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माओवादी मुक्ति से शांति एवं संतुलन की नई संभावनाएं

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संवाददाता

01 अप्रैल 2026, 6:12 pm
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माओवादी मुक्ति से शांति एवं संतुलन की नई संभावनाएं

ललित गर्ग वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
माओवादी मुक्ति का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि देश के उन क्षेत्रों में शांति और स्थिरता स्थापित होगी, जो लंबे समय से हिंसा की चपेट में रहे हैं। जब बंदूकें खामोश होंगी, तब विकास की आवाज बुलंद होगी। सड़कें बनेंगी, स्कूल खुलेंगे, अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ेंगी और सबसे महत्वपूर्ण- लोगों के जीवन में सुरक्षा और विश्वास का संचार होगा।

भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक राष्ट्र के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां हमेशा से बहुआयामी रही हैं। इन चुनौतियों में नक्सलवाद या माओवादी हिंसा एक ऐसी समस्या रही, जिसने दशकों तक देश की आंतरिक शांति, विकास और सुशासन को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्र प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियों ने न केवल विकास को अवरुद्ध किया, बल्कि हजारों निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान भी ली। लेकिन आज जब बस्तर जैसे माओवादी गढ़ से 25 लाख के इनामी सरगना पापा राव का अपने साथियों सहित आत्मसमर्पण करना एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आया है, तब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत माओवादी मुक्ति की ऐतिहासिक दहलीज पर खड़ा है।

नक्सलवाद की जड़ें सामाजिक-आर्थिक असमानता, उपेक्षा और शोषण में रही हैं, लेकिन समय के साथ यह आंदोलन अपने मूल उद्देश्यों से भटककर एक हिंसक और विध्वंसकारी विचारधारा में बदल गया। माओवादी संगठन न केवल विकास कार्यों में बाधा डालते रहे, बल्कि उन्होंने स्थानीय लोगों को भय और हिंसा के माध्यम से नियंत्रित किया। स्कूल, सड़क, स्वास्थ्य केंद्र जैसे बुनियादी ढांचे को नष्ट करना उनकी रणनीति का हिस्सा बन गया था। इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह आंदोलन अब जनहित का नहीं, बल्कि सत्ता और नियंत्रण का माध्यम बन चुका है।

भारत सरकार द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद/माओवाद से मुक्त करने का जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, वह अब लगभग अपनी अंतिम अवस्था में पहुंचता दिखाई दे रहा है। पिछले एक दशक में 10,000 से अधिक माओवादियों के आत्मसमर्पण, सुरक्षा बलों की आक्रामक एवं रणनीतिक कार्रवाई तथा प्रभावित क्षेत्रों में तेज़ी से हुए विकास कार्यों ने माओवादी आंदोलन की जड़ों को कमजोर कर दिया है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में माओवादी हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। विशेष रूप से शीर्ष नेतृत्व के आत्मसमर्पण, जैसे दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्यों के सरेंडर ने संगठन को नेतृत्वहीन कर दिया, जिससे माओवादी संरचना भीतर से कमजोर पड़ गई। इस सफलता के पीछे सरकार की बहुआयामी रणनीति रही, जिसमें केवल सैन्य-पुलिस कार्रवाई ही नहीं, बल्कि विकास, पुनर्वास और प्रशासनिक पहुंच को भी समान महत्व दिया गया।

रेड कॉरिडोर क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का निर्माण, मोबाइल टावरों के माध्यम से 4जी नेटवर्क का विस्तार, स्कूलों और आईटीआई संस्थानों की स्थापना ने इन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा। वहीं ‘फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों’ की रणनीति के माध्यम से सुरक्षा बलों ने माओवादियों के गढ़ों में घुसकर निर्णायक कार्रवाई की। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता, रोजगार और समाज में पुनर्स्थापना की व्यवस्था ने भी माओवादी कैडर को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया।

यह समन्वित रणनीति, दूरदर्शिता और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है कि देश आज नक्सलवाद के अंत के ऐतिहासिक चरण के निकट खड़ा दिखाई दे रहा है।

निश्चित ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी और दृढ़ रणनीति अपनाई। गृहमंत्री अमित शाह की सूझबूझ और स्पष्ट दृष्टिकोण ने इस अभियान को एक नई दिशा दी। सरकार ने एक ओर जहां सुरक्षा बलों को आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और संसाधनों से सशक्त किया, वहीं दूसरी ओर विकास योजनाओं को भी गति दी। ‘सुरक्षा और विकास’ के इस दोहरे दृष्टिकोण ने माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन की नींव रखी। पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षाबलों द्वारा चलाए गए सघन अभियानों ने माओवादी नेटवर्क को गहराई से कमजोर किया है। बस्तर, जो कभी माओवादियों का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां आज आत्मसमर्पण की घटनाएं बढ़ रही हैं। पापा राव जैसे शीर्ष माओवादी नेता का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि माओवादी संगठन अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह केवल एक व्यक्ति का आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि एक विचारधारा के पतन का प्रतीक है।

माओवादी मुक्ति का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि देश के उन क्षेत्रों में शांति और स्थिरता स्थापित होगी, जो लंबे समय से हिंसा की चपेट में रहे हैं। जब बंदूकें खामोश होंगी, तब विकास की आवाज बुलंद होगी। सड़कें बनेंगी, स्कूल खुलेंगे, अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ेंगी और सबसे महत्वपूर्ण, लोगों के जीवन में सुरक्षा और विश्वास का संचार होगा। आदिवासी और ग्रामीण समुदाय, जो अब तक भय और असुरक्षा में जी रहे थे, वे अब अपने अधिकारों और अवसरों का पूर्ण लाभ उठा सकेंगे। इसके साथ ही, माओवादी हिंसा के समाप्त होने से भारत की आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी। जब देश के भीतर शांति होगी, तब ही बाहरी खतरों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकता है। नक्सलवाद जैसी समस्याएं अक्सर विदेशी शक्तियों और असामाजिक तत्वों के लिए भी अवसर प्रदान करती हैं, जिन्हें समाप्त करना राष्ट्रीय हित में अत्यंत आवश्यक है। इस दृष्टि से माओवादी मुक्ति न केवल आंतरिक, बल्कि सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।

आदर्श शासन व्यवस्था की स्थापना के लिए कानून का शासन, पारदर्शिता, जवाबदेही और विकास की समान पहुंच आवश्यक होती है। माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में इन सभी तत्वों का अभाव था। वहां प्रशासन की पहुंच सीमित थी और लोकतांत्रिक संस्थाएं प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर पा रही थीं। लेकिन अब जब माओवादी प्रभाव घट रहा है, तब सरकार के लिए यह अवसर है कि वह इन क्षेत्रों में सुशासन की मजबूत नींव रखे।

पंचायतों को सशक्त किया जाए, स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहित किया जाए और जनभागीदारी को बढ़ावा दिया जाए। यह भी आवश्यक है कि माओवादी विचारधारा के प्रभाव को केवल सुरक्षा उपायों से ही नहीं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी चुनौती दी जाए। शिक्षा, जागरूकता और संवाद के माध्यम से लोगों को यह समझाना होगा कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। लोकतंत्र में परिवर्तन का मार्ग शांतिपूर्ण और संवैधानिक होता है।

माओवादी मुक्ति के इस दौर में यह भी ध्यान रखना होगा कि जिन कारणों से यह समस्या उत्पन्न हुई थी, वे दोबारा न उभरें। सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और विकास की समावेशी नीति को प्राथमिकता देना आवश्यक है। आदिवासी क्षेत्रों में उनकी संस्कृति, पहचान और अधिकारों का सम्मान करते हुए विकास की योजनाएं लागू की जानी चाहिए।

केवल भौतिक विकास ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक सशक्तिकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में जिस दृढ़ता और दूरदर्शिता के साथ माओवादी समस्या का समाधान किया जा रहा है, वह न केवल वर्तमान के लिए, बल्कि भविष्य के लिए भी एक मार्गदर्शक है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)

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