हार्ट अटैक के बढ़ते खतरे पर विशेषज्ञों ने जताई चिंता: हर 5 में से एक मरीज 20–40 साल का; खराब जीवनशैली, मोटापा, प्रदूषण और शारीरिक गतिविधियों की कमी बढ़ा सकती है जोखिम
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हृदय रोग अब केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं रह गए हैं। कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक के मामले सामने आ रहे हैं। बदलती जीवनशैली, घंटों तक बैठकर काम करना, नियमित व्यायाम की कमी, असंतुलित खानपान और बढ़ता मोटापा हृदय स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों ने लोगों को आगाह किया है कि हृदय रोगों से बचाव के लिए उम्र बढ़ने का इंतजार करने के बजाय कम उम्र से ही अपनी सेहत पर ध्यान देना जरूरी है।
वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन के अध्यक्ष और हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जगत नरूला ने इंदौर प्रेस क्लब में मीडिया से बातचीत के दौरान हृदय रोगों की बढ़ती चुनौती और उनकी रोकथाम पर चर्चा की। इस दौरान हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. ए.के. पंचोलिया, सीएसआई इंदौर के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप गुप्ता और उपाध्यक्ष डॉ. राकेश जैन भी मौजूद रहे। विशेषज्ञों ने कहा कि समय पर जांच, जीवनशैली में सुधार और जोखिम कारकों की पहचान करके हृदय रोगों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
हर पांच में से एक हार्ट अटैक मरीज की उम्र 20 से 40 साल
डॉ. राकेश जैन के अनुसार, पहले हृदय रोगों को मुख्य रूप से 50 से 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक के मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि हार्ट अटैक के लगभग हर पांच में से एक मरीज की उम्र 20 से 40 वर्ष के बीच होती है।
यह स्थिति युवाओं के लिए भी हृदय स्वास्थ्य को गंभीरता से लेने की जरूरत बताती है। कम उम्र में नौकरी, पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों के कारण लोग अक्सर अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देते हैं। लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधियों में कमी और खानपान की अनियमित आदतें धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, हृदय रोग का खतरा केवल उम्र के आधार पर नहीं आंका जा सकता। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, धूम्रपान और पारिवारिक इतिहास जैसे कारक भी जोखिम को प्रभावित करते हैं।
बिना लक्षणों के भी बढ़ सकती है बीमारी
हृदय रोगों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कई जोखिम कारक लंबे समय तक स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाते। किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप, मधुमेह या कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो सकती है, लेकिन उसे इसका पता नहीं चलता। इसी दौरान हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली कोरोनरी धमनियों में प्लाक जमा होने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ सकती है।
जब धमनियों में रक्त का प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित होता है, तब सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी या हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। कई मामलों में प्लाक के फटने और वहां खून का थक्का बनने से धमनी अचानक बंद हो जाती है।
इसलिए विशेषज्ञ नियमित स्वास्थ्य जांच को महत्वपूर्ण मानते हैं। रक्तचाप, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच से जोखिम की पहचान करने में मदद मिल सकती है। जांच कितनी बार करानी चाहिए, यह व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और अन्य जोखिम कारकों पर निर्भर करता है।
ऑफिस की कुर्सी से खानपान तक बदलती जीवनशैली
डॉ. राकेश जैन ने बताया कि आज बड़ी संख्या में लोग ऑफिस या घर पर कंप्यूटर के सामने घंटों बैठकर काम करते हैं। व्यस्त दिनचर्या के कारण पैदल चलने, व्यायाम करने और अन्य शारीरिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। इसका असर धीरे-धीरे वजन और हृदय स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
खानपान की आदतों में बदलाव भी चिंता का विषय है। घर के संतुलित भोजन के बजाय कैंटीन, रेस्तरां और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर बढ़ती निर्भरता कई लोगों के लिए समस्या बन सकती है। अधिक नमक, अतिरिक्त चीनी, अस्वास्थ्यकर वसा और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाला भोजन वजन बढ़ाने और रक्तचाप, ब्लड शुगर तथा कोलेस्ट्रॉल को प्रभावित करने में भूमिका निभा सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक समस्या केवल बाहर खाना खाने तक सीमित नहीं है। भोजन की गुणवत्ता, मात्रा और उसे खाने की नियमितता भी महत्वपूर्ण है। संतुलित आहार और सक्रिय दिनचर्या हृदय रोगों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।
मोटापा और मधुमेह भी बढ़ाते हैं हृदय रोग का खतरा
मोटापे के साथ टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप और असामान्य कोलेस्ट्रॉल का खतरा बढ़ सकता है। ये स्थितियां एक साथ मौजूद हों, तो हृदय रोगों का जोखिम और अधिक हो सकता है। शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध विकसित होने से ब्लड शुगर नियंत्रित करना भी कठिन हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वजन को स्वस्थ सीमा में बनाए रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और खानपान पर ध्यान देना जरूरी है। युवाओं को भी अपनी सेहत के प्रति लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। केवल कम उम्र होने के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं है कि हृदय रोग का खतरा नहीं हो सकता।
वायु प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं
डॉ. नरूला की चर्चा में पर्यावरणीय कारकों का मुद्दा भी सामने आया। वायु प्रदूषण को आमतौर पर सांस संबंधी बीमारियों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका संबंध हृदय स्वास्थ्य से भी है। प्रदूषण में मौजूद सूक्ष्म कणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से रक्त वाहिकाओं में सूजन और हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
ऐसे में स्वच्छ हवा और प्रदूषण नियंत्रण केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेष रूप से उन लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत हो सकती है, जिन्हें पहले से हृदय या फेफड़ों से संबंधित बीमारी है।
माइक्रोप्लास्टिक्स पर भी चल रही रिसर्च
माइक्रोप्लास्टिक्स और नैनोप्लास्टिक्स को लेकर दुनियाभर में वैज्ञानिक शोध जारी हैं। कुछ अध्ययनों में मानव शरीर के विभिन्न नमूनों और धमनियों में प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों की मौजूदगी दर्ज की गई है। कुछ शोधों में धमनियों की प्लाक में इन कणों की मौजूदगी और हृदय संबंधी घटनाओं के बीच संबंध भी सामने आया है।
धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया को समझना जरूरी
डॉ. नरूला ने बीमारी की शुरुआती पहचान और वैज्ञानिक शोध के महत्व पर भी चर्चा की। हृदय को रक्त पहुंचाने वाली कोरोनरी धमनियों की दीवारों में वसा, कोलेस्ट्रॉल और अन्य पदार्थ जमा होकर प्लाक बना सकते हैं। इस प्रक्रिया को एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है।
समय के साथ प्लाक बढ़ने से रक्त प्रवाह प्रभावित हो सकता है। यदि प्लाक फट जाता है और उसके आसपास खून का थक्का बनता है, तो धमनी अचानक बंद हो सकती है। ऐसी स्थिति में हृदय की मांसपेशियों तक पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे हार्ट अटैक हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बीमारी को शुरुआती चरण में पहचानने के लिए जोखिम कारकों का आकलन और जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण है। हर व्यक्ति को एक जैसी जांच की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए जांच का निर्णय चिकित्सकीय सलाह के आधार पर लेना चाहिए।
बीमारी का बोझ केवल इलाज तक सीमित नहीं
डॉ. नरूला ने अपने वैज्ञानिक शोध के अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताया कि बीमारी को समझने के लिए उसके जैविक कारणों के साथ यह जानना भी जरूरी है कि समाज के किन वर्गों पर उसका सबसे अधिक असर पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच, नियमित जांच का अभाव, इलाज की लागत और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की कमी के कारण कई लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता।
हृदय रोगों के मामले में शुरुआती पहचान और समय पर इलाज बेहद महत्वपूर्ण हैं। लोगों में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ जांच और उपचार की सुविधाओं तक पहुंच आसान बनाना भी जरूरी है। उन्होंने प्राचीन ममियों और वर्तमान समुदायों में एथेरोस्क्लेरोसिस से जुड़े शोध का उल्लेख करते हुए बताया कि धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया केवल आधुनिक जीवनशैली तक सीमित नहीं है। हालांकि, आज की जीवनशैली और पर्यावरणीय परिस्थितियां इस बीमारी के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं।
जीवनशैली में बदलाव से कम हो सकता है खतरा
डॉ. नरूला के अनुसार, जीवनशैली में सुधार और समय रहते सतर्कता बरतकर हृदय रोगों तथा स्ट्रोक के कई असामयिक मामलों को रोका जा सकता है। उनके अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत असामयिक हृदय रोग और स्ट्रोक के मामलों की रोकथाम संभव होने का अनुमान है। यह एक व्यापक जनस्वास्थ्य संबंधी अनुमान है, न कि हर व्यक्ति के लिए जोखिम पूरी तरह खत्म होने की गारंटी।
हृदय स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखने के लिए विशेषज्ञों की सलाह है कि लोग नियमित शारीरिक गतिविधि करें, संतुलित भोजन लें, धूम्रपान से बचें, पर्याप्त नींद लें और रक्तचाप, ब्लड शुगर तथा कोलेस्ट्रॉल पर नजर रखें। सीने में दबाव या दर्द, अचानक सांस फूलना, ठंडा पसीना या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
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