आदेशों की अनदेखी पर हाईकोर्ट का सख्त रवैया: महू के एसडीएम पर 50 हजार की कॉस्ट; इंदौर बेंच ने कहा- अर्ध-न्यायिक अधिकारी का ऐसा आचरण उचित नहीं
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महू के एसडीएम राकेश परमार को हाईकोर्ट के आदेशों की अनदेखी और जमीन विवाद में रोक हटाने के कानूनी आधार पर स्पष्ट जवाब नहीं दे पाने के मामले में कड़ी फटकार लगी है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने उन पर 50 हजार रुपए की कॉस्ट लगाई है।
कोर्ट ने यह राशि सात दिन के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने और उसकी रसीद रजिस्ट्री में पेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि न्यायिक प्रकृति की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों के आचरण में जवाबदेही जरूरी है और ऐसे मामलों में कार्रवाई की मिसाल कायम होना आवश्यक है।
जमीन पर कब्जे के विवाद से जुड़ा मामला
यह मामला महू तहसील के बारडिया क्षेत्र की करीब एक हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है, जो सर्वे नंबर 3/4 पर दर्ज बताई गई है। याचिकाकर्ता लीलाबाई, विद्या, राधा और महेश सहित अन्य लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एसडीएम के आदेश को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, तहसीलदार ने 23 अप्रैल को जमीन से कब्जा हटाकर डाट कंस्ट्रक्शन के संदीप सिंह सरजू को कब्जा सौंपने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ उन्होंने एसडीएम राकेश परमार के समक्ष अपील की और मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 52 के तहत राहत मांगते हुए आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया।
एसडीएम कोर्ट ने 28 मई तक रोक लगाई थी। हालांकि, 9 जून को एसडीएम ने यह रोक हटा दी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि रोक हटाने के लिए किसी पक्ष की ओर से आवेदन तक नहीं दिया गया था। इसी आदेश की वैधानिकता को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने मांगा था कानूनी आधार
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप भट्ट ने 24 जून को एसडीएम के 9 जून के आदेश पर रोक लगा दी थी। साथ ही राकेश परमार से शपथपत्र के जरिए जवाब मांगा था कि उन्होंने किस कानूनी प्रावधान के तहत पहले दी गई रोक हटाई।
कोर्ट ने जवाब दाखिल करने के लिए 25 सितंबर तक समय दिया था, लेकिन निर्धारित तारीख पर जवाब पेश नहीं हुआ। इसके बाद 9 अक्टूबर को हुई सुनवाई में भी जवाब नहीं आया। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए एसडीएम को 16 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया।
एसडीएम ने दी थी अपनी सफाई
16 अक्टूबर को राकेश परमार अदालत में पेश हुए और शपथपत्र के माध्यम से अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि रोक 28 मई तक प्रभावी थी और 9 जून को उसकी अवधि समाप्त हो गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि हाईकोर्ट के 24 जून के आदेश की जानकारी मिलने के बाद 27 जुलाई को संबंधित कार्रवाई रोक दी गई थी। 9 अक्टूबर को अदालत में समय पर उपस्थित नहीं हो पाने के संबंध में एसडीएम ने सफाई दी कि वह इंदौर आ रहे थे और जब तक अदालत पहुंचे, तब तक मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी थी।
हालांकि, हाईकोर्ट उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ। अदालत के मुताबिक, शपथपत्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि एसडीएम ने किस कानूनी प्रावधान के तहत रोक हटाने का निर्णय लिया था। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित अधिकारी पहले भी सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए थे।
अदालत ने क्यों लगाई 50 हजार की कॉस्ट?
हाईकोर्ट ने अपने तीन पन्नों के आदेश में एसडीएम के आचरण पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि एसडीएम एक अर्ध-न्यायिक अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे पद पर बैठे अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करें, अदालत के निर्देशों का पालन करें और अपने आदेशों के कानूनी आधार को स्पष्ट करें।
कोर्ट ने शपथपत्र में जरूरी स्पष्टीकरण नहीं मिलने और सुनवाई में अनुपस्थिति को गंभीरता से लिया। इसी संदर्भ में एसडीएम पर 50 हजार रुपए की कॉस्ट लगाई गई।
सात दिन में जमा करनी होगी राशि
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि राकेश परमार सात दिन के भीतर 50 हजार रुपए मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराएं। जमा राशि की रसीद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में प्रस्तुत करनी होगी। आदेश में यह भी कहा गया है कि निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं होने पर अगली सुनवाई में आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।
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