बेटियों की पढ़ाई का खर्च उठाना पिता की जिम्मेदारी: महिला सशक्तिकरण व्यवहार में भी दिखना चाहिए
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने महिला सशक्तिकरण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह केवल नीतियों और भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
46.26 लाख रुपए का भुगतान करने का आदेश
कोर्ट ने कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम पिता अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा से वंचित नहीं कर सकता और उनकी पढ़ाई का खर्च उठाना उसकी जिम्मेदारी है। इसी टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने मंदसौर निवासी एक पिता को अपनी दोनों बेटियों की उच्च शिक्षा पर खर्च हुए 46.26 लाख रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है।
फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती
मामला मंदसौर की फैमिली कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें पत्नी को 6 हजार रुपए प्रतिमाह और दोनों बेटियों को बालिग होने तक 3-3 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने के निर्देश दिए गए थे। पत्नी और बेटियों की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका में कहा गया कि यह राशि बेटियों की उच्च शिक्षा पर होने वाले वास्तविक खर्च के मुकाबले बेहद कम है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि शिक्षा पर हुए खर्च को भी भरण-पोषण का हिस्सा माना जाना चाहिए।
कोर्ट ने माना शिक्षा का अधिकार
जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि बेटियों को गुणवत्तापूर्ण और उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना माता-पिता की जिम्मेदारी है। यदि पिता आर्थिक रूप से सक्षम है तो वह केवल इस आधार पर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि बेटियां बालिग हो चुकी हैं।
बेटियों को शिक्षा और आत्मनिर्भर बनने के समान अवसर उपलब्ध हों
अदालत ने कहा कि महिला सशक्तिकरण की वास्तविक भावना तभी साकार होगी, जब बेटियों को शिक्षा और आत्मनिर्भर बनने के समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं। सुनवाई के दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों में बेटियों की उच्च शिक्षा पर हुए खर्च का विस्तृत विवरण रखा गया। रिकॉर्ड और तथ्यों का परीक्षण करने के बाद हाई कोर्ट ने पिता को 46 लाख 26 हजार रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया।
उच्च शिक्षा पर किया गया खर्च बेटियों के भविष्य से जुड़ा
अदालत ने स्पष्ट किया कि उच्च शिक्षा पर किया गया खर्च बेटियों के भविष्य और करियर निर्माण से जुड़ा है, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
फैसले का व्यापक संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, जहां बेटियों की उच्च शिक्षा के खर्च को लेकर विवाद सामने आते हैं। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बेटियों की शिक्षा कोई वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि उनके विकास और समान अवसरों का मूल अधिकार है। यह निर्णय महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानता और बेटियों की शिक्षा को लेकर न्यायपालिका की संवेदनशील सोच को भी दर्शाता है।
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