दीपावली पर मिठास के बाजार में मिलावट का खतरा: हर बार छापे हर साल वही सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

त्योहारों में दौड़, वर्ष भर क्यों नहीं होती ऐसी सख्ती?
हर दीपावली मावे पर पहरा, बाकी सालभर निगरानी का क्या?
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दीपावली आते ही बाजारों में मिठाइयों की मांग बढ़ती है, मावे की खपत बढ़ती है और इसके साथ ही मिलावट की आशंका को लेकर प्रशासन की सक्रियता भी तेज हो जाती है। कहीं मावे से भरी गाड़ियां पकड़ी जाती हैं, कहीं मिठाई की दुकानों पर जांच होती है, तो कहीं खाद्य सामग्री के नमूने प्रयोगशालाओं में भेजे जाते हैं।
इस बार भी मध्य प्रदेश में ऐसी कार्रवाइयां सामने आई हैं। पिछले दिनों भिंड में 1,250 किलो संदिग्ध मावा जब्त किया गया है, जबकि प्रदेशव्यापी अभियान में बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री जब्त करने की जानकारी मिली है, लेकिन इन कार्रवाइयों के बीच एक सवाल हर साल की तरह इस बार भी खड़ा है।
क्या मिलावट के कारोबार पर वास्तव में लगाम लग रही है या त्योहार आते ही छापेमारी और जब्ती के आंकड़े सामने आने का सिलसिला भर शुरू हो जाता है?
मिलावट की समस्या केवल किसी एक दुकान, एक शहर या एक त्योहार तक सीमित नहीं है। यह खाद्य सामग्री के उत्पादन, आपूर्ति, भंडारण और बिक्री की पूरी व्यवस्था से जुड़ा सवाल है।
जब त्योहारों पर अचानक कार्रवाई बढ़ती है, तो यह जानना भी जरूरी हो जाता है कि सामान्य दिनों में निगरानी कितनी प्रभावी रहती है और जिन कारोबारियों के उत्पाद जांच के दायरे में आते हैं, उनके मामलों का अंतिम नतीजा क्या निकलता है।
हर साल त्योहारों पर ही क्यों याद आती है मिलावट
दीपावली, होली और दूसरे बड़े त्योहारों पर मावे तथा दूध से बनी मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है। दुकानों पर पेड़ा, बर्फी, कलाकंद, गुलाब जामुन और अन्य मिठाइयों की बिक्री बढ़ती है। बढ़ी हुई मांग के बीच उत्पादन और आपूर्ति का दबाव भी बढ़ता है।
ऐसे माहौल में यदि कोई कारोबारी गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा के नियमों से समझौता करता है, तो उपभोक्ताओं के लिए जोखिम पैदा हो सकता है, लेकिन मांग बढ़ना मिलावट की अनिवार्य वजह नहीं है।
असली समस्या उन स्थितियों में है, जहां मुनाफे के लिए नियमों की अनदेखी की जाती है और निगरानी व्यवस्था ऐसी गतिविधियों को समय रहते पकड़ने में नाकाम रहती है।
यहीं प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठता है। त्योहारों के दौरान विशेष अभियान चलाना जरूरी है, क्योंकि इस समय खाद्य पदार्थों की खपत अधिक होती है। मगर क्या नियमित निरीक्षण भी उसी गंभीरता से होते हैं?
क्या मावा बनाने वाली इकाइयों, थोक विक्रेताओं, परिवहन और भंडारण केंद्रों की लगातार जांच होती है? क्या पिछले अभियानों में सामने आए मामलों की प्रगति सार्वजनिक की जाती है?
इन सवालों के जवाब केवल छापेमारी की तस्वीरों या जब्त सामग्री की मात्रा से नहीं मिल सकते। इसके लिए सालभर की निगरानी और कार्रवाई के परिणामों का हिसाब सामने आना चाहिए।
भिंड की जब्ती चेतावनी है, मिलावट का अंतिम प्रमाण नहीं... दीपावली से पहले भिंड के मेहगांव क्षेत्र में 1,250 किलो संदिग्ध मावा जब्त किए जाने की खबर ने एक बार फिर दुग्ध उत्पादों की आपूर्ति पर ध्यान खींचा है।
इतनी बड़ी मात्रा में मावा एक साथ पकड़ा जाना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण है। अब सवाल यह है कि यह खेप कहां से आई थी, किसके लिए भेजी जा रही थी, इसके उत्पादन और खरीद से जुड़े दस्तावेज क्या थे और जांच में इसकी गुणवत्ता को लेकर क्या निष्कर्ष निकलता है?
हालांकि, इस तरह की जब्ती का महत्व केवल पकड़ी गई खेप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि जांच में खाद्य मानकों का उल्लंघन सामने आता है, तो संबंधित आपूर्ति श्रृंखला की भी पड़ताल होनी चाहिए।
अन्यथा एक वाहन पकड़ा जाएगा, कुछ नमूने लिए जाएंगे और कुछ दिनों बाद मामला खबरों से गायब हो जाएगा, जबकि उसी कारोबार से जुड़ी दूसरी गतिविधियों पर निगरानी का सवाल बना रहेगा।
5.61 करोड़ की जब्ती का आंकड़ा बड़ा है, लेकिन सफलता का पैमाना क्या है?
मध्य प्रदेश में 20 जुलाई से 25 अगस्त तक चलाए गए विशेष अभियान के दौरान लगभग 11.73 लाख किलो खाद्य सामग्री जब्त करने और उसका अनुमानित मूल्य 5.61 करोड़ रुपये होने की जानकारी सामने आई थी।
इस अभियान के आंकड़ों में विभिन्न खाद्य पदार्थ शामिल थे। इसे केवल मावे की जब्ती या इतने मूल्य के मिलावटी मावे का प्रमाण समझना सही नहीं होगा। फिर भी यह आंकड़ा खाद्य सुरक्षा निगरानी के पैमाने और उसके नतीजों पर गंभीर चर्चा की जरूरत बताता है।
बड़ी मात्रा में सामग्री जब्त होना कार्रवाई का एक हिस्सा है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि मिलावट का कारोबार कमजोर पड़ गया है।
मावा कहां से आया, किसने बनाया और किसे बेचा, पूरी कड़ी की जांच जरूरी
मिलावट की समस्या से निपटने के लिए केवल खुदरा मिठाई की दुकान पर पहुंचना पर्याप्त नहीं है। मावा बनाने वाली इकाइयों, थोक व्यापारियों, परिवहनकर्ताओं और भंडारण केंद्रों के बीच आपूर्ति की कड़ी को समझना जरूरी है।
यदि किसी खेप में मिलावट प्रमाणित होती है, तो जांच को केवल उस वाहन या दुकान तक सीमित रखने के बजाय उसके स्रोत और संबंधित आपूर्ति शृंखला तक पहुंचना चाहिए। वहीं, वैध कारोबार करने वाले व्यापारियों के साथ अनावश्यक उत्पीड़न न हो, इसके लिए कार्रवाई तथ्य, दस्तावेज और प्रयोगशाला रिपोर्ट के आधार पर होनी चाहिए।
त्योहार से पहले छापे, फिर क्या होता है?... खाद्य सुरक्षा विभाग की जिम्मेदारी केवल संदिग्ध खाद्य सामग्री पकड़ने तक सीमित नहीं है। नमूने लेना, उनकी जांच कराना, रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करना और उल्लंघन करने वालों को कानून के दायरे में लाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अक्सर आम उपभोक्ता को यह तो पता चल जाता है कि किसी दुकान या वाहन से कितनी सामग्री जब्त हुई, लेकिन उसके बाद की प्रक्रिया की जानकारी नहीं मिलती। नमूने की रिपोर्ट क्या आई, जब्त सामग्री के संबंध में अंतिम निर्णय क्या हुआ और संबंधित कारोबारी के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। ये सवाल भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनने चाहिए।
मिठाई की दुकान पर ग्राहक यह देखे
मिलावट पर नियंत्रण की मुख्य जिम्मेदारी प्रशासन और खाद्य कारोबारियों की है। उपभोक्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह घर पर हर प्रकार की मिलावट पहचान ले। फिर भी खरीदारी के दौरान कुछ सावधानियां जोखिम कम करने में मदद कर सकती हैं।
मिठाई ऐसी दुकान से खरीदें जहां साफ-सफाई का ध्यान रखा जाता हो और खाद्य पदार्थ ढककर रखे जाते हों।
मिठाई से बासी या असामान्य गंध आ रही हो, उस पर फफूंद हो या उसकी बनावट खराब लगे, तो उसे न खरीदें।
पैक्ड मिठाई लेते समय पैकेट की सील, लागू नियमों के अनुसार जरूरी लेबल, तारीख और सामग्री का विवरण जांचें।
बिल जरूर लें, ताकि गुणवत्ता संबंधी शिकायत होने पर खरीद का प्रमाण उपलब्ध रहे।
मिठाई के रंग, चमक या स्वाद को उसकी शुद्धता का अंतिम प्रमाण न मानें। कुछ प्रकार की मिलावट केवल प्रयोगशाला जांच से ही सामने आती हैं।
संदिग्ध खाद्य सामग्री की शिकायत संबंधित खाद्य सुरक्षा अधिकारी से करें। घरेलू परीक्षणों या सोशल मीडिया के नुस्खों के आधार पर किसी उत्पाद को मिलावटी घोषित न करें।
अब मौसमी अभियान से आगे बढ़ने का समय
मध्य प्रदेश में खाद्य सुरक्षा के सामने चुनौती केवल दीपावली के दौरान नकली या संदिग्ध मावा पकड़ने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें मिलावट करने वालों को सालभर नियमित निगरानी का सामना करना पड़े।
त्योहारों पर अभियान चलाना जरूरी है, लेकिन यदि कार्रवाई का दबाव केवल मांग बढ़ने के समय दिखाई देता है, तो निगरानी की निरंतरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रशासन को चाहिए कि नियमित निरीक्षण, प्रयोगशाला जांच और अंतिम वैधानिक कार्रवाई के आंकड़े व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक करे। जिन मामलों में उल्लंघन प्रमाणित हो, उनमें कानून के अनुसार समयबद्ध कार्रवाई हो।
सवाल केवल यह नहीं कि इस दीपावली कितने किलो मावा पकड़ा गया। सवाल यह है कि अगली दीपावली तक मिलावट रोकने के लिए क्या बदलेगा? यदि हर साल वही छापे, वही जब्ती और वही आशंकाएं लौटती रहें, तो अभियान की संख्या बढ़ने के बावजूद उपभोक्ता का भरोसा कैसे बढ़ेगा?
मिलावट के खिलाफ वास्तविक सफलता तब होगी, जब कार्रवाई त्योहारों की सुर्खियों तक सीमित न रहकर पूरे साल बाजार की निगरानी और कानून के प्रभावी पालन में दिखाई दे।
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