युवा अंगड़ाई की गूंज: सड़क से संसद तक
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. दीपक गोस्वामी स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कल तक जो बातें घर की चौपाल और वॉट्सएप समूहों में दबे स्वर में होती थीं, आज वही बातें सड़क पर नारे बन गईं। कल तक जो कुर्सी अडिग लगती थी, आज उसी पर बैठे एक वरिष्ठ मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। पहली बार ऐसा हुआ कि छात्रों की आवाज ने दिल्ली तक इतनी बुलंद दस्तक दी।
यह केवल एक व्यक्ति के जाने की खबर नहीं है। यह उस पीढ़ी की बुलंद एंट्री है, जो अब चुप नहीं रहेगी। यह उस व्यवस्था का आईना है, जो बहुत दिन से धुंधला हो गया था। यह उस मेहनत की जीत है जिसके पास नारा था, हौसला था और कलम थी।
उस मां को याद करिए जिसने चूड़ियां बेचकर बेटे की कोचिंग की फीस भरी। उस पिता को याद करिए जिसने फसल का सारा पैसा हॉस्टल और किताबों में लगा दिया। उस बच्चे को याद करिए, जो रात दो बजे तक पढ़ता रहा और सुबह उठकर पता चला कि जिस पेपर के लिए उसने जान लगा दी थी, उसकी निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो गए।
उसका कसूर क्या था? उसने झूठ नहीं बोला। उसने शॉर्टकट नहीं लिया। उसने व्यवस्था पर भरोसा किया। जब लाखों बच्चे एक परीक्षा में बैठते हैं और सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटें सीमित होती हैं, तब एक सीट के लिए सैकड़ों अभ्यर्थी प्रतिस्पर्धा करते हैं।
यह केवल प्रतियोगिता नहीं रह जाती, यह जीवन का संघर्ष बन जाती है। और जब परीक्षा प्रक्रिया पर संदेह पैदा हो, पेपर लीक या अनियमितताओं के आरोप सामने आएं, तब सबसे बड़ा आघात उसी ईमानदार विद्यार्थी को लगता है जिसने केवल मेहनत पर विश्वास किया था। उसके भीतर जो पीड़ा और आक्रोश पैदा होता है, वही आज सड़कों तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को टीवी पर नैतिकता कहा गया मगर जरा गहराई में देखें तो अनेक राजनीतिक विश्लेषक इसे स्व-घोषित नैतिकता के साथ-साथ राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखते हैं। संसद का मानसून सत्र सामने था।
विपक्ष लगातार शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहा था और छात्र आंदोलन भी चर्चा के केंद्र में था। ऐसे में सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम को कुछ लोग जनभावना के प्रति संवेदनशील प्रतिक्रिया मानते हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक क्षति को सीमित करने की रणनीति बताते हैं।
कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि इससे चर्चा का केंद्र शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा तंत्र, एनटीए और उससे जुड़ी व्यवस्थागत कमियों से हटकर एक व्यक्ति पर अधिक केंद्रित हो गया। वहीं सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। लोकतंत्र में इन दोनों दृष्टिकोणों पर चर्चा स्वाभाविक है।
विपक्ष की स्थिति भी कम दिलचस्प नहीं रही। लंबे समय से बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए जा रहे थे, लेकिन जिस व्यापक जनसमर्थन की आवश्यकता थी, वह इस बार छात्रों की स्वतःस्फूर्त भागीदारी से मिला। इसके बाद विभिन्न विपक्षी दल छात्रों के समर्थन में सामने आए।
यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। पर इतना भी सत्य है कि इस आंदोलन की प्रारंभिक ऊर्जा बड़ी सीमा तक स्वयं छात्रों और युवा संगठनों से आई। अब संसद में बहस होगी, जवाब मांगे जाएंगे और सुधार की मांग उठेगी।
दूसरी ओर सरकार यह कहेगी कि उसने कार्रवाई प्रारंभ कर दी है। असली कसौटी अब यह होगी कि सुधार केवल घोषणाओं तक सीमित रहते हैं या व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन दिखाई देता है।
सबसे पेचीदा खेल इस आंदोलन के नाम पर भी दिखाई देता है। आंदोलन परीक्षा व्यवस्था और उससे जुड़ी अनियमितताओं के खिलाफ था, लेकिन कोचिंग उद्योग भी लगातार इस बहस का हिस्सा बना हुआ है।
अनेक संस्थान स्वयं को छात्रों के हितैषी बताकर सुधार की बात करते हैं। दूसरी ओर आलोचक कहते हैं कि जितनी अधिक अनिश्चितता होगी, प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भरता और कोचिंग का बाजार भी उतना ही बढ़ेगा। जब तक बारहवीं के बाद सफलता का अर्थ केवल डॉक्टर या इंजीनियर बनना ही माना जाएगा, तब तक करोड़ों विद्यार्थी एक ही दरवाजे पर दस्तक देते रहेंगे।
आज समय की मांग है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की कमियों, स्किल डेवलपमेंट की वास्तविक स्थिति, व्यावसायिक शिक्षा की उपयोगिता तथा संगठित शिक्षा माफिया जैसे विषयों पर खुली, तथ्याधारित और राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा हो।
आज विद्यार्थी, अभिभावक और कोचिंग व्यवस्था के बीच ऐसा चक्र बन गया है, जिसमें सबसे अधिक दबाव युवा छात्र पर पड़ता है। कोचिंग उद्योग आज हजारों करोड़ रुपए का विशाल क्षेत्र बन चुका है और इस पर गंभीर नीति-स्तरीय विमर्श की आवश्यकता है।
इस सबके बीच खड़ा है पढ़ा-लिखा बेरोजगार युवा। जिसने वर्षों की तैयारी में लाखों रुपए और अपनी युवावस्था का बड़ा हिस्सा लगा दिया। जिसका कोई मजबूत विकल्प तैयार नहीं किया गया। जो असफल होने पर स्वयं को दोषी मानने लगता है, जबकि कई बार समस्या उसकी नहीं, बल्कि अवसरों और व्यवस्था की होती है।
विभिन्न सर्वेक्षणों में शिक्षित युवाओं के बीच बेरोज़गारी को गंभीर चुनौती बताया गया है, इसलिए इस बार का विरोध केवल नौकरी की मांग भर नहीं था। यह सम्मान, पारदर्शिता और निष्पक्ष अवसर की मांग भी था।
छात्रों का स्पष्ट संदेश था कि यदि वे ईमानदारी से मेहनत करते हैं तो परीक्षा प्रक्रिया भी उतनी ही ईमानदार होनी चाहिए। स्पष्ट है कि सरकार ने भी इस जनभावना की गंभीरता को महसूस किया और उस पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक समझा।
अब नजर 2027 के चुनावों पर भी रहेगी। सरकार भी युवाओं का विश्वास जीतना चाहेगी और विपक्ष भी। दोनों अपने-अपने तरीके से यह संदेश देंगे कि वे युवाओं की आवाज सुनते हैं। सरकार अपने निर्णयों को जवाबदेही और सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बताएगी, जबकि विपक्ष इसे जनदबाव की जीत कहेगा।
लेकिन यदि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा श्रेय किसी को दिया जाए, तो वह उन लाखों छात्रों और युवाओं को जाता है, जिन्होंने शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद की। यही उनकी पहली बड़ी उपलब्धि है।
यदि यह जागरूकता आगे भी बनी रही तो आने वाले समय में महंगाई, रोजगार, भर्ती प्रक्रिया, शिक्षा सुधार और युवाओं से जुड़े अनेक मुद्दों पर भी समाज अधिक सजग दिखाई देगा।
तो निचोड़ क्या है? यह कहना जल्दबाजी होगी कि व्यवस्था पूरी तरह बदल गई है, लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि व्यवस्था को जनता की आवाज सुननी पड़ी है। असली परीक्षा अब शुरू होती है। क्या एनटीए में पारदर्शिता बढ़ेगी? क्या जवाबदेही तय होगी? क्या पेपर की छपाई से लेकर परीक्षा केंद्र तक सुरक्षा और तकनीकी व्यवस्था मजबूत होगी?
क्या हर जिले में गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा के अवसर बढ़ेंगे ताकि माता-पिता को कर्ज न लेना पड़े? क्या स्किल और व्यावसायिक शिक्षा को भी डॉक्टर और इंजीनियर जितना सामाजिक सम्मान मिलेगा? यदि इन प्रश्नों के उत्तर धरातल पर दिखाई देते हैं, तभी इस आंदोलन को वास्तविक सफलता मिलेगी। अन्यथा यह भी अनेक समितियों और रिपोर्टों के बीच कहीं दब सकता है।
इसलिए अब आंखें बंद नहीं करनी हैं। सवाल पूछते रहना है शालीनता से, तथ्यों के साथ और लोकतांत्रिक मर्यादा में रहकर, क्योंकि जागरूक नागरिक ही मजबूत लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। सुबह हो चुकी है।
जो उठेगा वही रास्ता बनाएगा। और इस बार कलम केवल ओएमआर नहीं भरेगी, बल्कि उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और देश के भविष्य की नई इबारत लिखने को तैयार है। (ये लेखक के निजी विचार है)
संबंधित समाचार

दो कारोबारियों के प्रतिष्ठानों पर इनकम टैक्स की कार्रवाई:बिलिंग और माल की डिलीवरी के रिकॉर्ड की जांच; इन शहरों में भी टीमें सक्रिय

मेडिकल टीचर्स का पेन डाउन प्रदर्शन:नियमित सेवाएं बंद रखने की तैयारी; कर रहे हैं ये मांग

युवाओं के लिए सुनहरा अवसर:शहर में एक दिवसीय युवा संगम कार्यक्रम; इस दिन रोजगार, स्वरोजगार एवं अप्रेन्टिसशिप मेला

इंदौर जिले में निजी नलकूप खनन पर प्रतिबंध:कलेक्टर शिवम वर्मा ने जारी किए आदेश; जिले में औसत से काफी कम वर्षा

एडमिशन के नाम पर 90 से ज्यादा विद्यार्थियों से ठगी:पुलिस कमिश्नर को सौंपा ज्ञापन; पैसे और शैक्षणिक दस्तावेज लौटाने की मांग

YouTube को टक्कर देने की तैयारी:Instagram पर भी अपलोड होंगे इतने मिनट तक के वीडियो; टेस्टिंग शुरू

जनसुनवाई में प्रशासनिक संवेदनशीलता की मिसाल:कलेक्टर शिवम वर्मा ने सुनी आमजन की समस्याएं; किया त्वरित निराकरण

वीडियो देखिये, दिवंगत पुलिसकर्मियों के परिवारों को संबल:पुलिस कमिश्नर ने अनुकंपा नियुक्ति के तहत दो नव आरक्षकों को दिए नियुक्ति प्रमाण पत्र; जनसेवा करने के लिए किया प्रेरित

स्कूल की गाड़ी पेड़ से टकराई:7 बच्चे घायल; स्थानीय लोगों की मदद से पहुंचाया अस्पताल

देवास और सागर शराब कांड की गाज कलेक्टर पर भी गिरी:अब नेहा मीणा को देवास की कमान; दिलीप यादव सागर के नए कलेक्टर

पार्षद पर मुकदमे से कांग्रेस की आवाज नहीं दबेगी चौकसे:दर्ज प्रकरण को लेकर पुलिस कमिश्नर से मिलेगा प्रतिनिधिमंडल

शराब कांड के बाद देवास पुलिस अधीक्षक पुनीत गहलोत को हटाया:अब आदित्य मिश्रा होंगे नए पुलिस कप्तान; सागर के एसपी भी बदले गए

इंडिगो फ्लाइट की हार्ड लैंडिंग:विमान की तकनीकी जांच के चलते रुकी उड़ान; केंद्रीय मंत्री भी इसी से थे जाने वाले

मां नवयुवक गरबा मंडल की प्रतिभागियों को किया पुरस्कृत

कूनो की मादा चीते के 19 महीने के शावक को मारी गोली:इलाज के दौरान मौत की खबर; शरीर से निकले छर्रे, वन विभाग के आधिकारिक बयान का इंतजार

बिना रजिस्ट्री कैसे खुल गया फर्जी खाता:नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल

सेज यूनिवर्सिटी ब्रिज पर भीषण हादसा महिला और पुरुष की मौके पर हुई मौत:अज्ञात वाहन की टक्कर से हुआ हादसा

दिग्गज प्रोड्यूसर-डायरेक्टर का निधन:हार्ट अटैक से गई जान; 20 साल से ज्यादा समय तक दर्शकों के दिलों पर किया राज

सड़कों पर पानी बहा रहे नगर निगम के जर्जर टैंकर:जिम्मेदार दे रहे बचत की सीख

धर्मनगरी में चलती कार में गैंगरेप और मारपीट:युवती ने लगाया आरोप; दो पर हुआ केस दर्ज
टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी करें!