चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया
KHULASA FIRST
संवाददाता

स्मृति शेष
चंद्रशेखर शर्मा 94250-62800 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आशाजी (आशा भोसले) के निधन की खबर से बेशुमार लोग वाकई सकते में हैं और सदमे में। गोया सभी को ऐसा महसूस हो रहा है मानों दिल के सितार पर कोई लरजती धुन बज रही थी और अकस्मात उसकी कोई कॉर्ड चटककर लटक जाए!
कहते हैं कि आशाजी की बड़ी बहन लता मंगेशकर स्वर कोकिला थीं, लेकिन हकीकत यही है कि यही बेशुमार लोग आशाजी के जाने पर खुद को ज्यादा दु:खी, ज्यादा मायूस, ज्यादा स्तब्ध और अधिक विचलित महसूस कर रहे हैं। बेशक लताजी की महानता का अपना आसमान और बुलंदी ऐसी थी कि किसी की मजाल नहीं हो सकती उससे मुकरने की।
अलबत्ता इसका क्या कीजिएगा कि इन दोनों, यानी लताजी और आशाजी के जाने के बाद वही बेशुमार लोग अब एकदम छुट्टा होकर ये बात कह रहे हैं कि उन्हें लताजी से ज्यादा आशाजी का वो खिलंदड़, मस्त और उरेप गायन अधिक पसंद था। बहुत-से किशोर (हमारे खंडवे वाले महान किशोर कुमार) दीवाने मानते हैं कि गायन में यही आशाजी जनाना किशोर कुमार थीं। बोले तो फीमेल किशोर!
बहरहाल, ऐसे ही एक आशा दीवाने सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’ ने फेसबुक पर उन्हें लेकर एक पोस्ट लिखी है और वही पोस्ट साभार यहां हाजिर है। क्योंकि लता दीदी जल्दी सो जाती हैं, इसलिए ओपी नैयर साहब रात दो-ढाई बजे आशाजी को घर छोड़ने के बहाने इतनी जोर से ब्रेक लगाते थे कि आस-पड़ोस के लोग घबराकर उठ जाएं।
ये वो समय था, जब आशाजी और लताजी के बीच रिश्ते बहुत खट्टे हो चुके थे। लताजी को कैबरे आदि के जो गाने पसंद नहीं आते थे, वे गाने वह आगे आशाजी को ट्रांसफर कर देती थीं।
छोटी बहन होने के नाते संगीत में भी उनका कद छोटा ही रहे, हमेशा बचा हुआ काम मिले, भला ये आशाजी को कैसे मंजूर होता। तब ओपी नैयर उनके जीवन में एक ऐसी सहर बनकर उभरे कि जीवन से सारे गिले-शिकवे पीछे छूट गए।
आओ हुजूर तुमको, सितारों में ले चलूं…, कजरा मुहब्बत वाला, अंखियों में ऐसा डाला..., आइए मेहरबां, बैठिए जाने जां..., ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा न घबराइए...
मतलब क्या ही कमाल जोड़ी रही इन दोनों की... ओपी भी सनकी संगीतकार थे, कसम खाई थी कि कभी लता के साथ गाना नहीं बनाऊंगा, नहीं बनाया। 15 साल तक आशा भोसले का ऐसा साथ दिया कि पर्शिएलिटी का इल्जाम लगने लगा। जो गाने गीता दत्त, शमशाद बेगम या अन्य किसी सिंगर पर फिट हो सकते थे, वो भी आशाजी को देने लगे।
लताजी को जिंदगी में बेशुमार यश मिला, उनका नाम सदा सम्मान से लिया गया। पर आशाजी की कहानी तो मसालों भरी थी न, उनको सम्मान कमाने से पहले ढेरों लानतें बटोरनी पड़ीं। पिता दीनानाथ मंगेशकर के जाने के बाद मंगेशकर फैमिली के सिर आर्थिक दुश्वारियां तो आईं ही, परिवार को एक रास्ते पर ले जाने वाली लीडरशिप भी खराब हो गई।
लताजी तब 15-16 साल की ही तो थीं, जब उनको घर संभालने के लिए इंडस्ट्री में उतरना पड़ा। वहीं बड़ी बहन से चार साल छोटी आशा भोसले भी तब मात्र 16 साल की थीं, जब लताजी के 36 वर्षीय सेक्रेटरी गणपतराव भोसले से शादी करने के लिए उन्होंने घर ही छोड़ दिया।
जिस साल इतने बवाल के बाद शादी हुई, उसी साल पहला बेटा हेमंत भी हो गया। क्या लानतें मिली होंगी उन्हें उस वक्त। अंदाजा लगाना भी कठिन है। लेकिन ये आनन-फानन की गई शादी कब रोज के लफड़े-झगड़े में बदल गई, आशा ताई को अंदाजा न हुआ।
1955 के आसपास उनकी जिंदगी में ओपी नैयर के रूप में जो म्यूजिक डायरेक्टर मिला, वो किसी देवता से कम क्या लगता होगा। म्यूजिक स्टूडियो के देवता के बाद घर पर पति के रूप में जो राक्षस था, उससे रिश्ता कमजोर होने लगा। भोसले आशाजी को काम करते नहीं देख पा रहा था।
मात्र 10 साल चली इस शादी से जब तीसरी औलाद होने को थी, तब डमेस्टिक अब्यूज से परेशान होकर आशा ताई लौट आईं अपने घर और फिर कभी मुड़कर नहीं गईं। लेकिन तब के समय में शादी तोड़ने के बाद जो प्रताड़ना मिली होगी उन्हें, उसका अंदाजा भी नहीं होगा आज किसी को।
शायद ये भी एक वजह थी कि लता और आशा के बीच प्रेम नगण्य होने लगा था। पर अंधेरी रात की सुबह ओपी के संग हुई तो 15 साल चली, लेकिन आखिर यहां भी रिश्तों में ब्रेक लगने ही थे, क्योंकि ओपी पहले से शादीशुदा थे, सो ब्रेक लगे... आशाजी ने ओपी के साथ जो आखिरी गीत रिकॉर्ड किया था, उसके बोल बड़े दिलचस्प थे- ‘चैन से हमको कभी, आपने जीने ना दिया, जहर भी चाहा अगर, पीना तो पीने ना दिया...’।
ओपी नैयर पर जबरदस्त किताब लिख चुके पराग डिमरी साहब बताते हैं कि इस गाने की रिकॉर्डिंग में आशाजी फूट-फूटकर रोईं और तब जो स्टूडियो से निकलीं तो फिर कभी ओपी से नहीं मिलीं।
क्योंकि फिर उनका साथ पंचम दा के साथ बनने लगा था। 1980 में आशा ताई ने पंचम दा से शादी कर ली। धीरे-धीरे लताजी से भी उनके रिश्ते सुधरने लगे। आफ्टरऑल, आरडी बर्मन की तो हर एल्बम में लताजी के गाने होते ही थे।
एक समय बाद तब की गलतियों पर आशाजी को बहुत पछतावा भी हुआ, ऐसा कई जगह सुनने को मिलता है। क्या इत्तेफाक है कि चार साल पहले लताजी भी 92 वर्ष की आयु में शरीर से मुक्त हुई थीं और अब आशा ताई की उम्र भी 92 वर्ष ही थी, जब उनका देहावसान हुआ। आज गिले-शिकवे, ओपी-आरडी सब पीछे रह गया...!
इंडियन फिल्म्स के म्यूजिक में जो गोल्डन पीरियड था, उसमें पांच गायकों के नाम सबसे बड़े थे, जिनकी जगह कभी कोई न ले पाया।
मुहम्मद रफी, मुकेश, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और आशा भोसले...! अब उस आइकॉनिक ग्रुप का आखिरी पिलर भी ढह गया। अंत में किसी का यह शे’र-
‘कुछ लोग यूं बुलंद थे कि दास्तान हो गए
पैदा हुए जमीन पर और आसमान हो गए!’
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