कागजों में 33 पॉलीहाउस: बैंक से निकल गए 9.70 करोड़ रुपए
KHULASA FIRST
संवाददाता

ईओडब्ल्यू की जांच में बड़ा खुलासा
33 किसानों के नाम पर 7.80 करोड़ के लोन
16 मामलों में लोन मंजूरी से पहले ही तैयार हो गए पूर्णता प्रमाण पत्र
बंधक जमीन पर फिर 1.90 करोड़ का ऋण
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
खेत में पॉली हाउस का कहीं अता-पता नहीं और कागजों में निर्माण पूरा। राष्ट्रीय बागवानी मिशन की योजना को ही कमाई का जरिया बनाकर बैंक से करोड़ों रुपए निकालने के कथित खेल का ईओडब्ल्यू की जांच में खुलासा हुआ है।
33 किसानों के जमीन संबंधी दस्तावेज लेकर उनके नाम पर 7 करोड़ 80 लाख 85 हजार रुपए के ऋण मंजूर कराए गए और पॉलीहाउस बनाए बिना ही रकम निजी फर्मों को पहुंचा दी गई। इतना ही नहीं, जांच में 16 प्रकरण ऐसे मिले जिनमें ऋण मंजूर होने से पहले ही पॉलीहाउस के काम पूरा होने के प्रमाण पत्र तैयार हो चुके थे।
बैंक को आर्थिक क्षति पहुंचाने का आरोप... इसी जांच के दौरान पहले से बैंक में बंधक एक हेक्टेयर जमीन पर दोबारा 1.90 करोड़ रुपए का ऋण मंजूर कराने का मामला भी सामने आया।
दोनों मामलों में बैंक को कुल 9 करोड़ 70 लाख 85 हजार रुपए की आर्थिक क्षति पहुंचाने का आरोप है। ईओडब्ल्यू ने निजी फर्मों के संचालकों-भागीदारों और बैंक के तत्कालीन अधिकारियों समेत आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
निजी संस्थाओं को भुगतान करा दिया... ईओडब्ल्यू एसपी रामेश्वर सिंह यादव के अनुसार 33 किसानों को लाभ का प्रलोभन देकर उनकी जमीन के दस्तावेज लिए गए। इसके बाद राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत पॉलीहाउस निर्माण के लिए बैंक ऑफ बड़ौदा, खरगोन में 33 ऋण प्रकरण प्रस्तुत किए गए।
आरोप है कि ऋण स्वीकृत होने के बाद भी खेतों में निर्माण नहीं हुआ, लेकिन कागजों में काम पूरा दिखाकर निजी संस्थाओं को भुगतान करा दिया गया। जांच में मेसर्स किसान एग्रो को 20 पॉलीहाउस बनाने थे।
आरोप है कि एक भी पॉलीहाउस बनाए बिना सभी 20 प्रकरणों के कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र तैयार कर भुगतान प्राप्त कर लिया गया। एवीआई एग्रीकल्चर सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को पांच पॉलीहाउस बनाने थे।
इनमें दो का निर्माण न होने के बावजूद पांचों ऋण प्रकरणों में भुगतान प्राप्त करने का आरोप है। वहीं सिरांश टेक्नो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को आठ पॉलीहाउस का काम दिया गया था, लेकिन जांच में बिना निर्माण के ही पूर्णता प्रमाण पत्र के आधार पर भुगतान लेने की बात सामने आई है।
प्रमाण पत्रों को प्रथम दृष्टया कूटरचित माना ... जांच में दस्तावेजों की टाइमिंग ने पूरे मामले पर सवाल खड़े कर दिए। कुल 33 प्रकरणों में तीन में जिस दिन ऋण राशि का भुगतान हुआ, उसी दिन का पूर्णता प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया।
12 मामलों में भुगतान से पहले की तारीख का प्रमाण पत्र मिला, जबकि 16 मामलों में ऋण स्वीकृति से भी पहले पॉलीहाउस निर्माण पूरा होने का प्रमाण पत्र तैयार मिला। ईओडब्ल्यू ने इन प्रमाण पत्रों को प्रथम दृष्टया कूटरचित माना है।
बंधक जमीन भी नहीं बची, उसी पर फिर 1.90 करोड़
मामले में जमीन के दोबारा इस्तेमाल का आरोप भी सामने आया। ईओडब्ल्यू के मुताबिक नारायण सिंह की ग्राम भीलगांव, खरगोन स्थित करीब एक हेक्टेयर जमीन पहले से बैंक में बंधक थी।
इसके बावजूद बैंक की सहमति और एनओसी लिए बिना उसी संपत्ति को दोबारा बंधक रखकर 7 दिसंबर 2015 को 1.90 करोड़ रुपए का कैश क्रेडिट ऋण स्वीकृत किया गया। आरोप है कि इस प्रक्रिया में तत्कालीन बैंक अधिकारियों की भूमिका भी रही।
इन पर एफआईआर, जांच में खुलेंगे और कई राज
ईओडब्ल्यू ने राज इको फर्म्स के भागीदार राजेंद्र सिंह तंवर और नितिन गांवशिंदे, सिरांश टेक्नो इंडिया के निदेशक सौरभ दुबे, किसान एग्रो के नरेंद्र पंवार, एवीआई एग्रीकल्चर सॉल्यूशन के निदेशक ब्रजपालसिंह चौधरी व अविनाश पाटीदार, नारायण सिंह तथा बैंक के तत्कालीन मुख्य शाखा प्रबंधक केके सरवटे, ऋण प्रबंधक शुभम सोहनी और बैंक अधिकारी चंद्रशेखर राठौड़ सहित अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
जांच में कथित साजिश, धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेजों के इस्तेमाल और बैंक राशि की हेराफेरी से जुड़े आरोप सामने आए हैं। अब जांच का बड़ा सवाल यही है कि किसानों के नाम पर मंजूर रकम आखिर किन खातों तक पहुंची, फर्जी पूर्णता प्रमाण पत्र किसने तैयार किए और बैंक स्तर पर ऋण स्वीकृति व भुगतान से पहले की जांच में इतनी बड़ी गड़बड़ी कैसे नजरअंदाज हुई।
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