चौंकाने वाला कारनामा: चायवाला; मजदूर और ड्राइवर बने पुलिस के ‘स्थायी गवाह’, आरटीआई में खुलासा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
राजधानी भोपाल के मिसरोद थाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों और पुलिस के क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग एंड नेटवर्क सिस्टम ( सीसीटीएनएस) के रिकॉर्ड के विश्लेषण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। आरोप है कि पुलिस ने चाय-समोसे बेचने वाले, ढाबा संचालक, मजदूर और यहां तक कि अपने ही ड्राइवर को दर्जनों मामलों में गवाह बना दिया।
एक ही व्यक्ति को बार-बार गवाह बनाया
थाना प्रभारी रतन सिंह परिहार के 2 दिसंबर 2025 को पदभार संभालने से लेकर 16 अप्रैल 2026 तक महज चार महीने की अवधि में मिसरोद थाने में कुल 146 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 103 एफआईआर के विश्लेषण में एक ही व्यक्ति को बार-बार गवाह बनाए जाने का मामला सामने आया है।
ढाबा संचालक 36 मामलों में गवाह
सबसे हैरान करने वाला मामला 11 मील स्थित एक ढाबा संचालक विष्णु पाटिल उर्फ देवा पाटिल का है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसे 36 अलग-अलग मामलों में गवाह बनाया गया। दस्तावेजों से यह सवाल उठता है कि शहर के विभिन्न स्थानों पर हुई घटनाओं में एक ही व्यक्ति हर बार पुलिस का गवाह कैसे बन गया।
पुलिस का ड्राइवर 22 मामलों में बना गवाह
मिसरोद थाने में वाहन चालक के रूप में कार्यरत सुरेश अहिरवार को भी 22 मामलों में गवाह बनाया गया। रिकॉर्ड के अनुसार एक ही दिन में अलग-अलग एफआईआर में उसकी गवाही दर्ज की गई। इतना ही नहीं, एक महीने के भीतर वह 15 मामलों में गवाह के रूप में सामने आया।
मजदूर और चायवाला भी नहीं बचे
मजदूरी करने वाले राघवेंद्र मैना को 12 मामलों में गवाह बनाया गया, जबकि थाने के पास चाय-समोसे की दुकान चलाने वाले धर्मेंद्र कुशवाहा को तीन अलग-अलग मामलों में गवाह बनाया गया। इसके अलावा अन्य मजदूरों को भी एक ही दिन में कई मामलों में गवाह दर्शाया गया।
आरोपी बना गवाह, गवाह बना आरोपी
रिकॉर्ड में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां एक व्यक्ति को पहले आरोपी बनाया गया और बाद में दूसरे मामले में गवाह बना दिया गया। वहीं कुछ मामलों में गवाह के रूप में दर्ज व्यक्ति को बाद में आरोपी बना दिया गया। इस तरह की प्रविष्टियों ने जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
28 मामलों में पुलिसकर्मी ही बने गवाह
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक 28 मामलों में पुलिसकर्मी खुद ही गवाह बने हुए हैं। इनमें आरक्षक, प्रधान आरक्षक, सहायक उपनिरीक्षक और उपनिरीक्षक स्तर के कर्मचारी शामिल हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस को स्वतंत्र और निष्पक्ष गवाह नहीं मिले या फिर जांच प्रक्रिया में औपचारिकता निभाई गई।
शराब पीने के मामलों में अचानक बढ़ोतरी
दिसंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच दर्ज मामलों में 109 प्रकरण सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने, 15 वाहन चोरी, 14 घरों में चोरी और 8 अवैध शराब बिक्री से जुड़े पाए गए। रिकॉर्ड बताता है कि थाना प्रभारी के पदभार संभालने के बाद सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने के मामलों में अचानक तेजी आई, लेकिन अगले महीनों में इनकी संख्या कम हो गई। इससे कार्रवाई की निरंतरता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जांच प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
आरटीआई और सीसीटीएनएस रिकॉर्ड के आधार पर सामने आए इन तथ्यों ने मिसरोद थाना पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ही व्यक्ति का दर्जनों मामलों में गवाह बनना, आरोपी और गवाह की अदला-बदली तथा पुलिसकर्मियों का स्वयं गवाह बन जाना अब चर्चा का विषय बन गया है।
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