अहंकार, अनुशासन और राष्ट्रीय चरित्र: उज्जैन से संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का दूरगामी संदेश; धर्म को रिलीजन समझने की भूल से लेकर अहंकार के नियंत्रण तक
KHULASA FIRST
संवाददाता

संघ प्रमुख के संबोधन के गहरे सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ
व्यक्तिवादी दंभ से लेकर वैश्विक नीति तक, उज्जैन धर्म संसद से भागवत का बड़ा संदेश
सभ्यतागत अनुशासन और पावर पॉलिटिक्स: क्यों अहम है आरएसएस प्रमुख की चेतावनी
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का उज्जैन में 'युवा धर्म संसद' के मंच से दिया गया संबोधन महज एक धार्मिक व्याख्यान नहीं है, बल्कि यह वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर एक गहरा विश्लेषणात्मक प्रहार है।
1700 युवाओं के सामने संघ प्रमुख का यह कहना कि कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि सब कुछ उनके नियंत्रण में है और सब उनकी इच्छा से होना चाहिए, सीधे तौर पर व्यक्तिवादी अहंकार और सत्ता के अति-केंद्रीयकरण पर एक तीखा प्रहार माना जा सकता है। यह संदेश किसी एक व्यक्ति या संस्था के लिए नहीं, बल्कि समाज और शासन में बैठे हर उस नेतृत्व के लिए चेतावनी है जो स्वयं को सर्वोपरि मानने लगता है।
धर्म की पश्चिमी अवधारणा 'रिलीजन' पर करारा प्रहार
भागवत ने बहुत ही सूक्ष्मता से धर्म की भारतीय और पश्चिमी परिभाषा का अंतर स्पष्ट किया। जब वे कहते हैं कि धर्म केवल पूजा-पद्धति या कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन है, तो वे सीधे तौर पर उस औपनिवेशिक सोच पर चोट करते हैं जिसने भारत के धर्म को पश्चिमी 'रिलीजन' के दायरे में समेट दिया।
कचरा न फैलाना, ट्रैफिक नियमों का पालन करना और दूसरों की उपासना-पद्धति का सम्मान करते हुए मतांतरण न करना ही धर्म है। यह व्याख्या संघ के उस 'नागरिक कर्तव्य' और 'सभ्यतागत अनुशासन' के एजेंडे को आगे बढ़ाती है, जो केवल मंदिर-मठों तक सीमित न होकर दैनिक नागरिक जीवन का हिस्सा है।
पड़ोसी देश पर चुटकी और 'भारत का डीएनए'
बिना नाम लिए पाकिस्तान का उल्लेख करते हुए भागवत ने भारत की विदेश नीति और सांस्कृतिक चरित्र के मूल अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अकारण विवाद और उपद्रव करने वाले पड़ोसी को भारत ने सबक सिखाया है, लेकिन उस पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की।
भारत में सरकारें भले बदलती रही हों, लेकिन वैश्विक संघर्षों में अकारण हस्तक्षेप न करना और संकट के समय दुश्मन की भी मदद करना, भारत के सांस्कृतिक डीएनए का हिस्सा है। यह वक्तव्य विश्व पटल पर भारत की 'सॉफ्ट पावर' और 'वसुधैव कुटुंबकम' की उस नीति का अनुमोदन करता है जो शक्ति संतुलन के साथ-साथ नैतिक मूल्यों पर टिकी है।
युवाओं को 'रिटायरमेंट के बाद' की मानसिकता से बाहर निकालने की कोशिश... समाज में गीता, रामायण और धर्म चर्चा को सेवानिवृत्ति के बाद की चीज मान लिया जाता है। भागवत ने इस सोच को खारिज करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से अंत तक रहता है और युवाओं को इसे अपनी ऊर्जा तथा आचरण का हिस्सा बनाना होगा।
उज्जैन की इस युवा धर्म संसद से निकला मुख्य निष्कर्ष यही है कि भारतीय समाज का पुनरुत्थान किसी अंधभक्ति या कट्टरता से नहीं, बल्कि नैतिक अनुशासन, आत्म-नियंत्रण, कर्तव्यबोध और अहंकार से मुक्ति के माध्यम से ही संभव है।
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