200 साल पुराना ‘पिता-पुत्र’ मंदिर: जहां आमने-सामने विराजते हैं शिव और गणेश
KHULASA FIRST
संवाददाता

इंदौर का सिद्धि विनायक मंदिर: मंदसौर संधि से जुड़ा है इतिहास
अनोखे गणेश मंदिर की कहानी, जिसका दान पुजारी भी घर नहीं ले जाते
होलकरकालीन इतिहास से जुड़ी आस्था, मंदसौर संधि और तात्या जोग
शिव-गणेश का दुर्लभ विग्रह: ‘छोटा गणेश’ मंदिर की अनोखी परंपरा और मान्यता
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों में इंदौर का सिद्धिविनायक ‘छोटा गणेश’ मंदिर एक विशेष स्थान रखता है। शहर के मल्हारगंज क्षेत्र में पुलिस थाने के सामने स्थित तात्या की बावड़ी परिसर का यह 200 वर्ष पुराना मंदिर देश के उन दुर्लभ धर्मस्थलों में शामिल है, जहां भगवान शिव और उनके पुत्र श्री गणेश की प्रतिमाएं ठीक एक-दूसरे के आमने-सामने स्थापित हैं। स्थानीय निवासियों के बीच यह स्थल ‘पिता-पुत्र का मंदिर’ के नाम से जाना जाता है।
होलकर रियासत से जुड़ा है इतिहास...इस मंदिर का निर्माण विट्ठल महादेव किबे (तात्या जोग) ने करवाया था। 1778 में जन्मे तात्या जोग इंदौर के महाराजा मल्हारराव होलकर द्वितीय के विश्वसनीय सलाहकार और कुशल प्रशासक थे। वर्ष 1818 में अंग्रेजों और होलकर रियासत के बीच हुई ऐतिहासिक ‘मंदसौर संधि’ और महिदपुर युद्ध के बाद सुलह कराने में तात्या जोग ने मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
इसी संधि के फलस्वरूप इंदौर को होलकर राज्य की राजधानी बनाया गया। तात्या जोग के प्रशासनिक प्रयासों से रियासत की वार्षिक आय 5 लाख रुपये से बढ़कर 27 लाख रुपये पहुंच गई थी। उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर महाराजा मल्हारराव द्वितीय ने उन्हें मल्हारगंज क्षेत्र की यह भूमि और 20 हजार रुपये वार्षिक की जागीर भेंट की थी।
किबे परिवार का मुख्य व्यापारिक प्रतिष्ठान ‘गणेश दास कृष्ण जी’ के नाम से संचालित होता था, जिसका कारोबार देश भर के अलावा चीन तक फैला हुआ था। इसी कारण तात्या जोग के परिवार को ‘व्यापारियों का राजा’ भी कहा जाता था। भगवान गणेश किबे परिवार के ईष्ट देव थे।
मंदिर की वास्तुकला और अनोखी परंपराएं
मंदिर में पूर्व मुखी बाईं सूंड वाले 4 फीट ऊंचे सिद्धिविनायक गणपति रिद्धि-सिद्धि के साथ विराजित हैं। उनके ठीक सामने शिवजी का सुंदर शिवलिंग स्थापित है। दोनों प्रतिमाओं की स्थापना इस तरह की गई है कि भक्तों को पिता-पुत्र के बीच परस्पर देखने और संवाद करने का आभास होता है।
श्रद्धालुओं में मान्यता है कि यहां सच्चे भाव से प्रार्थना करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मनोरोग तथा पीलिया जैसी बीमारियों से राहत मिलती है। इसके अलावा, मंदिर की एक अनूठी परंपरा यह है कि यहां चढ़ावे या दान-दक्षिणा की सामग्री पर पुजारियों का अधिकार नहीं होता। मंदिर में प्राप्त सारा प्रसाद और दान श्रद्धालुओं में ही बांट दिया जाता है।
परिसर और वर्तमान स्थिति... जिस स्थान पर मंदिर स्थित है, उसे पूर्व में ‘गणेश बाग’ भी कहा जाता था। इसी परिसर में तात्या जोग द्वारा बनवाई गई ‘तात्या की बावड़ी’ मौजूद है, जो कभी शहर के जल संकट को दूर करने का मुख्य जरिया थी और जिससे नगर निगम के टैंकर पानी भरा करते थे। इसी परिसर में सरकारी लाल अस्पताल स्थित है। वर्तमान में मंदिर के प्रबंधन का दायित्व ‘हेरंब ट्रस्ट’ द्वारा निभाया जा रहा है, जबकि किबे परिवार की ऐतिहासिक धरोहरें (किबे कंपाउंड) आज भी इंदौर के छावनी क्षेत्र में स्थित हैं।
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