क्या विजयवर्गीय को अब खटक रहा गौरव रणदिवे का बढ़ता कद: इंदौर की राजनीति में नए समीकरण; पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और मुख्यमंत्री की तारीफ से वरिष्ठ नेताओं की उड़ी नींद
KHULASA FIRST
संवाददाता

सूत्रधार शब्द बना सियासी विवाद, नितिन नबीन के सामने खुली खींचतान
सीएम के करीब आते ही तल्खी और चिंता
बेचैन मंत्री ने मंच से ही कस दिया तंज
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर की सियासत में इन दिनों एकाएक बड़े बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। कभी जिन्हें वरिष्ठ नेताओं के वरदहस्त से आगे बढ़ता माना जाता था, वे भाजपा प्रदेश महामंत्री गौरव रणदिवे अब इंदौर ही नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत छाप छोड़ रहे हैं। शहर में गौरव रणदिवे का कद जिस तेजी से बढ़ रहा है और जिस तरह वे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बेहद करीब आ रहे हैं, उससे स्थानीय राजनीति के समीकरण पूरी तरह बदलने लगे हैं।
गौरव की बढ़ती सक्रियता और मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंचों से बार-बार की जा रही उनकी तारीफ अब वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय खेमे के लिए बड़ी चिंता और झुंझलाहट का कारण बनती दिख रही है।
हाल ही में इंदौर में आयोजित स्वामित्व अधिकार योजना के भव्य कार्यक्रम में यह सियासी खींचतान खुलकर सामने आ गई। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की मौजूदगी में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंच से गौरव रणदिवे के प्रबंधन की जमकर सराहना की और उन्हें कार्यक्रम का असली ‘सूत्रधार' बताया।
लहजे और मौके ने इसे तंज बना दिया... इस घटना का विश्लेषण करते हुए राजनीति के जानकारों ने साफ कहा कि जब विजयवर्गीय मंच पर बोलने आए तो उन्होंने इसी लाइन को पकड़ लिया।
सुनने में यह धन्यवाद जैसा लगा, लेकिन लहजे और मौके ने इसे तंज बना दिया। नितिन नबीन जैसे शीर्ष नेता के सामने यह टिप्पणी आना अपने आप में इस बात का संकेत था कि भीतर की तकलीफ अब मंच तक पहुंच चुकी है।
विजयवर्गीय का प्रभाव और वर्चस्व... राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इंदौर भाजपा में लंबे समय से विजयवर्गीय का प्रभाव और वर्चस्व रहा है। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के सफल दौरों तक इंदौर में होने वाले हर बड़े आयोजन की जिम्मेदारी अब सीधे संगठन द्वारा रणदिवे को सौंपी जा रही है।
रणदिवे जिस प्रकार कार्यकर्ताओं को एकजुट कर भीड़ जुटाते हैं और व्यवस्थाओं की कमान संभालते हैं, उसने सीधे मुख्यमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान अपनी ओर खींचा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का लगातार रणदिवे की पीठ थपथपाना इस बात की तस्दीक करता है कि गौरव अब प्रदेश सत्ता के भी बेहद भरोसेमंद चेहरे बन चुके हैं।
बढ़ता विश्वास मंत्री विजयवर्गीय को सहज नहीं लगा
मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि गौरव के नेतृत्व में ही इस पूरे आयोजन की रचना और रूपरेखा तैयार हुई। मुख्यमंत्री का रणदिवे के प्रति यह बढ़ता विश्वास मंत्री विजयवर्गीय को सहज नहीं लगा। जब वे भाषण देने आए, तो आभार जताने के बहाने उन्होंने तंज कसते हुए कहा- मुख्यमंत्री का धन्यवाद, जिन्होंने आज राज की बात बताई कि कार्यक्रम के सूत्रधार गौरव रणदिवे थे। विजयवर्गीय का यह तंजभरा अंदाज सीधे तौर पर उनके खेमे की उसी झुंझलाहट को बयां कर रहा है, जो गौरव के बढ़ते कद के कारण पैदा हुई है।
भाजपा में सत्ता के भीतर एक नई खींचतान... जानकारों की राय है कि इंदौर भाजपा में सत्ता के भीतर एक नई खींचतान खुलकर सामने आ गई है। गुरुवार को ‘स्वामित्व अधिकार योजना’ के कार्यक्रम में जो कुछ मंच पर हुआ वह महज एक जुबानी नोकझोंक नहीं थी। यह भाजपा प्रदेश महामंत्री गौरव रणदिवे के बढ़ते कद और इससे मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के भीतर पनप रही बेचैनी का सार्वजनिक प्रदर्शन था।
कैसे ब बढ़ी रणदिवे का पूछपरख, कैसे बदले समीकरण
रणदिवे की राजनीतिक यात्रा को समझना इस पूरे विवाद की जड़ है। जब वे इंदौर भाजपा के नगर अध्यक्ष बने थे, तब यह माना जाता था कि उन्हें यह जिम्मेदारी विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के समर्थन से मिली। यानी शुरुआत में रणदिवे इसी खेमे की छाया में आगे बढ़े, लेकिन वक्त के साथ तस्वीर बदल गई।
रणदिवे का काम करने का तरीका और संगठन में उनकी सक्रियता ऐसी रही कि वे धीरे-धीरे विजयवर्गीय की छाया से निकलकर अपनी पहचान बनाने लगे। पार्टी के भीतर उनकी पकड़ मजबूत होती गई और वे सीधे मुख्यमंत्री के करीब नजर आने लगे। नतीजा यह कि जो नेता कभी विजयवर्गीय खेमे की उपज माने जाते थे, वे अब खुद एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनकर विजयवर्गीय के लिए ही चुनौती जैसे दिखने लगे।
मंत्री के खेमे में खलबली मचना स्वाभाविक
रणदिवे की इस बढ़ती पकड़ और मुख्यमंत्री से नजदीकी के चलते विजयवर्गीय खेमे में खलबली मचना स्वाभाविक है। निकाय चुनावों से लेकर संगठन के पदों तक, गौरव की मजबूत उपस्थिति ने पुराने दिग्गजों की राहें कठिन कर दी हैं।
कभी ‘अपने हाथों से उगे पौधों को न काटने' जैसा बयान देने वाले विजयवर्गीय अब मंच से सीधा तंज कसने पर मजबूर हैं। सार्वजनिक मंचों पर दोनों नेताओं की बॉडी लैंग्वेज और तल्खियां यह साबित कर रही हैं कि इंदौर में रणदिवे का बढ़ता सियासी वर्चस्व अब पुराने छत्रपों के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन चुका है।
निगम चुनाव का कोण भी अहम
इस तनातनी के पीछे सिर्फ तारीफ का सवाल नहीं है। बताया जाता है कि विजयवर्गीय को रणदिवे का बढ़ता कद इसलिए भी पच नहीं रहा, क्योंकि रणदिवे नगर निगम चुनाव में महापौर पद के सबसे मजबूत दावेदारों में से एक थे और संगठन उन्हें यह चुनाव लड़ाना चाहता था, लेकिन विजयवर्गीय इसके पक्ष में नहीं थे।
विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट को लेकर भी दोनों के बीच एक बार अनबन हो चुकी थी। जब बाद में रणदिवे को महामंत्री बनाया गया तो यह नाराजगी और गहरी हो गई। स्थिति यह है कि पहले जो रिश्ते सहज हुआ करते थे, अब लगातार विरोध और दूरी में बदल गए हैं।
कांग्रेस को मिला तंज का मौका
कांग्रेस के मीडिया को-ऑर्डिनेटर नीलाभ शुक्ला ने कहा कि भाजपा में गुटबाजी किस हद तक है, यह बात राष्ट्रीय अध्यक्ष के ही कार्यक्रम में सामने आ गई। मुख्यमंत्री एक तरफ महामंत्री की तारीफ करते हैं और मंत्री विजयवर्गीय दूसरी तरफ चुटकी लेते हैं, तो यही तालमेल की सच्चाई बयां करता है।
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