मां चामुंडा और तुलजा भवानी के चरणों में नवाएंगे शीश: नए साल का पहला सवेरा
Khulasa First
संवाददाता

शक्ति और भक्ति का संगम... पहाड़ पर विराजी दो बहनें, भक्तों की करती हैं रखवाली, टेकरी की जो सीढ़ी चढ़ जाए, उसकी झोली कभी न रहे खाली
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट…इंदौर।
मालवा में एक कहावत अक्सर कही जाती है शुभ काम की शुरुआत मां के दर्शन के साथ। देवास की माता टेकरी केवल एक पहाड़ी नहीं, बल्कि यह अनगिनत भक्तों के अटूट विश्वास का शिखर है। जब कैलेंडर का पन्ना बदलता है और हम नववर्ष की दहलीज पर खड़े होते हैं तब अंचल के लोगों के कदम स्वतः ही करीब 300 फीट ऊंची माता टेकरी की ओर खिंचे चले आते हैं।
नव वर्ष केवल कैंलेंडर बदलने का दिन नहीं, बल्कि नई आशाओं के जन्म का दिन है। देवास और आसपास के श्रद्धालु अपने साल की पहली सुबह माता के चरणों में बिताना पसंद करते हैं। इस साल भी नववर्ष 2026 के पहले दिन यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ेगी। यहां आने वाले भक्तों का अनुभव है कि जिसका साल मां की आरती और टेकरी की ठंडी हवा के साथ शुरू होता है उसका पूरा वर्ष मातारानी की छत्रछाया में सुरक्षित रहता है।
1000 वर्ष पुराने हैं मंदिर
खुलासा फर्स्ट प्रतिनिधि ने स्वयं काफी समय माता टेकरी पर बिताकर श्रद्धालुओं से बातचीत की। सबका सार यही निकला कि माता टेकरी न केवल अटूट आस्था का केंद्र है, बल्कि श्रद्धा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम भी है। माता टेकरी पर स्थित देवी मंदिर करीब 1000 वर्ष पुराने बताए जाते हैं। शारदीय और चैत्र नवरात्र में तो श्रद्धालुओं का यहां सैलाब उमड़ता ही है। नववर्ष के अवसर पर भी यहां आने वाले भक्तों की संख्या काफी बढ़ जाती है।
नव वर्ष के इंतजाम नवरात्रि की तरह
देवास एसडीएम और माता टेकरी प्रशासक आनंद मालवीय ने खुलासा फर्स्ट से विशेष बातचीत में कहा कि अभी से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता टेकरी प्रतिदिन पहुंच रहे हैं। इसी को देखते हुए नववर्ष के लिए विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं। इस संबंध में सोमवार को समिति की बैठक भी आहुत की गई है। वरिष्ठ अधिकारियों को भी माता टेकरी पर तैनात किया जाएगा ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
एक लाख तक जा सकती है श्रद्धालुओं की संख्या
देवास माता टेकरी के पुजारी मुकेश नाथ ने खुलासा फर्स्ट से बातचीत में कहा कि यह स्थान तो अगाथ आस्था का केंद्र है। यहां आने वालों की हर मुराद मां पूरी करती है। नववर्ष पर टेकरी पर करीब एक लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। मालवा के लोगों की बात छोड़ दें तो यहां देश-विदेश से भक्त आते हैं। भक्तों की सुविधा और सुरक्षा के लिए प्रशासन व्यापक इंतजाम कर रहा है। सुगम दर्शन हो सके इस बात को सर्वोपरि रखा जा रहा है।
दो स्वरूपों का अनूठा संगम
टेकरी का धार्मिक महत्व जगप्रसिद्ध है। यहां दो प्रमुख देवियां विराजमान हैं। बड़ी माता यानी मां तुलजा भवानी को छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी का स्वरूप माना जाता है। छोटी माता यानी मां चामुंडा को शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार यह पर्वत खंडित होने के बावजूद जाग्रत माना जाता है। नववर्ष पर यहां होने वाला महायज्ञ और विशेष आरती का आयोजन अनगिनत भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बनता है।
टेकरी का अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य
देवास की माता टेकरी का प्राकृतिक सौंदर्य निहारते ही बनता है। यहां से देवास और आसपास का विहंगम दृश्य देखते आंखें नहीं थकतीं। चारों ओर हरियाली और खुशनुमा ठंडी हवा के झोंके अलग ही आनंद देते हैं।
रोपवे की सुविधा
माता टेकरी पर दो तरह से भक्त पैदल पहुंच सकते हैं। इसके अलावा टेकरी पर चढ़ने के लिए आधुनिक रोपवे की सुविधा भी आरंभ की गई है।
अन्य मंदिर भी
देवास टेकरी पर अन्य मंदिर भी हैं। इनमें माता मंदिर से जुड़ा भैरव मंदिर, कालिका माता, हनुमान मंदिर और अन्नपूर्णा माता के मंदिर शामिल हैं। मान्यता है कि माता के दर्शन तब तक पूर्ण नहीं माने जाते जब तक टेकरी पर भैरवनाथ के दर्शन न कर लिए जाएं।
टेकरी का इतिहास
देवास माता टेकरी का इतिहास धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं से तो जुड़ा है ही, यह रियासतकालीन वैभव का भी संगम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान विष्णु ने सती के पार्थिव शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से विखंडित किया था तब माता के शरीर के अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे, जिन्हें शक्तिपीठ कहा गया। देवास टेकरी को एक ‘रक्तपीठ’ माना जाता है।
मान्यता है कि यहां माता सती के रक्त की कुछ बूंदें गिरी थीं। इसी कारण यहां विराजित मां चामुंडा को ‘रक्तवाहिनी’ भी कहा जाता है। इतिहास के अनुसार उज्जैन के राजा भर्तृहरि ने इस स्थान पर एक गुफा में तपस्या की थी। इस जगह से उज्जैन की भर्तृहरि गुफा तक जाने वाली एक 45 किमी लंबी प्राचीन सुरंग भी है।
गुरु गोरखनाथ और सद्गुरु योगेंद्र शीलनाथ महाराज जैसे सिद्ध संतों की भी यह तपोभूमि रही है।
कहा जाता है कि मां तुलजा भवानी यानी बड़ी माता और मां चामुंडा यानी छोटी माता बहनें हैं। एक समय दोनों माताएं इस पहाड़ी को छोड़कर जा रही थीं। भक्तों की प्रार्थना पर बड़ी माता पाताल में समाते हुए रुक गईं।
इस कारण उनका केवल ऊपरी हिस्सा दिखता है, जबकि छोटी माता पहाड़ी छोड़कर जाने लगीं और उनका स्वरूप थोड़ा झुक गया, जो आज भी उसी मुद्रा में है।
देवास का इतिहास मराठा साम्राज्य की दो शाखाओं से जुड़ा है। यहां के शासक पवार (परमार) राजपूत वंश के थे। मां तुलजा भवानी को इन रियासतों की कुलदेवी माना जाता है।
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