एक लाख की भीड़ जुटाने का लक्ष्य: विधायक टारगेट से चूके
KHULASA FIRST
संवाददाता

भाजपा की लोकतंत्र बचाओ यात्रा पर सवाल...
महिलाओं को यात्रा का मतलब नहीं पता, छात्र बोले- कार्यक्रम में आए हैं, अब परीक्षा में बैठने देंगे!
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर में बीजेपी की लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ पदयात्रा अब सियासी शक्ति प्रदर्शन और विवादों को लेकर चर्चा में है। कांग्रेस पर लोकतंत्र खतरे में डालने का आरोप लगाकर निकाली गई इस यात्रा में बीजेपी को अपनी ही व्यवस्थाओं और भीड़ जुटाने के तरीके को लेकर सवालों का सामना करना पड़ रहा है।
पदयात्रा में एक लाख लोगों को जुटाने का लक्ष्य रखा गया था। विधायकों को दस-दस हजार लोगों की भीड़ लाने की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन कई विधायक अपने टारगेट पर खरे नहीं उतर सके। सबसे ज्यादा भीड़ विधानसभा एक और दो से पहुंची, जबकि दूसरे क्षेत्रों से अपेक्षित संख्या में लोग नहीं आए।
इस पदयात्रा की चर्चा सिर्फ भीड़ तक सीमित नहीं रही। महिलाओं को यात्रा का उद्देश्य पता नहीं होने से लेकर स्कूल के बच्चों के परीक्षा में बैठने की बात कहने तक, कई ऐसे सवाल सामने आए, जिन्होंने पूरे आयोजन को विवादों में ला दिया।
बीजेपी ने इंदौर की इस पदयात्रा के लिए बड़े स्तर पर तैयारी की थी। सांसद, महापौर और पार्टी पदाधिकारियों को भी भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन आयोजन में विधानसभा एक और दो से ही ज्यादा भीड़ दिखाई दी।
इसकी कमान मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के समर्थकों के हाथ में रही। महापौर पुष्यमित्र भार्गव जेनजी और अधिवक्ताओं के साथ पहुंचे। विधायक मधु वर्मा भी लोगों को लेकर आए। वहीं विधायक मालिनी गौड़, महेंद्र हार्डिया और गोलू शुक्ला की ओर से अपेक्षित भीड़ नहीं जुटने की चर्चा रही। इसकी अंदरूनी रिपोर्ट भोपाल पहुंचने की बात भी सामने आई है।
महिलाओं को पता ही नहीं था लोकतंत्र बचाओ यात्रा का मतलब
पदयात्रा में शामिल कई महिलाओं से जब पूछा गया कि वे लोकतंत्र बचाओ यात्रा में क्यों आई हैं और लोकतंत्र बचाने का मतलब क्या है, तो वे इसका स्पष्ट जवाब नहीं दे सकीं। इसके अलावा कुछ महिलाएं सफेद टोपी पहने अन्नपूर्णा क्षेत्र में मकान तोड़े जाने की समस्या लेकर पहुंचीं।
कुछ लोगों ने नेताओं के सामने अपना विरोध दर्ज कराया। यानी लोकतंत्र बचाने के संदेश के बीच जनता अपनी समस्याएं और शिकायतें लेकर भी पहुंचती रही। कई महिलाओं को तो यह भी जानकारी नहीं थी कि जिस कार्यक्रम में वे शामिल हुई हैं, उसका उद्देश्य क्या है और इसके जरिए कौन-सा राजनीतिक संदेश दिया जा रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या लोगों को यात्रा के उद्देश्य और मुद्दों की जानकारी देकर बुलाया गया था या सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए उन्हें शामिल किया गया?
विधायकों के टारगेट पर सवाल
ऐसे में सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र और जनता की भागीदारी का भी है। जनता पूछ रही है- सत्ता भी आपकी, सरकार भी आपकी, फिर लोकतंत्र बचाने की जरूरत आखिर किससे पड़ रही है?
छात्रों की बात से खड़ा हुआ एक नया विवाद
इस पदयात्रा में स्कूल ड्रेस पहने बच्चे भी बीजेपी के झंडे लेकर नारे लगाते दिखाई दिए। जब कुछ छात्रों से बातचीत हुई तो उन्होंने बताया कि स्कूल में उनकी उपस्थिति कम थी और कार्यक्रम में आने के बाद उन्हें परीक्षा में बैठने दिया जाएगा।
छात्रों की इस बात ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया। सवाल यह है कि क्या बच्चों को कार्यक्रम में शामिल होने के बदले उपस्थिति या परीक्षा में बैठने की अनुमति का आश्वासन दिया गया था? अगर ऐसा है तो यह आश्वासन किसने दिया? इसकी पुष्टि स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग से होना बाकी है।
कॉलेजों को भी भेजा गया था बुलावा
पदयात्रा से पहले उच्च शिक्षा विभाग का एक आदेश विवादों में आया था। इसमें सरकारी और निजी कॉलेजों के स्टाफ और विद्यार्थियों को कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बुलाया गया था। कॉलेजों से कर्मचारियों और विद्यार्थियों की सूची भी मांगी गई थी।
इस आदेश पर कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब सांसद, मंत्री, विधायक और महापौर सभी बीजेपी के हैं, तब भीड़ जुटाने के लिए कॉलेजों को पत्र क्यों लिखने पड़ रहे हैं? उन्होंने संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की।
परदेसीपुरा चौराहे पर दुकानें कराई गई बंद, शराब की दुकान और अहाता रहे चालू!
बीजेपी की लोकतंत्र बचाओ पदयात्रा के दौरान परदेसीपुरा चौराहे पर नगर निगम कर्मचारियों और पुलिस ने दुकानदारों की दुकानें बंद करवा दीं। पदयात्रा के चलते आसपास की दुकानों का कारोबार बंद रहा, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि शराब की दुकान और अहाता चालू रहे।
ऐसे में सवाल है कि जब दुकानें बंद करवाई जा रही थीं, तो शराब की दुकान और आहते को चालू रखने की अनुमति किस आधार पर दी गई? पदयात्रा में सिख समाज, संत समाज और किन्नर समुदाय को आगे रखा, मंच पर पहुंचने से रोका! बीजेपी की लोकतंत्र बचाओ पदयात्रा के दौरान सिख समाज, संत समाज और किन्नर समुदाय को यात्रा में सबसे आगे जगह दी गई, लेकिन जब मंच पर पहुंचने की बात आई तो इन तीनों समुदायों को मंच से दूर रखा गया।
आरोप है कि हंसदास मठ के महाराज के साथ तीन-चार अन्य संत मंच पर जाना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इस दौरान पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया और पुलिसिया रौब दिखाते हुए उन्हें वहां से भगा दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि पदयात्रा में आगे रखकर सम्मान देने वाले संतों को मंच पर जगह क्यों नहीं दी गई?
क्या कैलाश विजयवर्गीय ने इस आयोजन में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई?
पूरे आयोजन की कमान मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के हाथ में रही। पदयात्रा के दौरान सरकारी रथ हटवाने और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहित सभी नेताओं को पैदल चलवाने की चर्चा रही।
मुख्यमंत्री के पहुंचने में देरी को लेकर भी अलग-अलग खबरें सामने आईं। शुरुआत में चर्चा थी कि सीएम के लेट होने से यात्रा शुरू होने में देरी हुई। वहीं बाद में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि मंत्री विजयवर्गीय की ओर से ही मुख्यमंत्री को थोड़ा रुककर आने की सूचना दी गई थी, क्योंकि उस समय तक पर्याप्त भीड़ नहीं जुटी थी, हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
मुख्यमंत्री कार्यक्रम में पहुंचे और पूरी पदयात्रा में पैदल शामिल हुए। विजयवर्गीय यात्रा के आगे रहकर कमान संभालते नजर आए। इसके अलावा कुछ महिलाएं मकान तोड़े जाने की समस्या लेकर पहुंचीं। कुछ लोगों ने नेताओं के सामने अपना विरोध दर्ज कराया। यानी लोकतंत्र बचाने के संदेश के बीच जनता अपनी समस्याएं और शिकायतें लेकर भी पहुंचती रही।
अब सबसे बड़ा सवाल जनता का है
केंद्र में बीजेपी की सरकार है। मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार है। इंदौर में बीजेपी के सांसद, विधायक और महापौर हैं। फिर आखिर लोकतंत्र किससे खतरे में है और इसे बचाने के लिए पदयात्रा किसके खिलाफ निकाली गई?
जिस यात्रा का उद्देश्य लोकतंत्र बचाने का संदेश देना था, उसमें शामिल कुछ महिलाओं को यात्रा का मतलब तक पता नहीं था। स्कूली छात्र परीक्षा में बैठने की बात कर रहे थे। कॉलेजों को विद्यार्थियों और कर्मचारियों की सूची भेजने के निर्देश दिए गए।
भ्रष्टाचार का पोस्टर देख भड़के कैलाश विजयवर्गीय
गाली देते हुए बोले- इतने जूते खाने के बाद भी यहां आ गया, हटाओ इसे
‘लोकतंत्र बचाओ’ पदयात्रा में दिखे मंत्री के तल्ख तेवर, पुलिस प्रह्लाद पांडे और उनकी पत्नी को पकड़कर ले गई, वे पूछते रहे- गुनाह क्या है?
भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ पदयात्रा में तब विवाद खड़ा हो गया, जब सामाजिक कार्यकर्ता प्रह्लाद पांडे नगरीय निकायों में कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ पोस्टर लेकर पहुंच गए। इसमें 30 हजार रुपए के बल्ब और 33 हजार लीटर फिनाइल का उल्लेख कर सवाल उठाए गए थे। पोस्टर देखते ही मंत्री कैलाश विजयवर्गीय नाराज हो गए।
वायरल वीडियो में विजयवर्गीय पुलिसकर्मियों से कहते सुनाई दे रहे हैं ‘इतने जूते खाने के बाद यहां आ गया। जबरदस्ती... हटाओ इसको।‘ श्पुलिस वाले यहां आओ, इसको गाड़ी में बैठाओ। मंत्री के निर्देश पर पुलिसकर्मियों ने प्रह्लाद पांडे को हटाया और हिरासत में लेकर परदेशीपुरा थाने पहुंचाया।
उनकी पत्नी संगीता पांडे को भी ले गई। पुलिस कार्रवाई के समय प्रह्लाद पांडे लगातार सवाल करते रहे ‘आखिर मेरा गुनाह क्या है? क्या कसूर किया है?’ पुलिसकर्मियों से कार्रवाई का कारण पूछते रहे, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई।
भ्रष्टाचार का पोस्टर बना विवाद की वजह
प्रह्लाद पांडे नगरीय निकायों में कथित अनियमितताओं को लेकर पोस्टर के माध्यम से विरोध दर्ज कराने पहुंचे थे। पोस्टर में लिखे आंकड़ों को लेकर मंत्री की नाराजगी सामने आई। सवालों का जवाब देने के बजाय पुलिस के जरिए प्रदर्शनकारी को हटवा दिया।
रैली में विरोध पर उठे सवाल
इस घटनाक्रम ने भाजपा की पदयात्रा के उद्देश्य पर ही सवाल खड़े कर दिए। एक तरफ लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात की जा रही थी, दूसरी तरफ भ्रष्टाचार का पोस्टर लेकर पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ता को प्रताड़ित किया गया।
मंत्री विजयवर्गीय से सवाल है पोस्टर में लगाए गए आरोप गलत थे तो जवाब तथ्यों के साथ दिया जा सकता था। आखिर जनहित के मुद्दे उठाने वाले व्यक्ति को पुलिस से हटवाने की नौबत क्यों आई? लोकतंत्र बचाने की रैली में भ्रष्टाचार पर सवाल पूछना इतना भारी पड़ गया कि जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही पुलिस के हवाले कर दिया गया।
भाजपा की रैली हुई सुपर फ्लॉप
कॉलेज के बच्चों को जबरन रैली में ले जाने के मामले में सोमवार को प्रदर्शन
कांग्रेस करेगी कलेक्टर से मांग, प्राचार्य को करो बर्खास्त
लोकतंत्र को संकट में डालने वालों की रैली को जनता ने नकारा
भाजपा के द्वारा आयोजित की गई रैली सुपर फ्लॉप हो गई है। लोकतंत्र को संकट में डालने वालों ने जब लोकतंत्र बचाव का नारा लगाया तो जनता ने भी उसे नकार दिया। इस रैली में कॉलेज के बच्चों को जबरन ले जाने के मामले में कांग्रेस सोमवार को कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन करेगी और जीडीसी मोती तबेला के प्राचार्य को नौकरी से बर्खास्त करने की मांग करेगी।
शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे ने कहा कि भाजपा के द्वारा ही सरकार में रहते हुए चुनाव आयोग के साथ मिलकर लोकतंत्र को खतरे में डालने का काम किया जा रहा है। भाजपा की इस हरकत के विरोध में देश के युवा और कांग्रेस के द्वारा आंदोलन किया जा रहा है।
इस आंदोलन के कारण भाजपा ने आज इंदौर में रैली के आयोजन की घोषणा की थी। यह रैली सुभाष नगर चौराहा से निकलकर पाटनीपुरा चौराहा तक जाना थी। इसके बाद में वहां पर केंद्रीय मंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री की सभा का आयोजन था। यह पूरा आयोजन सुपर फ्लॉप हो गया है।
चौकसे ने कहा कि दिनभर से कैलाश विजयवर्गीय के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिनमें कह रहे हैं कि सिंधी समाज के नेता एवं अन्य समुह के नेता आ गए लेकिन जनता नहीं आई है।
यह स्थिति सभी समाजों के साथ बनी है। भाजपा द्वारा सभी समाजों और व्यापारिक संगठनों की बैठक ली गई थी, लेकिन सभी ने इस रैली से किनारा कर लिया। चौकसे ने कहा कि हालात इतने खराब थे कि जब प्रदेश के मुख्यमंत्री भाषण दे रहे थे तब आयोजन स्थल पर 1000 लोग भी नहीं थे। इस रैली में सरकारी एवं प्राइवेट कॉलेज के बच्चों को जबरन लाने की कोशिश की गई।
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