ड सिटी निवासी आदित्यनाथ ने अपने मित्र शौर्य मराठा और अभिषेक पाल के साथ मिलकर गणेश उत्सव की शुरुआत की थी। बच्चों की इस पहल को मोहल्ले के अन्य बच्चों और रहवासियों का भी सहयोग मिला। धीरे-धीरे यह आयोजन हर वर्ष की परंपरा बन गया।
गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक बच्चे भगवान गणेश की स्थापना कर 10 दिनों तक नियमित पूजन, आरती और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। आदि बाबा मित्र मंडल के आयोजन में छोटे बच्चों के साथ किशोर भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। बच्चों की भक्ति से प्रभावित होकर मोहल्ले के बड़े भी प्रतिदिन आरती में शामिल होते हैं।
इस वर्ष पंडित सचिन तिवारी और पंडित रविंद्र पाठक के आचार्यत्व में नियमित पूजन के साथ गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ किया जा रहा है। बुधवार को महाआरती और छप्पन भोग का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
विशाल भंडारे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने ग्रहण की महाप्रसादी
‘जंगमपुरा हनुमान मंदिर के राजा’
मालगंज के समीप जंगमपुरा स्थित हनुमान मंदिर परिसर में ‘जंगमपुरा हनुमान मंदिर के राजा’ का गणेशोत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यहां पिछले 32 वर्षों से लगातार भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर गणेशोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस वर्ष भी आयोजन को लेकर क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण बना हुआ है।
गणेशोत्सव के दौरान मंदिर परिसर में प्रतिदिन भगवान गणेश की विधिवत पूजा-अर्चना और आरती की जा रही है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। इसी क्रम में बुधवार को मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर महाप्रसादी ग्रहण की।
विजय श्री ग्रुप के रोहित हतुनिया ने बताया कि 32 वर्षों से चली आ रही गणेशोत्सव की यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निरंतर जारी है। आयोजन को सफल बनाने में मोहल्लेवासियों का विशेष सहयोग और सहभागिता रहती है। गणेशोत्सव के दौरान क्षेत्र के लोग एकजुट होकर धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं।
उन्होंने बताया कि यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि क्षेत्रवासियों के आपसी जुड़ाव और सामाजिक सहभागिता का माध्यम भी बन गया है। प्रतिदिन होने वाली आरती और अन्य धार्मिक आयोजनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।
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