निरस्त धाराओं पर आदेश देना पड़ा भारी: नगर निगम के अधिकारी पर 1 लाख की कॉस्ट; हाईकोर्ट ने कहा-गलत आदेश से न्यायालय का समय बर्बाद हुआ
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने निरस्त हो चुकी कानूनी धाराओं के आधार पर आदेश पारित करने पर इंदौर नगर निगम के संबंधित अधिकारी पर एक लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह राशि अधिकारी से वसूल की जाए, ताकि सरकारी खजाने पर इसका बोझ न पड़े।
न्यायमूर्ति संदीप नटवरलाल भट्ट की पीठ ने मेसर्स बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मामला नगर निगम के 30 सितंबर 2026 के आदेश और उसके आधार पर 7 अक्टूबर को जारी लेजर रिपोर्ट से जुड़ा था।
2020 में निरस्त धाराओं के आधार पर दिया आदेश
मामले में नगर निगम के अधिकारी ने अधिनियम की धारा 143, 146 और 153 के आधार पर आदेश पारित किया था, जबकि ये धाराएं वर्ष 2020 में ही विलोपित हो चुकी थीं। हाईकोर्ट ने इसे गंभीर कानूनी चूक माना और कहा कि अधिकारियों को निर्णय लेते समय लागू कानूनों की जानकारी रखना और उनका पालन करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि विवादित आदेश प्रथम दृष्टया कानून के विरुद्ध है और निगम इसे वापस ले रहा है। न्यायालय ने इस कथन को रिकॉर्ड पर लिया, लेकिन कहा कि केवल आदेश वापस लेने से अधिकारी की गलती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सरकारी खजाने पर नहीं पड़ेगा भार
हाईकोर्ट ने कहा कि गलत आदेश के कारण याचिकाकर्ता को न्यायालय आना पड़ा और न्यायिक समय खर्च हुआ। ऐसी लापरवाही के कारण पैदा होने वाली मुकदमेबाजी का आर्थिक भार सरकारी खजाने पर नहीं डाला जाना चाहिए। इसी आधार पर न्यायालय ने संबंधित अधिकारी से एक लाख रुपये की कॉस्ट वसूलने के निर्देश दिए।
सात दिन में जमा करनी होगी राशि
न्यायालय ने कॉस्ट की राशि का भुगतान इस प्रकार करने के निर्देश दिए हैं: 75 हजार रुपये मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, इंदौर में जमा होंगे। 25 हजार रुपये बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड को वाद-व्यय के रूप में दिए जाएंगे। यह राशि आदेश की तारीख से सात दिनों के भीतर जमा करनी होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और जयेश गुरनानी ने पैरवी की, जबकि नगर निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज मुंशी और अधिवक्ता शशांक श्रीवास्तव उपस्थित हुए।
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