पूर्व विधायक और पत्नी की करोड़ों की जमीन पर हाईकोर्ट का अहम फैसला
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर विधानसभा-1 के पूर्व कांग्रेस विधायक और अब भाजपा में शामिल संजय शुक्ला और उनकी पत्नी अंजलि शुक्ला को जाख्या की जमीन के मामले में हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। करीब 250 करोड़ रुपए मूल्य की जमीन से जुड़े मामले में कोर्ट ने लैंड यूज बदलने की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है।
मामला मल्हारगंज तहसील क्षेत्र के जाख्या गांव की जमीन से जुड़ा है। शुक्ला दंपत्ति का कहना था कि उनकी जमीन को मास्टर प्लान में अलग-अलग सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित कर दिया गया, लेकिन 18 साल बीतने के बावजूद न तो जमीन का अधिग्रहण हुआ और न ही प्रस्तावित उपयोग के लिए कोई काम शुरू किया गया।
संजय और अंजलि शुक्ला के पास कितनी जमीन?
जाख्या में संजय शुक्ला के नाम पर 1.315 हेक्टेयर जमीन है, जबकि उनकी पत्नी अंजलि शुक्ला के नाम 11.437 हेक्टेयर जमीन दर्ज है। 2008 में लागू मास्टर प्लान में संजय शुक्ला की जमीन को मंडी उपयोग के लिए आरक्षित किया गया था। वहीं अंजलि शुक्ला की जमीन का लैंड यूज बस स्टैंड के लिए निर्धारित किया गया था।
18 साल में न अधिग्रहण हुआ, न शुरू हुआ काम
शुक्ला दंपति ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा कि मास्टर प्लान लागू हुए करीब 18 साल हो चुके हैं। इसके बावजूद शासन ने आरक्षित जमीन का अधिग्रहण नहीं किया और न ही उस पर प्रस्तावित परियोजना के लिए कोई काम शुरू किया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मास्टर प्लान में किसी निजी जमीन को सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित किए जाने के पीछे यह उद्देश्य होता है कि निर्धारित अवधि में उस योजना को लागू किया जाए।
लेकिन लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण जमीन का उपयोग प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कोर्ट से जमीन का लैंड यूज आवासीय किए जाने की मांग की।
सरकार ने याचिका पर क्या आपत्ति जताई?
मध्यप्रदेश शासन की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि मास्टर प्लान में लैंड यूज निर्धारित होने के बाद उसे बदलने के लिए संबंधित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आवेदन किया जाना चाहिए था।
सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि मास्टर प्लान तैयार और लागू किए जाने के दौरान आपत्ति दर्ज कराने के अवसर उपलब्ध थे, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने उस समय इसका इस्तेमाल नहीं किया। शासन ने कहा कि जब कानून में दूसरे उपाय उपलब्ध हैं तो सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर करने का आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए संपत्ति के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि संपत्ति का अधिकार संवैधानिक अधिकार है और किसी निजी जमीन को अनिश्चित अवधि तक आरक्षित रखकर उसके मालिक के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी देखा कि जमीन को जिस उद्देश्य के लिए आरक्षित किया गया था, उसके लिए 18 साल में कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। सक्षम प्राधिकारी के पास अलग से आवेदन नहीं देने की शासन की आपत्ति को भी कोर्ट ने निर्णायक नहीं माना।
हाईकोर्ट ने याचिका को ही आवेदन मानते हुए संबंधित सक्षम प्राधिकारी को मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 23-A(1)(A) के तहत लैंड यूज को आवासीय किए जाने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने इसके लिए दो महीने की समयसीमा तय की है।
दूसरे जमीन मालिकों के लिए भी बन सकता है रास्ता
इस फैसले को उन जमीन मालिकों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी निजी जमीन लंबे समय से मास्टर प्लान में किसी सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित है, लेकिन उस पर वर्षों से कोई काम नहीं हुआ।
इंदौर में नए मास्टर प्लान को लेकर लंबे समय से इंतजार है। नए मास्टर प्लान के अभाव में कई क्षेत्रों में जमीन के उपयोग और विकास को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह आदेश अन्य प्रभावित जमीन मालिकों के लिए भी कानूनी रास्ता खोल सकता है।
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