नगरीय निकायों में 250 करोड़ के अनुमानित भ्रष्टाचार की स्कैनिंग पर क्यों मच रहा हल्ला
KHULASA FIRST
संवाददाता

गुनहगारों के गुनाह का खुलासा ‘गुनाह’ नहीं, भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की बात होना चाहिए
तकनीक आधारित नियंत्रण मॉडल पर होनी चाहिए बात
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में करीब ₹250 करोड़ के अनुमानित भ्रष्टाचार को उजागर करने की कवायद पर बहस अजीब मोड़ पर पहुंच गई है। ऐसा लग रहा है, जैसे गुनहगारों के गुनाह सामने लाना ही गुनाह हो गया हो।
यह संदेश भी निकल कर आ रहा है कि भ्रष्टाचार पर जब भी गहरी चोट होती है तो चौतरफा हल्ला या शोर मचाया जाता है। यही नहीं मुद्दे को भटकाने, ध्यान बांटने और मीडियागिरी वाले प्रयास भी होते हैं।
ऐसी सियासत क्यों होती है, यह सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण है। ऐसा ही इस समय भी हो रहा है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के प्रमुख सचिव संजय दुबे ने प्रदेश भर के मुख्य नगरपालिका अधिकारियों (सीएमओ) को भोपाल बुलाकर डेटा एनालिसिस के जरिए गड़बड़ियों की तस्वीर रखी। उन्होंने कहा कि जो हो रहा है, वह सरकार से छिपा नहीं है।
तारीफ की जगह चटखारे
इस प्रयास की सराहना होनी चाहिए थी कि भ्रष्टाचार के नासूर की पहले स्कैनिंग कराई गई, फिर उसके इलाज की बात शुरू हुई। इसके उलट, इसे विभागीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच कथित गुटबाजी की कहानी बनाकर परोसा जा रहा है।
बोफोर्स जैसे बड़े घोटालों की तर्ज पर इसे पेश करने वाले भी जानते हैं कि ऐसे मामलों में जांच और कार्रवाई का पारंपरिक फॉर्मूला शायद ही कभी नतीजे देता है।
अनूठा और साहसिक प्रयास
जिस प्रशासनिक माहौल में अधिकांश अधिकारी रिश्वतखोरी की चर्चा तक से कतराते हैं, वहां इसका सार्वजनिक रूप से खुलासा करना साहस का काम है। निकायों में 20 से 25 प्रतिशत कमीशन का चलन पुराना और व्यापक है।
₹250 करोड़ का अनुमान इसी पैमाने पर आधारित बताया जा रहा है। यह समस्या नई नहीं है, पर इसे डेटा के साथ अधिकारियों के सामने रखना नई बात है।
अब जरूरत इन बातों की
नियंत्रण का स्थायी सिस्टम: स्कैनिंग के बाद भ्रष्टाचारी तत्काल चिह्नित हों और समय पर सजा मिले, ऐसी प्रणाली बने।
तकनीक का उपयोग: सरकार और टेक्नोक्रेट मिलकर सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार से बचाने वाले तकनीकी उपाय विकसित करें।
अन्य विभागों में विस्तार: जल संसाधन, वन, आदिम जाति कल्याण, कृषि और ग्रामीण विकास जैसे विभागों में भी ऐसी स्कैनिंग हो। जैसे कैग (सीएजी) सरकारी धन की गड़बड़ियां उजागर करता है, वैसी ही नियमित व्यवस्था बने।
स्पष्ट घोषणा: सरकार और विभागीय नेतृत्व खुलकर कहे कि यह लंबे होमवर्क के बाद सुशासन की नीति के तहत योजनाबद्ध प्रयास है और इसे और मजबूत किया जाएगा।
मूल मुद्दा छोड़, अदावत की कहानी
मीडिया और राजनीति से जुड़े कुछ लोग इस मामले को विभागीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच कथित टकराव के रूप में पेश कर रहे हैं। भ्रष्टाचार जैसी आम, लेकिन बेहद गंभीर समस्या के समाधान और नियंत्रण पर चर्चा करने के बजाय अजीबोगरीब राजनीतिक तर्क गढ़े जा रहे हैं।
बोफोर्स जैसे घोटालों की तर्ज पर इसे पेश करने वाले भी जानते हैं कि ऐसे मामलों में जांच और कार्रवाई का परंपरागत फॉर्मूला शायद ही कभी ठोस नतीजे देता है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि इसके पीछे कौन किससे नाराज है। सवाल यह है कि भ्रष्टाचार कैसे रुके और दोषी को सजा कैसे मिले।
स्थानीय निकायों में कमीशनखोरी कोई नई बात नहीं है। यह कांग्रेस के शासनकाल से लेकर आज तक चली आ रही व्यवस्थागत बीमारी है। पंचायत से लेकर वार्ड स्तर तक कमीशन का 20 से 25 प्रतिशत का चलन आम धारणा में दर्ज है और ₹250 करोड़ का अनुमान इसी पैमाने पर आधारित बताया जा रहा है।
इंदौर जैसे बड़े शहरों के निकायों और प्राधिकरणों में रिश्वतखोरी का पैमाना भी किसी से छिपा नहीं माना जाता। आम लोग सब जानते हैं, सब भुगतते हैं, फिर भी व्यवस्था चलती रही है।
ऐसे माहौल में, जब अधिकांश अधिकारी रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार पर बात तक करने को तैयार नहीं दिखते, एक नासूर बन चुकी समस्या की पहले स्कैनिंग कराना और फिर उसके इलाज की बात करना अपने आप में साहसिक और अनूठा प्रयास है। संजय दुबे के इस प्रयास की तारीफ होनी चाहिए थी।
मुख्यमंत्री का संदेश
इस प्रयोग को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उस मंशा से जोड़कर देखा जा रहा है कि जो अब तक होता रहा, वह आगे नहीं चलेगा। जिम्मेदार अधिकारियों को उनके कामकाज का हिसाब डेटा के साथ दिखाना व्यवस्था को आईना दिखाने जैसा है।
मुख्यमंत्री कोई भी हो- ठेके, परमिट, टेंडर, तबादले और जमीन जैसे क्षेत्रों में जड़ जमाए हितों पर अंकुश लगाने की हर कोशिश असहजता पैदा करती है। ऐसे में ध्यान भटकाने के लिए राजनीतिक अदावत की कहानियां गढ़ी जाना अस्वाभाविक नहीं है।
अब जरूरत इन कदमों की
जवाबदेही तय हो: डेटा में चिह्नित गड़बड़ियों में कितनी अधिकारियों ने स्वयं की और कितनी राजनीतिक दबाव या संरक्षण में, यह सार्वजनिक होना चाहिए। जिनके नाम सामने आएं, उन पर कार्रवाई हो, चाहे अधिकारी हों या राजनेता।
स्थायी नियंत्रण प्रणाली: स्कैनिंग के बाद भ्रष्टाचारी तत्काल उजागर हों और समय पर सजा मिले, ऐसा तंत्र बने।
तकनीक का बेहतर उपयोग: सरकार और टेक्नोक्रेट मिलकर सरकारी सिस्टम को भ्रष्टाचार से बचाने वाले तकनीकी तरीके विकसित और लागू करें।
अन्य विभागों में विस्तार: जल संसाधन, वन, आदिम जाति कल्याण, कृषि और ग्रामीण विकास जैसे विभागों में भी ऐसी स्कैनिंग तुरंत कराई जाए। जैसे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) सरकारी धन की गड़बड़ियां उजागर करता है, वैसी ही नियमित और संस्थागत व्यवस्था बने।
स्पष्ट घोषणा: सरकार और विभागीय नेतृत्व खुलकर कहे कि यह लंबे होमवर्क के बाद सुशासन की नीति के तहत योजनाबद्ध प्रयास है, जिसे और मजबूत किया जाएगा और अन्य विभागों में भी अपनाया जाएगा।
देश के लिए मॉडल बन सकता है
अब तक सरकार और समाज के पारंपरिक प्रयास भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम रहे हैं। ऐसे में मध्य प्रदेश का यह प्रयोग देश भर की सरकारों के लिए भ्रष्टाचार नियंत्रण का नया मॉडल बन सकता है। शर्त यही है कि सरकार की नीयत साफ हो और कार्रवाई सचमुच हो।
प्रयास काफी हद तक नाकाम
भ्रष्टाचार रोकने के अब तक के सरकारी और सामाजिक प्रयास काफी हद तक नाकाम रहे हैं। ऐसे में मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग का यह प्रयोग देश भर की सरकारों के लिए भ्रष्टाचार नियंत्रण का नया मॉडल बन सकता है। शर्त एक ही है कि सरकार की नीयत साफ हो और स्कैनिंग के बाद कार्रवाई भी हो।
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