खनन माफिया पर फिर हुई बड़ी कार्रवाई 26,407 घनमीटर मुरम का ‘खेल’ पकड़ा: सरकारी जमीन खोदकर मुरम निकालने का आरोप; अनुमति 12,293 घनमीटर की और खनन 38,700 घनमीटर!
KHULASA FIRST
संवाददाता

एडीएम ने लगाया 7.92 करोड़ का दंड
सड़क निर्माण की अनुज्ञा बनी खनन का कवच? पोर्टल की वैध मात्रा से 26,407.689 घनमीटर ज्यादा खनन
खनन माफिया बनाम प्रशासन
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सरकारी जमीन, मुरम की अनुमति और सड़क निर्माण... लेकिन इसी आड़ में खनिज के ऐसा खेल का खुलासा हुआ कि प्रशासन को करीब 7.92 करोड़ का अर्थदंड ठोंकना पड़ा। सांवेर तहसील के ग्राम रिंगनोदिया में शासकीय भूमि पर मुरम खनन की जांच में मौके पर 38,700.729 घनमीटर खनन पाया गया, जबकि ई-खनिज पोर्टल पर वैध अनुमति महज 12,293.04 घनमीटर की थी।
यानी अनुमति की सीमा से 26,407.689 घनमीटर अधिक मुरम निकाली गई। खनिज विभाग की जांच में मौके से एक एक्सकेवेटर मशीन और छह डंपर जब्त किए गए।
मामले में एडीएम रिंकेश वैश्य ने 6 मार्च 2026 को आदेश जारी कर मेसर्स आकाश इंटरप्राइजेस सहित आठ अनावेदकों पर 7,92,25,100 का संयुक्त अर्थदंड लगाया है।
सड़क के नाम पर अनुमति, लेकिन मुरम कहां गई?... मेसर्स आकाश इंटरप्राइजेस को मुरम की अस्थायी अनुज्ञा विशिष्ट शासकीय सड़क निर्माण कार्य पैकेज एमपी-17704 के लिए दी गई थी। नियम के अनुसार इस अनुमति के तहत निकाली गई मुरम का इस्तेमाल उसी निर्धारित सड़क निर्माण में होना था, लेकिन प्रशासनिक जांच में मौके पर हुए खनन और सड़क निर्माण में उपयोग के बीच भारी अंतर का खुलासा हुआ।
एडीएम के आदेश में कहा गया कि अनुज्ञा की आड़ में खनिज का व्यावसायिक दुरुपयोग किया गया। यानी अनुमति सड़क की थी, लेकिन प्रशासन के सामने सवाल खड़ा हो गया कि अतिरिक्त मुरम आखिर गई कहां?
पोकलेन और छह डंपर ने किया खुलासा... 20 फरवरी 2024 को खनिज विभाग की टीम मौके पर पहुंची तो वहां एक एक्सकेवेटर मशीन और छह डंपर मिले, जिन्हें जब्त कर लिया गया। इसके बाद 23 मार्च 2024 को संबंधित हल्का पटवारी के साथ मौके और राजस्व रिकॉर्ड का मिलान किया गया।
ग्राम रिंगनोदिया स्थित शासकीय भूमि सर्वे नंबर 204, कुल रकबा 1.072 हेक्टेयर में हुए खनन की मात्रा का आकलन किया गया। मौके की माप ने कहानी बदल दी। पोर्टल की अनुमति और वास्तविक खनन के बीच इतने बड़े अंतर का खुलासा हुआ कि प्रशासन ने अतिरिक्त मुरम को अवैध खनन माना।
कौन देगा 26,407.689 घनमीटर मुरम का हिसाब?... प्रशासन के निष्कर्ष के मुताबिक 26,407.689 घनमीटर मुरम ऐसी थी, जिसके लिए वैध अनुमति उपलब्ध नहीं थी।
इस अतिरिक्त खनिज का कोई वैध लेखा-जोखा अनावेदकों द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सका। यहीं से मामला महज अनुमति की तकनीकी गड़बड़ी से निकलकर बड़े अवैध खनन के रूप में सामने आया।
सरकारी जमीन से खनिज निकला, डंपरों से परिवहन हुआ और अतिरिक्त मात्रा का हिसाब नहीं मिला। अब प्रशासन ने इसकी कीमत करोड़ों में तय कर दी है।
3.96 करोड़ की शास्ति बनी 7.92 करोड़... प्रकरण में प्रस्तावित शास्ति करीब 3.96 करोड़ थी। अवैध खनन प्रमाणित होने और प्रशमन नहीं किए जाने के बाद नियमों के तहत शास्ति की दोगुना राशि अधिरोपित की गई।
प्रशासन ने इतना लगाया दंड... एडीएम ने कुल 7 करोड़ 92 लाख 25 हजार 100 रुपए का संयुक्त अर्थदंड लगाया। राशि जमा नहीं करने पर प्रशासन को भू-राजस्व के बकाया की तरह इसकी वसूली करने का अधिकार रहेगा।
अब माफिया की जेब पर प्रशासन की चोट... खनन के मामलों में अक्सर मशीनें जब्त होती हैं, पंचनामा बनता है और मामला वर्षों तक चलता रहता है, लेकिन रिंगनोदिया मामले में प्रशासन ने सीधे करोड़ों रुपए के अर्थदंड का आदेश देकर कार्रवाई को गंभीर बना दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आदेश में सिर्फ अवैध खनन का उल्लेख नहीं, बल्कि स्वीकृत मात्रा और वास्तविक खनन के बीच भारी अंतर को आधार बनाया गया है।
सरकारी जमीन से खनिज निकालने वालों के लिए यह आदेश साफ संदेश है कि अनुज्ञा की आड़ में स्वीकृत सीमा से बाहर खनिज निकाला तो अनुमति भी नहीं बचाएगी और करोड़ों का दंड भी झेलना पड़ेगा।
पैसा नहीं दिया तो जमीन-जायदाद से होगी वसूली... एडीएम ने आदेशित किया है कि अर्थदंड की राशि खनिज विभाग के निर्धारित मद में जमा कर चालान की प्रति न्यायालय में प्रस्तुत की जाए।
राशि जमा नहीं करने पर मध्य प्रदेश खनिज (अवैध खनन, परिवहन तथा भंडारण का निवारण) नियम, 2022 के नियम 22 के तहत भू-राजस्व के बकाया की तरह वसूली की जाएगी।
‘हमारे पास वैध अनुमति थी’तर्क भी काम नहीं आया
अनावेदकों की ओर से वैध अनुमति होने का तर्क दिया गया। ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण के 2 मई 2024 के पत्र का भी हवाला दिया गया, लेकिन एडीएम ने ई-खनिज पोर्टल के आंकड़ों को महत्वपूर्ण माना।
आदेश में स्पष्ट किया गया कि परिवहन के लिए ई-खनिज पोर्टल वैधानिक माध्यम है। पोर्टल पर दर्ज मात्रा से अधिक खनिज का संचालन वैध नहीं माना जा सकता। अनावेदक यह भी स्पष्ट नहीं कर सके कि पोर्टल पर दर्ज वैध मात्रा और मौके पर मिले कुल उत्खनन के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों था।
जिनके नाम आदेश में, उन पर संयुक्त दंड
आदेश के अनुसार निम्न अनावेदकों पर संयुक्त रूप से अर्थदंड लगाया गया है-
1. मेसर्स आकाश इंटरप्राइजेस, प्रो. आकाश चौहान
2. महेश बाबेरिया- वाहन चालक
3. अजय चौहान- वाहन चालक
4. इदा देवका- वाहन मालिक
5. अभिषेक चौहान- वाहन मालिक
6. शुभम चौहान- वाहन मालिक
7. सुदेश कुमार जाटव- वाहन चालक
8. ऋषभ अहिरवार- वाहन चालक
अनुमति छोटी, खनन का आंकड़ा बड़ा
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ई-खनिज पोर्टल पर महज 12,293.04 घनमीटर की वैध अनुमति थी तो जमीन से 38,700.729 घनमीटर मुरम आखिर कैसे निकल गई?
प्रशासन के अनुसार स्वीकृत मात्रा से अधिक या स्वीकृत प्रयोजन से अलग निकाला गया खनिज वैध अनुमति की आड़ में भी वैध नहीं माना जा सकता। यही वह बिंदु है, जिसने पूरे मामले को गंभीर अवैध खनन के रूप में बदल दिया।
सुपुर्दगी पर छोड़ा वाहन भी अब फंसा
प्रकरण के दौरान जब्त वाहनों में से एक वाहन को 3 लाख की सुपुर्दगी राशि जमा कराने के बाद सुपुर्दगी पर दिया गया था। रिकॉर्ड में वाहन क्रमांक एमपी 09 एचएच 1959 का उल्लेख है। अब एडीएम ने नियम 21 के तहत दी गई वाहनों की सुपुर्दगी को भी निरस्त कर दिया है।
खनन के खेल का पूरा गणित
बिंदु प्रशासनिक रिकॉर्ड
शासकीय भूमि सर्वे नंबर 204
भूमि का रकबा 1.072 हेक्टेयर
मौके पर कुल खनन 38,700.729 घनमीटर
पोर्टल पर वैध अनुमति 12,293.04 घनमीटर
अतिरिक्त/अवैध खनन 26,407.689 घनमीटर
मौके से जब्त मशीन 01 एक्सकेवेटर
जब्त वाहन 06 डंपर
प्रस्तावित शास्ति करीब 3.96 करोड़
अंतिम अर्थदंड 7,92,25,100
कार्रवाई की टाइम लाइन
20 फरवरी 2024
मौके पर जांच, एक एक्सकेवेटर और छह डंपर जब्त।
23 मार्च 2024
हल्का पटवारी के साथ राजस्व रिकॉर्ड और खनित क्षेत्र का परीक्षण।
2 मई 2024
ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण के पत्र का अनावेदकों ने
बचाव में हवाला दिया।
7 अप्रैल 2025
वाहन सुपुर्दगी के लिए 3 लाख राशि जमा।
11 अप्रैल 2025
वाहन को सुपुर्दगी में दिए जाने का आदेश।
6 मार्च 2026
एडीएम रिंकेश वैश्य ने अवैध खनन प्रमाणित करते हुए 7.92 करोड़ का अर्थदंड लगाया और सुपुर्दगी निरस्त की।
इतने बड़े खनन की भनक पहले क्यों नहीं लगी?
यह कार्रवाई अवैध खनन के खिलाफ प्रशासन की सख्ती का संदेश जरूर देती है, लेकिन इससे कई सवाल भी खड़े होते हैं।
1.07 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर पोकलेन और छह डंपर चल रहे थे तो स्थानीय निगरानी तंत्र कहां था?
वैध अनुमति 12,293 घनमीटर की थी तो 38,700 घनमीटर तक खनन कैसे पहुंच गया?
अतिरिक्त 26,407.689 घनमीटर मुरम आखिर कहां गई?
यदि खनिज सड़क निर्माण के लिए था तो निर्धारित कार्य में वास्तविक उपयोग कितना हुआ?
इतनी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त खनिज के परिवहन के दौरान जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था क्या थी?
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