एनकाउंटर केस में फिर गरमाई कानूनी लड़ाई: 21 पुलिसकर्मियों की बरी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती; मृतक के भाई ने दायर की याचिका
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
करीब दो दशक पुराने चर्चित सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में कानूनी लड़ाई एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। मृतक के छोटे भाई नयाबुद्दीन शेख ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 21 पुलिसकर्मियों समेत 22 आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपीलें खारिज कर दी गई थीं।
याचिका में हाईकोर्ट के 7 मई 2026 के फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने विशेष सीबीआई अदालत के दिसंबर 2018 के फैसले में आरोपियों को बरी किए जाने में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष का मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और घटनाओं की कड़ी में कई महत्वपूर्ण कड़ियां साबित नहीं हो सकीं।
2005 में सामने आया था मामला
अभियोजन के अनुसार, नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति को पुलिस ने हैदराबाद से महाराष्ट्र जा रही बस से कथित तौर पर हिरासत में लिया था। इसके बाद 26 नवंबर को अहमदाबाद के पास सोहराबुद्दीन की कथित मुठभेड़ में मौत हुई। तीन दिन बाद कौसर बी की भी हत्या होने का आरोप है।
मामले के प्रमुख चश्मदीद गवाह माने गए तुलसीराम प्रजापति की दिसंबर 2006 में गुजरात-राजस्थान सीमा पर एक अन्य कथित मुठभेड़ में मौत हो गई थी। बाद में प्रजापति की मौत का मामला भी सोहराबुद्दीन मामले के साथ जोड़ दिया गया।
2018 में विशेष सीबीआई कोर्ट ने किया था बरी
मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने और सुनवाई मुंबई ट्रांसफर होने के बाद विशेष सीबीआई अदालत ने दिसंबर 2018 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने माना था कि अभियोजन पक्ष सोहराबुद्दीन और अन्य की हत्या की साजिश को ठोस रूप से साबित नहीं कर पाया।
इसके खिलाफ 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। हाईकोर्ट ने मई 2026 में इन अपीलों को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। अब इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट में फिर शुरू होगी कानूनी लड़ाई
नयाबुद्दीन शेख की याचिका के बाद करीब 20 साल पुराने इस मामले में एक बार फिर शीर्ष अदालत के सामने आरोपियों की बरी का मुद्दा पहुंच गया है। याचिका में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई है।
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