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पुष्यमित्र और कैलाश ही क्यों पीएं विष: जल में जहर का मुद्दा बना राष्ट्रव्यापी

KHULASA FIRST

संवाददाता

09 जनवरी 2026, 11:02 पूर्वाह्न
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पुष्यमित्र और कैलाश ही क्यों पीएं विष

अंशुल पंडित खुलासा फर्स्ट।

विष का प्याला पीना है, तो सब पीएं

ये वो मोहन नहीं, जो पुष्यमित्र या कैलाश ही विष पीएं।

योगदान क्या सिर्फ कैलाश का है,

मोहन का भी तो बराबर का है।

अफसरशाही क्या कैलाश की थी,

अफसरशाही के प्रभारी मोहन ही थे।

शिव का राज तो पहले भी था प्रदेश में, छल हुआ सिर्फ मोहन राज में।

मोहन का मंत्रिमंडल मत बदलो,

मंत्रिमंडल के मुखिया पर भी विचार लो।

ये विष कैलाश का नहीं, विष पीना है, तो सब पीएं।

सिर्फ हलाहल के लिए मित्र और कैलाश ही क्यों..?

विष पीना ही है, तो सब पीएं।

ये वो मोहन नहीं, जिसके लिए कैलाश विष पीएं, विष पीना ही है तो सब पीए। फिर क्या मंत्री और क्या महापौर? जरूरी है इंदौर के प्रभारी मंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी। अब सर्जरी सिर्फ इंदौर की प्रशासनिक नहीं, जरूरी है प्रदेश में राजनीतिक सर्जरी की भी। सिर्फ हालाहल के लिए मित्र और कैलाश ही क्यों? प्रदेश के आंगन में तुलसी भी तो है, जो जल को सींचने का काम कर रही है। फिर वो दोष क्यों नहीं हर रही।

महापौर के मित्र बन गाड़ी में बबलू शर्मा भी तो बैठे हैं। इस दोष के कलंक की गाड़ी में पार्षद से लेकर मुख्यमंत्री स्वयं भी तो सवार हैं। अफसरशाही का स्टीयरिंग खुद इंदौर के प्रभारी मंत्री छलिया मोहन के हाथ में ही है, तो इस विष का प्याला सिर्फ पुष्यमित्र और कैलाश ही क्यों पीएं?

इस षड्यंत्रकारी राजनीतिक खेल में इंदौर सुदर्शन कार्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पुष्यमित्र की क्लास ली तो फिर कहीं ऐसी क्लास में मोहन को भी तो खड़ा करो। लगता है इसीलिए भार्गव के साथ कलेक्टर शिवम वर्मा को भी खड़ा कर दिया। सुदर्शन में तलब कर लिया।

सही भी कहा था मित्र ने कि अफसर सुनते नहीं, बोल देना मुख्यमंत्री को। इसके मायने प्रदेश की राजनीतिक गुटबाजी की सुगबुगाहट को तेज करती नजर नहीं आ रही। तो क्या प्रदेश की गुटबाजी और खींचतान भरी राजनीति में मानवता की बलि दी जाएगी?

इस बलि की जिम्मेदारी का ठीकरा किसी एक या दो नेता पर फोड़ना तो ठीक नहीं और न ही इंदौर की अफसरशाही को प्रभावी कर किसी एक नेता की बपौती बनाना न्याय है। समस्या की जड़ तो प्रदेश की वर्तमान शासन प्रणाली ही है।

इस पर सोए हुए विपक्ष का अतिसक्रिय होना… तो फिर इंदौर का ये मुद्दा तो अब सामान्य नहीं रहा भिया। राजनीतिक गुटबाजी के चलते पानी में कोई केमिकल लोचा तो नहीं हुआ, जिसे सोया हुआ विपक्ष भुना रहा? ‘पानी साफ था। यदि गंदा होता तो कोई पीता ही नहीं…’ आकाश विजयवर्गीय के इस बयान को भी ट्रोल किया जा रहा है।

इसकी गहराई को समझना होगा, क्योंकि इंदौर में पानी का इतना अकाल नहीं पड़ गया था कि मजबूरन लोग गंदा पानी ही पीते। तात्पर्य ये है कि पानी गंदा दिख ही नहीं रहा था। अन्यथा जनमानस वो पानी पीते ही क्यों?

समस्या इस प्रणाली ने पैदा की है, जिस पर लगाम को लगाना होगी। अफसरशाही की भेंट सिर्फ मंत्री या महापौर को चढ़ाना उचित नहीं होगा। इंदौर को किसी एक नेता की बपौती नहीं बनाया जाए। स्थानीय नेतृत्व को फ्री-हैंड तो देना होगा। इस प्रणाली को तोड़ना होगा।

अन्यथा कहीं इस प्रणाली को जनमानस अपना प्रारब्ध मान स्वीकार कर लेगा और सोया हुआ विपक्ष भी सक्रिय होता रहेगा। अंततोगत्वा प्रदेश में जनमानस इसे प्रारब्ध मान बैठ जाएगा और भाजपा की गुटीय शासन प्रणाली पर बदनुमा दाग फिर कभी धुल न पाएगा। प्रणाली का ये चलायमान चक्र चलता रहेगा, तब अंततोगत्वा आने वाले समय प्रदेश भाजपा का बुरा प्रारब्ध जरूर बनाएगा।

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