1925 में चरनोई भूमि 1951 में निजी और फिर विनायक एंटरप्राइजेस के नाम: महू की कवटी जमीन के मालिकाना हक की कड़ी गायब
KHULASA FIRST
संवाददाता

एसडीएम के आदेश में नाथू के नाम निजी दर्ज होने का हवाला, लेकिन जमीन चार भाइयों तक कैसे पहुंची, बिक्री की चेन डीड कहां?
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महू तहसील में शासकीय चरनोई जमीनों को निजी हाथों में पहुंचाने का खेल अब राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है। अधिकारी जमीन का मालिकाना हक तय करने के लिए कभी 1925-26 के मिसल बंदोबस्त को आधार बनाते हैं तो कभी बाद के राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देकर निजी स्वामित्व स्वीकार कर लेते हैं।
ग्राम कवटी की जमीन के मामले में भी यही विरोधाभास का खुलासा हुआ है। एसडीएम के 19 फरवरी 2026 के आदेश में जमीन का उल्लेख 1925-26 के मिसल बंदोबस्त में शासकीय मद में दर्ज होने के रूप में है, लेकिन 1951-52 में निजी नाम नाथू के नाम दर्ज होने को निजी स्वामित्व का आधार माना गया।
अब सवाल है कि नाथू से यह जमीन किन-किन लोगों के पास पहुंची और आखिर अजीज, रईस, नगजी और मोहब्बत के नाम मालिकाना हक कैसे आया? इस पूरी बिक्री की चेन डीड कहां है?
अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, महू के राजस्व प्रकरण क्रमांक 188/अपील/2025-26 में 19 फरवरी 2026 को पारित आदेश के अनुसार विवादित भूमि वर्ष 1925-26 के मिसल बंदोबस्त में शासकीय मद में दर्ज थी।
हालांकि, अपीलार्थियों द्वारा प्रस्तुत प्रमाणित राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर एसडीएम ने उल्लेख किया कि वर्ष 1951-52 में जमीन निजी नाम नाथू वगे के नाम दर्ज थी। इसी आधार पर निजी स्वामित्व के अधिकार स्वीकार करते हुए नामांतरण की अपील मंजूर की गई, लेकिन आदेश में दर्ज इस निष्कर्ष के बाद एक बड़ा सवाल अनुत्तरित है।
नाथू के नाम जमीन दर्ज होने के बाद वह किन लोगों को हस्तांतरित हुई? अजीज, रईस, नगजी और मोहब्बत तक मालिकाना हक पहुंचने की पूरी दस्तावेजी कड़ी क्या है? इनके पक्ष में जमीन के पुराने विक्रय विलेख, उत्तराधिकार दस्तावेज और नामांतरण आदेशों का पूरा रिकॉर्ड कहां है?
चार भाइयों से विनायक एंटरप्राइजेस तक पहुंची जमीन
एसडीएम के आदेश के अनुसार अजीज, रईस, नगजी और मोहब्बत ने रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से संबंधित जमीन अपीलार्थियों को बेची थी। इसके बाद विनायक एंटरप्राइजेस के नाम नामांतरण का रास्ता खुला, लेकिन रजिस्टर्ड विक्रय पत्र होना अपने आप में पूर्ववर्ती मालिकाना हक की पूरी शृंखला का जवाब नहीं है।
मूल सवाल यह है कि विक्रेताओं को जमीन का वैध स्वामित्व किस दस्तावेज से मिला था। यदि 1951-52 में जमीन नाथू के नाम थी, तो उनके बाद से चारों विक्रेताओं तक पहुंचने की प्रत्येक कड़ी का प्रमाणित रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए।
अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
एक ओर चरनोई जमीनों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी राजस्व अधिकारियों की है, दूसरी ओर उन्हीं जमीनों के निजी स्वामित्व और नामांतरण को लेकर विवाद सामने आ रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि वरिष्ठ अधिकारी गंभीर सवालों पर प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय अधीनस्थों को नोटिस जारी तक नहीं कर रहे हैं। सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए राजस्व दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की शिकायत भी सामने आ चुकी है।
मिसल बंदोबस्त और भू-राजस्व संहिता, दोनों का चयनात्मक इस्तेमाल?
मिसल बंदोबस्त जमीन के ऐतिहासिक राजस्व रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जबकि मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता भूमि स्वामित्व, अधिकार और राजस्व प्रशासन का कानूनी आधार है।
अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि दोनों का समग्र परीक्षण कर निर्णय लें, लेकिन कवटी के मामले में सवाल यह है कि जब 1925-26 के रिकॉर्ड में जमीन शासकीय चरनोई दर्ज थी, तब बाद की निजी प्रविष्टियों का मूल आधार क्या था? क्या शासकीय मद से निजी मद में परिवर्तन का कोई सक्षम आदेश मौजूद है? यदि है तो वह किस प्राधिकारी ने जारी किया और किस कानूनी प्रक्रिया के तहत?
सीधे सवाल
1925-26 में शासकीय चरनोई दर्ज जमीन 1951-52 में निजी कैसे हो गई?
नाथू से अजीज, रईस, नगजी और मोहब्बत तक जमीन पहुंचने की बिक्री और उत्तराधिकार की दस्तावेजी कड़ी कहां है?
निजी स्वामित्व स्वीकार करने से पहले शासकीय मद से निजी मद में परिवर्तन का आदेश किसने जारी किया?
क्या एसडीएम ने पूरी चेन डीड और मूल दस्तावेजों का परीक्षण किया?
जब चरनोई भूमि के संरक्षण की जिम्मेदारी प्रशासन की है, तो रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने और संदेह दूर करने में देरी क्यों?
यह केवल नामांतरण का मामला नहीं, बल्कि सरकारी जमीन के मालिकाना हक की पूरी शृंखला का सवाल है। जब तक 1925-26 से लेकर वर्तमान तक की सभी प्रविष्टियों, विक्रय विलेखों और नामांतरण आदेशों की जांच सार्वजनिक नहीं होती, तब तक कवटी की जमीन का विवाद खत्म नहीं होगा।
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