जय श्रीकृष्ण या 'जेएसके' या जय श्रीकृष्णा
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शब्द, सुविधा और चेतना के चौराहे पर एक सहज जिज्ञासा
सनातन संस्कृति में जब दो व्यक्ति परस्पर मिलते हैं और हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं, तो वह केवल शिष्टाचार या औपचारिकता का लौकिक निर्वाह नहीं होता। इस अभिवादन का मूल मर्म है, सामने वाले के अंतःकरण में विराजमान उसी एक परमात्मा को प्रणाम करना।
विशेषकर वैष्णव परंपरा और पुष्टिमार्ग में ‘जय श्री कृष्ण' का उद्घोष जीवात्मा की परमात्मा के प्रति सहज शरणागति और अद्वैत प्रेम का पावन प्रतीक रहा है। एक भरा-पूरा ‘जय श्री कृष्ण' बोलते या सुनते ही मनुष्य सांसारिक चिंताओं, आपाधापी और मानसिक तनाव से एक क्षण के लिए मुक्त होकर भगवद्-स्मरण के आध्यात्मिक विश्राम को अनुभव करता है।
किंतु बदलते समय, सूचना क्रांति और डिजिटल युग की गति ने हमारे दैनिक व्यवहार में दो सूक्ष्म बदलाव ला दिए हैं। पहला बदलाव बोलचाल में ‘कृष्ण' के स्थान पर आकारान्त ‘कृष्णा' कहना है। दूसरा बदलाव त्वरित संदेशों व्हाट्सएप, एसएमएस आदि में समय और शब्दों की बचत के नाम पर इसे समेटकर केवल JSK (जेएसके) लिख देना है।
इस परिवर्तन को देखने के बाद किसी पर भी आक्षेप लगाए बिना, किसी की भी श्रद्धा/भावना को ठेस पहुंचाए बिना, एक सहज और विचारणीय विमर्श अंतर्मन में जन्म लेता है।
भाषा का सूक्ष्म सत्य: 'कृष्ण' और 'कृष्णा' का अंतर
संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं है; वह ध्वनि, व्याकरण और मंत्र-विज्ञान का एक अत्यंत परिष्कृत ढांचा है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार ‘कृष्' धातु में ‘नक्' प्रत्यय लगने से सच्चिदानंद स्वरूप, सर्व-आकर्षक भगवान ‘कृष्ण' का नाम निष्पन्न होता है। यह अकारान्त पुंलिंग शब्द है।
परंतु जब इसी शब्द में व्याकरण के नियमानुसार स्त्रीलिंग प्रत्यय (‘टाप्') जुड़ता है, तो यह आकारान्त होकर 'कृष्णा' बनता है। सनातन वाङ्मय में ‘कृष्णा' शब्द अत्यंत आदरणीय है, किंतु वह तीन विशिष्ट विभूतियों का नाम है:
1. महाभारत की द्रौपदी, जिन्हें उनके श्यामल वर्ण और तेजस्विता के कारण ‘कृष्णा' कहा गया।
2. सूर्यपुत्री कालिंदी अर्थात् यमुना महारानी, जिनके श्यामल जल के कारण उन्हें ‘कृष्णा' पुकारा गया।
3. भगवती शक्ति का श्यामल स्वरूप।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जब पाश्चात्य विद्वानों ने संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में लिप्यंतरण किया, तो शब्दों के अंतिम हस्व ‘अ' को दर्शाने के लिए अंग्रेजी का प्रथम अक्षर ‘ए' जोड़ दिया गया जैसे रामा, शिवा, कृष्णा। आधुनिक समाज ने जब अंग्रेजी के प्रभाव में उसी कृष्णा को पुनः अपनी भाषाओं में अपनाकर बोलना शुरू किया, तो अनजाने में वह कृष्ण की जगह ‘कृष्णा' उच्चारित होने लगा।
यहां यह सोचना स्वाभाविक है कि क्या किसी भी भाषा में पुरुषोत्तम भगवान को स्त्रीलिंग संबोधन से पुकारना केवल एक सहज चूक है, या अपनी भाषा की शास्त्रीय गहराई को ना जानने से अनजाने में हुई भूल?
समय की बचत और तीन अक्षरों का संकुचन: 'जेएसके'
दूसरा पहलू लिखित संवाद का है। शुरुआती मोबाइल फोन के दौर में जब संदेशों पर शब्दों की सीमा थी, तब ‘गुड मोर्निंग' का जीएम और ‘टेक केयर' का टीसी बनना समझ में आता था। उसी बहाव में जय श्रीकृष्ण को जेएसके बना दिया गया।
यहां यह स्पष्ट समझना आवश्यक है कि जो व्यक्ति किसी को जेएसके लिखता है, तो उसके मन में संस्कृति के प्रति किंचित् मात्र भी दुर्भावना, अनादर या उपहास का भाव नहीं होता। वह अपने सामाजिक संस्कारों और सद्भावना के वशीभूत होकर ही यह संदेश भेजता है।
किंतु विचारणीय प्रश्न यह उठता है कि आज जब हमारे पास असीमित इंटरनेट, देवनागरी की-पैड और वॉयस-टाइपिंग जैसी सुविधाएं हैं, तब भी हम उस परम पावन नाम को तीन निर्जीव अक्षरों में क्यों समेट रहे हैं? जिस नाम को लिखने में उंगलियों को मुश्किल से दो या तीन सेकंड का समय लगता है, क्या उस नाम के लिए भी हमारे पास समय का अभाव है?
सनातन दृष्टिकोण: 'शब्द शुद्धि' बनाम 'भावग्राही जनार्दन'
इस विषय की गहराई में उतरने पर सनातन दर्शन के दो अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रामाणिक दृष्टिकोण आमने-सामने आते हैं:
पहला है भक्ति का उदार दृष्टिकोण (भाव की प्रधानता)। वैष्णव दर्शन का एक अत्यंत सुंदर और प्रसिद्ध श्लोक है: मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे। उभयोः सदृशं पुण्यं भावग्राही जनार्दनः॥
अर्थात् अज्ञानी व्यक्ति यदि व्याकरण की भूल करके ‘विष्णाय' कह दे और विद्वान शुद्ध व्याकरण से ‘विष्णवे' कहे, तो भी कृपानिधान भगवान दोनों को समान पुण्य देते हैं; क्योंकि वे व्याकरण की बारीकियों के नहीं, केवल अंतःकरण के प्रेम और निष्कपट भाव के भूखे हैं।
अजामिल ने केवल अपने पुत्र के बहाने नारायण पुकारा था और वाल्मीकि जी ने ‘मरा-मरा' उलट नाम जपा था, फिर भी उनका उद्धार हुआ। इस दृष्टि से देखें, तो यदि मन में निष्कपट श्रद्धा है, तो जेएसके या ‘कृष्णा' कहने पर भी दयालु प्रभु भाव को ही स्वीकार करेंगे।
दूसरा दर्शन मंत्र-विज्ञान और चेतना के दृष्टिकोण (शब्द की मर्यादा) का है जो वैदिक परंपरा और संत मत का भी नजरिया है। संत श्री हित प्रेमानंद जी महाराज जैसे उच्च कोटि के साधक निरंतर स्मरण कराते हैं कि भगवान व उनके नाम में कोई भेद नहीं है।
नाम कोई सांसारिक लेबल नहीं, साक्षात ईश्वर का विग्रह है। जब हम किसी आदरणीय व्यक्ति या माता-पिता का नाम शॉर्टकट में नहीं लेते, तो ब्रह्मांड के नायक के नाम को सांसारिक ‘टेक्स्ट स्लैंग' के समकक्ष रख देना क्या हमारी आध्यात्मिक सजगता की कमी को नहीं दर्शाता?
आत्म-चिंतन: सही गलत का निर्णय आपके विवेक पर
यह विमर्श किसी को दोषी ठहराने, नियम थोपने या किसी की आस्था पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए नहीं है। यह तो केवल आत्म-निरीक्षण का एक सहज निमंत्रण भर है।
हम सोशल मीडिया पर लंबी चैट करने, व्यर्थ के संदेश पढ़ने और घंटों वीडियो देखने के लिए सहज ही समय निकाल लेते हैं। ऐसे में मन के किसी कोने से यह मूक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि, जिस परमात्मा ने हमें यह वाणी, यह बुद्धि और यह जीवन दिया है, क्या उनके पूर्ण और शुद्ध नाम "जय श्री कृष्ण’ के लिए हमारे पास कुछ सेकंड का धैर्य है?
क्या भाव की आड़ में अपनी भाषा और उच्चारण की शुद्धता की उपेक्षा उचित है, या अंतर्मन के सच्चे भाव के साथ वाणी की मर्यादा व पूर्णता को बनाए रखना ही वास्तविक भक्ति है? इस चिंतन का कोई बंधा-बंधाया उत्तर नहीं हो सकता। इसका निर्णय न किसी वाद-विवाद से होगा, न किसी फतवे से। इसका उत्तर केवल आप अपनी चेतना, अपनी समझ और अपने अंतर्मन के विवेक से ही पा सकते हैं।
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