सरकारी ठेकों पर बड़ा फैसला: ब्लैकलिस्टिंग के खिलाफ अब सीधे हाईकोर्ट का रास्ता खुला
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक (लार्जर) बेंच ने ठेकेदारों और कंपनियों की ब्लैकलिस्टिंग से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 4-1 के बहुमत से स्पष्ट किया कि ब्लैकलिस्टिंग केवल अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) का विवाद नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक कार्रवाई है। इसलिए ऐसे मामलों में प्रभावित ठेकेदार सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
करीब 262 पन्नों के इस विस्तृत फैसले की सुनवाई इंदौर हाईकोर्ट में ही हुई, क्योंकि मूल विवाद इंदौर नगर निगम से जुड़ा था।
60 लाख के ठेके से शुरू हुआ कानूनी विवाद
मामला वर्ष 2020 का है, जब इंदौर नगर निगम ने सांवेर विधानसभा क्षेत्र के वार्ड-21 स्थित अमरापुरी में सीसी रोड निर्माण का लगभग 60 लाख रुपए का ठेका नितिन इंटरप्राइजेस को दिया था।
नगर निगम का आरोप था कि सांवेर विधानसभा उपचुनाव के दौरान लागू आदर्श आचार संहिता के बावजूद ठेकेदार ने निर्माण कार्य जारी रखा और अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन किया।
इसके बाद निगम ने ठेका तत्काल निरस्त कर दिया। फर्म को तीन वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया और करीब 2.5 लाख रुपए की बैंक गारंटी जब्त कर ली।
इन आदेशों को ठेकेदार नितिन लोदवाल ने अपने अधिवक्ता अमित मिश्रा के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती दी।
दो अलग-अलग फैसलों से पैदा हुआ था कानूनी भ्रम
ब्लैकलिस्टिंग के मामलों में हाईकोर्ट की अलग-अलग पीठों के दो फैसलों ने कानूनी स्थिति को उलझा दिया था।
वीवा हाईवेज प्रकरण में अदालत ने कहा था कि ब्लैकलिस्टिंग के खिलाफ ठेकेदार सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकता है।
जबकि गौरी गणेश प्रकरण में कहा गया था कि ऐसे मामलों की सुनवाई मध्यप्रदेश मध्यस्थता अधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत ट्रिब्यूनल में होनी चाहिए।
इन्हीं विरोधाभासी निर्णयों के कारण सितंबर 2024 में पांच न्यायाधीशों की लार्जर बेंच गठित की गई थी।
4-1 के बहुमत से आया ऐतिहासिक फैसला
लार्जर बेंच में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया, जस्टिस सुबोध अभ्यंकर, जस्टिस विनय सराफ और जस्टिस आलोक अवस्थी ने बहुमत का निर्णय दिया, जबकि जस्टिस विवेक अग्रवाल ने असहमति व्यक्त की।
बहुमत के फैसले में कहा गया कि ब्लैकलिस्टिंग किसी व्यक्ति या कंपनी के व्यापार करने के अधिकार और प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है। इसलिए यह महज संविदात्मक विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक निर्णय है, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
ठेकेदारों के लिए बनेगा मिसाल
इस फैसले के बाद मध्यप्रदेश में ब्लैकलिस्ट किए गए ठेकेदारों और कंपनियों के लिए कानूनी स्थिति स्पष्ट हो गई है। अब ऐसे मामलों में उन्हें पहले ट्रिब्यूनल जाने की अनिवार्यता नहीं होगी और वे सीधे हाईकोर्ट में राहत की मांग कर सकेंगे। यह फैसला भविष्य में सरकारी ठेकों और ब्लैकलिस्टिंग से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जा रहा है।
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