मूर्ति वापसी के दावों की निकली हवा: आरटीआई में एएसआई ने खोली पोल; ब्रिटिश म्यूजियम से नहीं हुआ कोई पत्राचार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, धार।
धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला की वाग्देवी (देवी सरस्वती) प्रतिमा को लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से वापस लाने के वर्षों पुराने दावों पर आरटीआई के एक जवाब ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
केंद्र सरकार को दिया था सुझाव
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने स्पष्ट किया है कि उसके पास प्रतिमा की वापसी को लेकर ब्रिटिश म्यूजियम के साथ किसी भी तरह के पत्र-व्यवहार, बैठक या आधिकारिक प्रयास का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब हाल ही में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को देवी सरस्वती का मंदिर माना है और केंद्र सरकार को वाग्देवी प्रतिमा की वापसी की संभावना पर विचार करने का सुझाव दिया है।
आरटीआई में मांगी गई थी पूरी जानकारी
एक मीडिया संस्थान द्वारा दायर आरटीआई में एएसआई से चार महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई थी। इनमें प्रतिमा वापसी के प्रयासों की वर्तमान स्थिति, ब्रिटिश म्यूजियम के साथ हुए पत्राचार, इस विषय पर आयोजित बैठकों और भारत के कानूनी व राजनयिक दावे की स्थिति शामिल थी।
विषय से संबंधित कोई दस्तावेज या रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं
एएसआई के भोपाल सर्कल ने अपने जवाब में कहा कि वाग्देवी प्रतिमा को ब्रिटिश म्यूजियम से वापस लाने के संबंध में कोई पत्र-व्यवहार नहीं हुआ है। इसलिए इस विषय से संबंधित कोई दस्तावेज या रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इस जवाब ने प्रतिमा वापसी को लेकर किए गए सरकारी दावों और वास्तविक स्थिति के बीच मौजूद अंतर को उजागर कर दिया है।
145 साल पहले इंग्लैंड पहुंची थी प्रतिमा
इतिहासकारों और उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 1875 में भोजशाला परिसर के निकट हुई खुदाई में वाग्देवी की यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। इसके पांच वर्ष बाद, 1880 में एक ब्रिटिश अधिकारी इसे अपने साथ इंग्लैंड ले गया। बाद में यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम के संग्रह का हिस्सा बन गई।
प्रतिमा ब्रिटिश अधिकारी ने उपहार स्वरूप दी
संग्रहालय के रिकॉर्ड में भी उल्लेख है कि यह प्रतिमा एक ब्रिटिश अधिकारी द्वारा उपहार स्वरूप दी गई थी, जिसे यह भोजशाला के आसपास के खंडहरों से प्राप्त हुई थी। हिंदू संगठनों का दावा है कि यह प्रतिमा 11वीं सदी की है और इसका संबंध परमार वंश के महान शासक राजा भोज के काल से है।
वर्षों से उठती रही है वापसी की मांग
वाग्देवी प्रतिमा की वापसी का मुद्दा कोई नया नहीं है। जुलाई 2003 में यह मामला संसद में भी उठाया गया था। उस समय तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री विनोद खन्ना ने कहा था कि विदेशों में मौजूद भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
ठोस प्रक्रिया शुरू नहीं हुई
इसके बाद वर्ष 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी सार्वजनिक मंच से प्रतिमा की वापसी के लिए प्रयास करने का आश्वासन दिया था। हालांकि, आरटीआई में सामने आए तथ्यों से संकेत मिलता है कि इन घोषणाओं के बावजूद आधिकारिक स्तर पर कोई ठोस प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद फिर तेज हुई मांग
15 मई को मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला-कमाल मौला परिसर मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भोजशाला को देवी सरस्वती का मंदिर माना था। अदालत ने केंद्र सरकार को प्रतिमा वापसी की संभावनाओं पर विचार करने का सुझाव भी दिया था।
कानूनी और कूटनीतिक पहल करने की मांग
इसके बाद मामले के प्रमुख याचिकाकर्ता संगठन 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, संस्कृति मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर प्रतिमा की वापसी के लिए कानूनी और कूटनीतिक पहल करने की मांग की। संगठन का कहना है कि वाग्देवी प्रतिमा केवल एक पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
दावों और हकीकत के बीच बड़ा सवाल
आरटीआई के जवाब ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि वर्षों से प्रतिमा वापसी के दावे किए जाते रहे हैं, तो फिर सरकारी रिकॉर्ड में इस संबंध में कोई औपचारिक पत्राचार या कार्रवाई क्यों दर्ज नहीं है? फिलहाल, हाई कोर्ट के सुझाव और बढ़ते जनदबाव के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार भविष्य में इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं।
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