बड़ों की जवाबदेही तय होगी: ऐन मौके पर नया उम्मीदवार तय करने; पुराना बदलने की जिम्मेदारी किसकी
KHULASA FIRST
संवाददाता

जिला इकाई से बूथ कमेटी तक तो दिखा दी सख्ती, शेष जिम्मेदारों का क्या?
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश भाजपा की हर जिला इकाई के आम कार्यकर्ताओं में जितनी चर्चा उपचुनाव में हार की नहीं, उतनी हार के बाद प्रदेश संगठन की कार्रवाई पर हो रही है। हार के बाद जिस तरह तुरत-फुरत कार्रवाई की गई और उस कार्रवाई का शिकार जिस तरह पार्टी का औसत कार्यकर्ता हुआ, उससे पार्टी का जमीनी कार्यकर्ता न सिर्फ आहत, बल्कि आक्रोशित भी है।
पार्टी कैडर का कहना है कि क्या संगठन ऐसी हिम्मत व हिमाकत उन बड़े नेताओं के खिलाफ भी करेगा, जो सीधे इस उपचुनाव की हार-जीत से जुड़े हैं? सबसे ज्यादा गुस्सा सिर्फ इस बात पर है कि कार्यकर्ता तो पूरे प्राणपण से जमीन पर कमल खिलाने में डटा रहता है, लेकिन बड़े नेताओं के अहम का शिकार वही क्यों हो रहा है? अहम बड़े नेताओं के टकराव और सजा सिर्फ बूथ लेवल व मंडल, जिला स्तर का कार्यकर्ता भुगते? ये कैसा न्याय है? ये कैसा संगठन है?
भाजपा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी एक चुनाव की हार का जिम्मेदार पूरे जिले की भाजपा को ही मान लिया गया हो। क्या दतिया जिले की समूची भाजपा भितरघात कर रही थी? अगर कर रही थी तो ये घात-प्रतिघात क्या चुनाव परिणाम के बाद ही नजर आया? चलते चुनाव में वो संगठन क्या ‘नाबीना’ था, जो अब खुली आंख से आगबबूला हुआ बैठा है? दर्जनों नेता दतिया में चुनाव पर नजरे रख रहे थे।
इन सबको ये ‘बगावत’ नजर नहीं आई? चुनाव के प्रभारी, सह प्रभारी, उत्तराधिकारी आदि-आदि की फौज मैदान में उतरी हुई थी न? तो ये फौज कहां थी, क्या कर रही थी? जब पूरी जिला इकाई की दगाबाजी पर आमादा है, तो ये कैसे किसी से छिपा रह सकता है? इस सवाल का जवाब भी तो तलाशना होगा कि नहीं? अगर नहीं तलाशा जाता तो फिर दतिया में आम कार्यकर्ता पर हुई कार्रवाई पर सवाल खड़े होंगे ही, जो हो भी रहे हैं।
‘तीर्थाटन’ व ‘टूरिज्म’ करने वाले नेताओं से कब होंगे सवाल-जवाब?... ‘सरकार’ को दतिया का किला फतह करने के बड़े-बड़े दावे के साथ कई नेता तो भोपाल से लेकर प्रदेश के अलग-अलग हिस्से से पहुंचे थे न? ये क्या चुनाव के बहाने दतिया में सिर्फ ‘तीर्थाटन’ कर रहे थे? या महंगे रिसॉर्ट में आराम फरमा रहे थे और चुनाव को पीतांबरा पीठ का टूरिज्म मान रहे थे। लिस्ट निकालिए, कितने नेता दतिया में चुनाव फतह के दावों के साथ स्वयंभू बन पहुंचे थे।
संगठन की जिम्मेदारी से हटकर भी कई नेता नंबर बढ़ाने के गेम में चुनाव में शामिल हुए थे। उनसे भी तो जवाब तलब हो कि वे आखिर दतिया में क्या कर रहे थे? क्या ये भी ‘आंखों देखी मक्खी निगल रहे थे’ और सरकार व संगठन को कुछ बता नहीं रहे थे?
एक बड़ी समीक्षा बैठक क्या इन सब बातों के लिए नहीं होना चाहिए कि आखिरकार इतना बड़ा भितरघात सबको नजर क्यों नहीं आया? न ‘तीर्थाटन’ करने गए नेताओं को और उपचुनाव प्रक्रिया से संगठन के जरिये जुड़े नेता ये सूंघ पाए कि एक पूरी जिला इकाई दगा देने पर आमादा हो गई है।
भोपाल की नियमित निगरानी के बावजूद ये ‘अंटागाफिली’ का बने रहना गंभीर विषय है। इसकी चर्चा भी नहीं होना और अधिक चिंताजनक। इससे ही पार्टी कैडर में गुस्सा पनप रहा है। उस प्रशासनिक अमले की भी ये असफलता है, जो सरकार की नाक का सवाल बने चुनाव में सत्तारूढ़ दल की बगावत को भांप नहीं पाया। अमले की इस नाकामी ने आज सरकार के सामने असहज हालात पैदा कर दिए हैं।
औसत कार्यकर्ता तो इस हार पर खुश हैं, बेहद खुश..! प्रदेश भाजपा के बड़े नेताओं व क्षत्रपों के बीच के शीतयुद्ध का शिकार एक जिला इकाई ही क्यों? उन सब नेताओं पर भी हो न कार्रवाई, जो कमलदल में अब ‘कांग्रेस’ की तर्ज पर पार्टी के नुकसान से भी नहीं चूक रहे।
नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने का निर्णय करने वाले मन व मस्तिष्क भी स्वयं की जवाबदेही स्वतः ही तय करेंगे? अगर वे ऐसा सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकते तो कम से कम मन में भी स्वयं को इस हार का दोषी नहीं मानते हैं तो फिर ये ‘देवदुर्लभ कार्यकर्ता’ के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी होगी।
पार्टी के बड़े नेताओं की इस गैरजवाबदेही का ही ये नतीजा है कि उपचुनाव की हार से पार्टी का निःस्वार्थ कार्यकर्ता ये मानकर खुश हो रहा है कि इससे बड़े नेताओं को सबक मिलेगा, जो मनमानी पर उतर आए हैं। भरोसा न हो तो कार्यकर्ताओं का मन टटोलकर देखिए, वे दतिया की हार से खुश हैं। बेहद खुश।
क्या दतिया उपचुनाव की हार का जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ वहां का जिला संगठन ही है? शेष किसी की कोई भूमिका नहीं? अगर है, तो ऐसे बड़े नेताओं पर कार्रवाई कब होगी? क्या सिर्फ औसत जमीनी कार्यकर्ताओं पर ही संगठन अपना रसूख दिखाएगा?
क्या ये फैसला दतिया जिला इकाई का था कि नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी चुनाव लड़ेंगे? क्या दतिया जिला संगठन ने ये तय किया था कि उपचुनाव की कमान किसके हाथ में रहेगी? इलाके की पहचान से जुड़े नरोत्तम की बेदखली के फैसले से उपचुनाव के परिणामों पर होने वाले असर का ब्लूप्रिंट दतिया में बना था?
प्रतिष्ठापूर्ण उपचुनाव की जीत के ‘शिल्पकार’ व किरदार क्या दतिया भाजपा ने तय किए थे? कोई तो होंगे न कमलदल में, जिन्होंने ये ‘भगीरथी’ व ‘दुस्साहसी’ फैसले लिए होंगे? कोई एक नेता का तो ये काम नहीं होगा न? भोपाल से दिल्ली तक बिसात बिछी होगी न?
आखिर ‘शिकार’ किसी हलके-पतले का तो करना न था? ‘दतिया के दद्दा’ का शिकार, वह भी एेन चुनाव के मुहाने पर करने का फैसला जिन भी बड़े नेताओं का रहा, उनकी जवाबदेही क्या तय होगी? होगी भी या नहीं? या कब होगी?
ये यक्ष प्रश्न दतिया जिला इकाई के एक-एक बंदे पर हुई कार्रवाई के बाद न सिर्फ दतिया, बल्कि मध्य प्रदेश की समूची भाजपा में गूंज रहे हैं। प्रदेश भाजपा को शायद इल्म नहीं कि पूरी जिला संरचना को भंग करने के उसके फैसले ने पार्टी के उस कार्यकर्ता को आहत किया है, जिसे पार्टी चुनाव जीतने पर देवतुल्य व देवदुर्लभ कहती है।
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