दतिया उपचुनाव: हार का ठीकरा नरोत्तम, शिवराज मोहन, मोदी और संघ पर फोड़ा
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी और राजनीतिक हलकों में जो कहानियां प्रचलन में हैं, ज्यादातर एक ही बिंदु पर केंद्रित हैं- टिकट किसने कटवाया और किसने दिलवाया। इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, शिवराजसिंह चौहान, संघ के नेताओं और यहां तक कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का नाम लिया जा रहा है, लेकिन आंकड़े और जमीनी हकीकत बताते हैं हार सिर्फ टिकट बंटवारे की राजनीति का नतीजा नहीं, बल्कि पार्टी संगठन के भीतर की गहरी और पुरानी भितरघात का परिणाम है।
और इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका को लेकर जो सवाल उठाया जा रहे हैं, वह शायद सच्चाई से दूर है। असली कारण जानबूझकर या अनजाने में पीछे छूट गया है। शिवराज सरकार से लेकर 2023 और 2026 तक दतिया में भाजपा नेता की छवि का सवाल एक बड़ा कारण रहा जिसके कारण टिकट कटा और जिसे मिला वह टिक नहीं पाया।
इसके पीछे मुख्य किरदार हाईकमान का रहा होगा, जिस पर बात नहीं की जा रही है। भाजपा में सरकार की नीतियों की जो प्रतिकूल स्थिति बनी हुई है, उसमें संगठन ने टिकट तय करने में अच्छी खासी एक्सरसाइज की थी। ऐसे में मुख्यमंत्री पर निशाना साधना सही विश्लेषण नहीं कहा जा रहा है।
क्या कहते हैं आंकड़े
चुनाव नतीजों को करीब से देखें तो तस्वीर साफ होती है। 2023 के मुकाबले कांग्रेस के वोट इस उपचुनाव में 22 हजार से ज्यादा घटे हैं। ये वोट एक अन्य छोटी पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव को मिले। माना जा रहा है 22000 वोटो में से कांग्रेस के करीब 15000 वोट कट गए।
कहा जा रहा है भाजपा ने आजाद समाज पार्टी को मैदान में उतारा था ताकि दलित वोटो में सेंध लगाकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया जाए लेकिन इस रणनीति का नुकसान भाजपा को उठाना पड़ गया क्योंकि करीब 7000 से अधिक वोट भाजपा के भी कट गए।
यानी कांग्रेस की जीत किसी असाधारण प्रदर्शन का नतीजा नहीं है। इसके उलट भाजपा ने 2023 की तुलना में ज्यादा वोट गंवाए और हार गई। स्पष्ट है यह कहानी कांग्रेस के मजबूत होने की नहीं, बल्कि भाजपा के अपने परंपरागत वोट बैंक के खिसकने और पार्टी के भीतर के ही कार्यकर्ताओं और समर्थकों के अपने उम्मीदवार के खिलाफ खड़े होने की है।
सवाल यही है वह परिस्थिति बनी ही क्यों, जिसमें पार्टी का अपना तंत्र अपने ही प्रत्याशी के खिलाफ काम करता दिखा? इस सब में मुख्यमंत्री की भूमिका इसलिए भी नगणय मानी जा रही है क्योंकि दतिया में भाजपा की राजनीति पूरी तरह से नरोत्तम मिश्रा के इर्द-गिर्द घूम रही थी।
चुनाव परिणाम के तुरंत बाद प्रधानमंत्री से शिवराजसिंह चौहान की चर्चा और अगले ही दिन पार्टी महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय की केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात, इन दो घटनाओं ने ‘शिवराज फैक्टर’ की थ्योरी को और बल दिया है।
लेकिन ध्यान रखने योग्य है पूर्व मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय नेताओं की हाईकमान से नियमित मुलाकातें राजनीति में सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं, और इन्हें एक विशेष चुनाव नतीजे से सीधे जोड़ना अटकल के दायरे में ही आता है, जब तक कि पुष्टि करने वाला कोई ठोस सूत्र सामने न आए।
टिकट के खेल से दूरी?... इस पूरे प्रकरण में जो सबसे महत्वपूर्ण और कम चर्चित पहलू है, वह है नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने में मुख्यमंत्री डाँ. मोहन यादव की सीधी भूमिका सामने नहीं आती। मुख्यमंत्री होने के नाते पूरे चुनाव की जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से उनके कंधों पर आ गई, लेकिन दतिया का चुनाव शुरू से ही सीधा नहीं, बल्कि बेहद पेचीदा था, यहां कांग्रेस से ज्यादा चुनौती भाजपा के भीतर से ही थी।
संगठन के अपेक्षाकृत कम अनुभवी नेताओं और बड़े नेताओं की खींचतान के बीच मुख्यमंत्री को एक साथ कई मोर्चों पर चुनाव संभालना पड़ा। ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रहलाद पटेल, नरेंद्रसिंह तोमर, रमा भारती और शिवराजसिंह चौहान, इनमें से कोई भी अपने-अपने खेमे से बाहर आकर पूरी ताकत से चुनाव में उतरता नहीं दिखा, जिससे मुख्यमंत्री के लिए स्थिति और मुश्किल हो गई। इसके अलावा जातीय समीकरण साधने में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह भारी पड़े।
नजरअंदाज किया गया असली फैक्टर... चुनाव विश्लेषण में एक और बड़ा पहलू लगभग गायब है कांग्रेस प्रत्याशी की ईमानदार, सरल और सहज छवि, जिसने मतदाताओं के बीच भरोसा पैदा किया। इसके अलावा केंद्र सरकार की नीतियों, युवाओं में बेरोजगारी और महंगाई का आक्रोश, विद्यार्थियों की नाराजगी, भ्रष्टाचार के मुद्दे और सनातन के नाम पर संघ के अतिवाद के खिलाफ भी वोट पड़ा।
संकटकाल में मुख्यमंत्री की भूमिका... दतिया का चुनाव मुख्यमंत्री के लिए सीधा-सरल नहीं था। भीतरघाट की आशंका शुरू से थी। राजनीतिक चतुराई से इसे नियंत्रित करने की कोशिश की गई, जिसके चलते कुछ प्रतिशत मतों की बढ़त हासिल भी हो सकी। गौर करने वाली बात है मुख्यमंत्री को अस्थिर करने की कोशिश भाजपा संगठन के भीतर पहले दिन से ही चल रही है।
टिकट कटने की थ्योरी: जितने मुंह उतनी बातें... नरोत्तम मिश्रा को टिकट न मिलने और आशुतोष तिवारी को टिकट मिलने के पीछे कई प्रतिस्पर्धी कहानियां प्रचलन में हैं: - एक थ्योरी शिवराजसिंह चौहान के "कोटे" से टिकट आने और इसमें प्रधानमंत्री की सहमति क्या उनकी पसंद से जुड़े होने की है, जिसका आधार चुनाव परिणाम पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री द्वारा शिवराज को बुलाया जाना बताया जा रहा है। - एक अन्य कहानी संघ और भाजपा नेताओं की सहमति से टिकट तय होने की है।
तीसरी कहानी है प्रदेश सरकार के ‘संरक्षक’ कहे जाने वाले संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेश सोनी और मुख्यमंत्री ने मिलकर नरोत्तम का टिकट कटवाया। यह कहानी अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई है क्योंकि टिकट को लेकर वस्तुस्थिति कुछ और ही बताई जा रहा है।
इसमें शिवराज सिंह चौहान फैक्टर को निर्णायक बताया जा रहा है। इन तीनों कहानियों में एक विरोधाभास साफ है अगर मुख्यमंत्री ने टिकट कटवाया, तो शिवराज-कोटे और पीएम-सहमति वाली थ्योरी खुद-ब-खुद कमजोर पड़ जाती है, और अगर टिकट शिवराज या हाईकमान के स्तर पर तय हुआ, तो मुख्यमंत्री की भूमिका सीमित हो जाती है।
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