गंभीर घोटाले की शिकार नर्मदा-मालवा गंभीर परियोजना: विश्व परियोजना के रखरखाव और ऑपरेशन की ठेकेदार कंपनी ‘पॉवर लिंकर’ को तीन साल का ठेका
KHULASA FIRST
संवाददाता

श्रमिकों ने वेतन, पीएफ, बोनस और ओवरटाइम को लेकर कंपनी पर लगाए गंभीर आरोप
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नर्मदा-मालवा गंभीर परियोजना के बड़वाह स्थित पंप हाउस और मेंटनेंस व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इस परियोजना में एनवीडीए के अधिकारी और ठेकेदार निजी कंपनी के साथ श्रम विभाग वह सब कर रहा है, जो सरकार की छवि पर दाग है। अफसर के संरक्षण में कंपनी गरीब मजदूरों की मेहनत व पसीने की कमाई लूटकर आपस में बंदरबांट कर रही है।
इस भ्रष्टाचार के लिए एनवीडीए के अफसर, प्राइवेट कंपनी और श्रम विभाग के जिम्मेदार लोगों ने बकायदा एक मजबूत सिस्टम बनाया है। परियोजना के मजदूर वर्ग और भारतीय मजदूर संघ ने यह आरोप लगाते हुए बताया यहां के अलावा भविष्य निधि विभाग में भी मजदूरों की कोई सुनवाई नहीं हो रही।
भ्रष्टाचार के नित-नए आरोपों से प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को बदनाम किया जा रहा है। इसका एक बड़ा कारण बड़े अधिकारियों की उदासीनता है।
जिम्मेदार और जवाबदेही के लिए नियुक्त अधिकारी इस सबके लिए ऊपर वालों, यानी भोपाल में बैठी सरकार की ओर इशारा करते हैं। ऐसे हालातों में सरकारी तंत्र और निजी कंपनी द्वारा गरीब मजदूर वर्ग की मेहनत की कमाई हड़पी जा रही है।
नर्मदा-मालवा गंभीर लिंक परियोजना के संचालन एवं रखरखाव को लेकर एक तरफ सरकार करोड़ों रुपए का ठेका दे रही है, वहीं दूसरी ओर परियोजना से जुड़े श्रमिक वेतन, पीएफ, बोनस, ओवरटाइम और अन्य श्रम सुविधाओं को लेकर गंभीर शिकायतें कर रहे हैं। मामला केवल श्रमिकों के भुगतान तक सीमित नहीं, बल्कि परियोजना के पंप हाउस और तकनीकी रखरखाव की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
परियोजना के मेंटेनेंस का टेंडर 1 जून 2023 से चैन्नई की पॉवर लिंकर कंपनी के पास होने के दौरान श्रमिकों से निर्धारित समय से अधिक काम कराने, श्रम कानूनों के तहत मिलने वाली सुविधाओं से वंचित रखने और कर्मचारियों की संख्या में भारी कमी के आरोप लगाए गए हैं।
वहीं परियोजना के महत्वपूर्ण पंप हाउसों के रखरखाव में कथित लापरवाही को लेकर भी विभागीय अधिकारियों को शिकायत किए जाने की बात सामने आई है।
श्रमिकों के अनुसार करीब ढाई वर्ष की अवधि में लगभग 203 कर्मचारियों के स्वीकृत/आवश्यक स्टाफ के स्थान पर करीब 40 प्रतिशत कर्मचारियों से ही काम कराया गया
कर्मचारियों का आरोप है कि उनसे कई बार 12-12 घंटे तक कार्य लिया गया, लेकिन ओवरटाइम, बोनस, पीएफ और ईएसआईसी जैसी सुविधाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
सुविधाएं मांगी तो नौकरी से हटाने का आरोप... श्रमिकों का कहना है कि जब उन्होंने अपने वैधानिक अधिकारों और सुविधाओं की मांग उठाई तो 1 जनवरी 2026 से नए टेंडर की प्रक्रिया शुरू होने के बाद करीब आधे कर्मचारियों को लिखित सूचना देकर काम से हटा दिया गया। आरोप है कि कुछ कर्मचारियों को उनके बकाया वेतन का भुगतान भी नहीं किया गया। मामला अब श्रम विभाग और खंडवा लेबर कोर्ट तक पहुंच चुका है।
एनआरवी गेस्केट की जगह रबर इस्तेमाल करने का आरोप... शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि निर्धारित उच्च गुणवत्ता वाले एनआरवी गेस्केट के स्थान पर रबर गेस्केट का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यदि यह आरोप तकनीकी निरीक्षण में सही पाया जाता है तो यह जांच का विषय बन सकता है कि निर्धारित स्पेसिफिकेशन के स्थान पर वैकल्पिक सामग्री का उपयोग किसकी अनुमति से किया गया और उसकी गुणवत्ता की जांच किस अधिकारी ने की।
‘श्रम की कमाई’ लूटने वालों को बचाने वाला श्रम विभाग
श्रम विभाग व जिला कलेक्टर को इस बारे में सूचना देने के बाद भी अब तक कोई संज्ञान नहीं लिया गया। बस केस लगाने की बात करते हैं। श्रम विभाग में लेबर कोर्ट खंडवा लगती है। श्रम विभाग से पूछा जाए कि लेबर कोर्ट में अब तक कितने केस फाइनल हुए।
किसी भी मजदूर को आज तक नहीं फायदा मिला, जबकि श्रम विभाग के द्वारा ही सारे कार्य किए जा सकते थे। लेबर कोर्ट ही जाना है, तो श्रम विभाग बंद किया जाए, जहां कोई सुनवाई नहीं होती।
आखिर जिम्मेदारी किसकी?
सरकारी ई-टेंडर पोर्टल के अनुसार नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के मुख्य अभियंता, लोअर नर्मदा प्रोजेक्ट्स इंदौर ने नर्मदा-मालवा गंभीर लिंक परियोजना के तीन वर्ष के संचालन एवं रखरखाव के लिए टेंडर जारी किया था। इसकी टेंडर वैल्यू 12,00,09,600 है और कार्य अवधि 1095 दिन, यानी तीन वर्ष निर्धारित है।
पहले भी पॉवर लिंकर के पास था दो साल का काम... उपलब्ध टेंडर रिकॉर्ड यह भी बताता है कि इससे पहले नर्मदा-मालवा गंभीर लिंक परियोजना के दो वर्ष के संचालन एवं रखरखाव का काम पॉवर लिंकर को मिला था। संबंधित टेंडर का एओसी रिकॉर्ड अक्टूबर 2023 का है और उपलब्ध परिणाम में अनुबंध राशि 5.90 करोड़ दर्ज है।
200 से ज्यादा श्रमिकों का पैसा कहां गया?... श्रमिकों द्वारा उपलब्ध कराई गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि परियोजना में करीब 203 कर्मचारियों की आवश्यकता/स्वीकृत संख्या के मुकाबले लगभग 40 प्रतिशत कर्मचारियों से ही काम कराया गया।
श्रमिकों का दावा है कि उनसे लंबे समय तक 12-12 घंटे काम लिया गया, लेकिन ओवरटाइम, बोनस, पीएफ और ईएसआईसी जैसी सुविधाओं को लेकर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा। जनवरी-फरवरी 2026 का वेतन लंबे समय तक भुगतान नहीं किया गया, जबकि अप्रैल 2024 से घोषित एरियर का भुगतान भी लंबित है।
पीएफ कटौती पर उठे सवाल
श्रमिकों ने पीएफ को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अलग-अलग वेतन पाने वाले कर्मचारियों के पीएफ अंशदान में कथित रूप से समान 960 रुपए की कटौती दिखाई जा रही है। यह आरोप रिकॉर्ड से जांच का विषय है।
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