विधायकों को गांवों में रुकने का फरमान बेअसर: अब खुद मैदान में उतरेंगे मुख्यमंत्री; 48 घंटे में समस्याओं के समाधान की तैयारी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने और जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए बनाई गई गांवों में रात्रि विश्राम की रणनीति अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद आगे बढ़ाएंगे।
विधायकों को गांवों में रुकने का फरमान बेअसर
सत्ता और संगठन की ओर से विधायकों को अपने विधानसभा क्षेत्रों के गांवों में रात बिताने तथा मंत्रियों को प्रभार वाले जिलों में रुकने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इस पहल का अपेक्षित असर नजर नहीं आया।
अब मुख्यमंत्री खुद जिलों में रुककर सरकारी कामकाज की हकीकत जानेंगे और जनता से मिलने वाले फीडबैक के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार कराएंगे।
दो बार बनी रणनीति, लेकिन जनप्रतिनिधियों ने नहीं दिखाई गंभीरता
प्रदेश में सत्ता और संगठन पिछले ढाई साल में दो बार जनप्रतिनिधियों के रात्रि विश्राम की रणनीति बना चुके हैं।
इसका उद्देश्य गांवों में पहुंचकर लोगों की समस्याएं सुनना, सरकारी योजनाओं की जमीनी स्थिति समझना और कार्यकर्ताओं से संवाद करना था।
इसके बावजूद अधिकांश जनप्रतिनिधियों के स्तर पर यह पहल प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी। मंत्रियों के सामने भी जिम्मेदारियों का दबाव है।
कैबिनेट की बैठक, प्रभार वाले जिलों का दौरा, अपने विधानसभा क्षेत्र के लोगों से संपर्क और प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनने जैसी जिम्मेदारियों के बीच गांवों में रात बिताने के लिए समय निकालना चुनौती बन गया है।
ऐसे में सरकार की इस पहल को प्रभावी बनाने की जिम्मेदारी अब मुख्यमंत्री ने अपने हाथ में ले ली है।
बालाघाट के जंगलों से बड़वानी तक पहुंचा CM का दौरा
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हाल ही में बालाघाट के जंगलों में रात्रि विश्राम कर चुके हैं। इसके बाद रविवार को बड़वानी में रात बिताकर लौटे।
इससे पहले बैतूल के कुकरू-खामला में भी उन्होंने रात्रि विश्राम किया था।
वहां रात में आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ बैठक की और अगले दिन सुबह ग्रामीणों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनी थीं।
मुख्यमंत्री के इन दौरों का उद्देश्य केवल जिलों में रुकना नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, प्रशासनिक कामकाज और सत्ता-संगठन की कार्यप्रणाली का वास्तविक फीडबैक लेना है।
मुख्यमंत्री आवास की औपचारिक बैठकों से बाहर निकलकर सीधे लोगों के बीच पहुंचने की इस कवायद से अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री के दौरे के बाद 48 घंटे में कार्रवाई के निर्देश
सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री के जिलों में प्रवास के दौरान सामने आने वाली समस्याओं और प्रशासनिक कमियों को दूर करने के लिए 48 घंटे की समयसीमा तय करने के निर्देश हैं।
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जनता की शिकायतें केवल बैठकों और निरीक्षणों तक सीमित न रहें, बल्कि उन पर तत्काल कार्रवाई भी हो।
मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान मिलने वाले फीडबैक के आधार पर संबंधित विभागों और अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जा सकता है।
इससे प्रशासनिक व्यवस्था में कसावट लाने और योजनाओं के क्रियान्वयन में सामने आने वाली खामियों को दूर करने की कोशिश होगी।
अधिकारियों के रात्रि विश्राम पर भी उठे सवाल
करीब छह महीने पहले सरकार ने कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों और अन्य जिला स्तरीय अधिकारियों को भी मैदान में उतरकर गांवों में रात्रि विश्राम करने के निर्देश दिए थे।
शुरुआत में कुछ अधिकारियों ने गांवों का दौरा किया और रात भी बिताई, लेकिन कई जगह यह पहल वास्तविक जनसंवाद के बजाय औपचारिकता तक सीमित रहने की चर्चा सामने आई।
उज्जैन के एक आईएएस अधिकारी के गांव में खटिया पर सोने की तस्वीर भी चर्चा में रही थी। तस्वीर वायरल होने के बाद उनके चश्मा पहने हुए सोने को लेकर भी टिप्पणी हुई।
इस घटनाक्रम ने रात्रि विश्राम के उद्देश्य और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर को उजागर किया।
अब निगरानी के साथ परिणाम पर रहेगा जोर
सरकार की इस पहल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रात्रि विश्राम को केवल दौरे, बैठक या तस्वीर तक सीमित न रहने दिया जाए।
मुख्यमंत्री के सीधे संवाद और 48 घंटे में समस्याओं के निदान की व्यवस्था से यह परखने की कोशिश होगी कि गांवों में पहुंचने का असर सरकारी कामकाज पर कितना पड़ता है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि मुख्यमंत्री के जिलों में रुकने से अधिकारियों की कार्यशैली में कितना बदलाव आता है और जनता की शिकायतों का समाधान वास्तव में कितनी तेजी से हो पाता है।
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