नो-एंट्री में घुसे ट्रक को 2 हजार लेकर छोड़ा: मुस्तैदी के नाम पर वसूली, 112 ने पीछा कर रोका
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर की सड़कों पर जनता की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस की मुस्तैदी उस समय सवालों के घेरे में आ गई, जब नो-एंट्री के समय में एक भारी वाहन शहर के भीतर पहुंच गया। आरोप है कि वाहन को शहर की सीमा पर ही रोकने के बजाय आगे आने दिया गया और फिर स्कीम नंबर 78 में पंचमुखी मंदिर के पास डॉयल-112 से पहुंचे दो पुलिसकर्मियों ने उसका पीछा कर रोक लिया।
पूरे घटनाक्रम में 2 हजार रुपये की कथित वसूली के आरोप भी लगाए गए हैं। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह महज यातायात नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि कानून लागू करने वाली व्यवस्था की जवाबदेही का गंभीर सवाल है।
नियम के मुताबिक, संबंधित मार्ग पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक भारी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित है। बताया गया कि ट्रक देवास नाका की ओर जा रहा था और सुबह 6 बजकर 6 मिनट पर पंचमुखी मंदिर के पास एबी रोड पर पहुंचा।
इसी दौरान डॉयल-112 से आए दो पुलिसकर्मियों ने उसे रोक लिया। सवाल यह है कि जब भारी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित था, तो ट्रक को शहर के भीतर आने से पहले ही क्यों नहीं रोका गया? प्रवेश मार्गों पर तैनात पुलिस ने उसे आगे बढ़ने से क्यों नहीं रोका?
बाहर रोकने के बजाय अंदर रोकने की रणनीति क्यों?... यातायात व्यवस्था का मकसद भारी वाहनों को प्रतिबंधित समय में शहर के भीतर आने से रोकना है, न कि उनके भीतर आ जाने के बाद कार्रवाई करना।
आरोप है कि ट्रक को ऐसी जगह रोका गया, जहां पुलिस की कार्रवाई पर आसानी से सवाल न उठाए जा सकें। इसी घटनाक्रम के साथ 2 हजार रुपये लेने का आरोप भी सामने आया है। अब यह जांच का विषय है कि ट्रक को किस रास्ते से शहर में प्रवेश मिला, उसे रोकने में देरी क्यों हुई और मौके पर वास्तव में क्या कार्रवाई की गई।
मुस्तैदी या कमाई का जरिया?... अगर पुलिस को प्रतिबंधित समय में भारी वाहन के प्रवेश की जानकारी थी, तो उसे प्रवेश मार्ग पर ही रोकना प्राथमिक जिम्मेदारी थी। शहर के भीतर पहुंचने के बाद वाहन को रोकना और फिर कथित तौर पर रुपये लेकर आगे जाने देना, पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हालांकि, 2 हजार रुपये की कथित वसूली की स्वतंत्र पुष्टि और पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच जरूरी है। संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई तभी तय होनी चाहिए, जब पूरे घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच हो।
जनता की सुरक्षा किसके भरोसे?
शहर में भारी वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही जाम और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ा सकती है। ऐसे में नो-एंट्री लागू कराने वाली पुलिस की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यदि प्रतिबंधित समय में ट्रक शहर के भीतर पहुंचते हैं और फिर कार्रवाई के दौरान कथित वसूली के आरोप लगते हैं, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। अब जरूरत इस बात की है कि घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, डॉयल-112 की लोकेशन और ड्यूटी रिकॉर्ड, वाहन चालक के बयान तथा किसी भी उपलब्ध लेन-देन संबंधी साक्ष्य की जांच कर सच्चाई सामने लाई जाए। बड़ा सवाल है कि भारी वाहन को शहर में प्रवेश करने से रोकना पुलिस की जिम्मेदारी है या उसके भीतर आने के बाद रोककर कार्रवाई करना?
नियम तोड़ने पर कार्रवाई का प्रावधान
नो-एंट्री के उल्लंघन पर मोटर वाहन अधिनियम और स्थानीय यातायात आदेशों के तहत चालानी कार्रवाई की जा सकती है। वाहन की स्थिति और उल्लंघन की प्रकृति के अनुसार अन्य कार्रवाई भी संभव है।
ऐसे मामलों में वाहन को रोकना, नियमों के मुताबिक चालान करना और जरूरत पड़ने पर सक्षम अधिकारी के समक्ष कार्रवाई के लिए प्रस्तुत करना पुलिस की जिम्मेदारी है। नियमों के तहत कार्रवाई के बजाय यदि किसी कर्मचारी ने अवैध रूप से रुपये लिए हैं, तो यह अलग से जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई का विषय है।
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