शराब ठेकेदारों पर गिरेगी गाज या फिर सिस्टम रहेगा बेनकाब: हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में खुलेआम फल-फूल रहे अवैध शराब के कारोबार को लेकर दायर जनहित याचिका पर कल हाईकोर्ट में हुई सुनवाई ने आबकारी विभाग और शराब ठेकेदारों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए तीखे तर्क सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब निगाहें अदालत के उस फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि अवैध शराब के इस गोरखधंधे में बड़े मगरमच्छों पर कार्रवाई होगी या फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
याचिका में दावा किया गया है कि प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में 24 घंटे शराब की अवैध बिक्री हो रही है। खासकर गुजरात से सटे जिलों में हालात यह हैं कि शराब तस्करी किसी छुपे खेल की तरह नहीं, बल्कि खुलेआम की जा रही है। आरोप है कि आबकारी विभाग कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिक खानापूर्ति कर रहा है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि जब भी शराब तस्करी पकड़ी जाती है तो सिर्फ ट्रक ड्राइवर और क्लीनर को आरोपी बना दिया जाता है, जबकि असली खेल खेलने वाले शराब फैक्ट्री मालिक, ठेकेदार और वेयरहाउस संचालक हमेशा कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं।
आज तक किसी बड़े शराब कारोबारी पर ठोस कार्रवाई नहीं होना पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगाता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि इस अवैध शराब तस्करी से शासन को हर साल करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है।
आंकड़े के जरिए किया था खुलासा
पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनिल ओझा ने कोर्ट के सामने चौंकाने वाले आंकड़े रखे थे। उन्होंने बताया था कि बड़वानी, झाबुआ और धार जिलों में एक ही साल में शराब तस्करी के 163 मामले दर्ज हुए, लेकिन किसी भी केस में यह जांच तक नहीं की गई कि शराब कहां से आई और किसे सप्लाई की जानी थी।
इससे यह साफ होता है कि जांच जानबूझकर अधूरी छोड़ी जा रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि याचिकाकर्ता ने समाज के लिए क्या कार्य किए हैं। इस पर अधिवक्ता ओझा ने बताया कि याचिकाकर्ता राजनीति से जुड़े हैं और समाजसेवा करते हैं।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता पर 12 आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इस पर अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि यह जानकारी स्वयं याचिका में दी गई है और सभी मामलों में याचिकाकर्ता बरी हो चुके हैं। करीब एक घंटे चली बहस के बाद कोर्ट ने सभी पक्षों के तर्क सुनते हुए आदेश सुरक्षित रख लिया। अब सवाल यह है कि क्या हाईकोर्ट का फैसला अवैध शराब के बड़े नेटवर्क को बेनकाब करेगा या फिर कार्रवाई का दायरा एक बार फिर छोटे मोहरों तक ही सीमित रह जाएगा।
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