गोवंश की मौत का जिम्मेदार कौन: सवाल सिस्टम से गोशाला तक
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट।
राजधानी भोपाल की अरवलिया गोशाला में छह गोवंशों (गोमाता) की मौत कोई हादसा नहीं, बल्कि उस सड़े हुए सिस्टम की देन है, जिसे बचाने में प्रशासन के साथ-साथ तथाकथित ‘गो-रक्षक’ भी खामोशी से साझेदार बने रहे। सवाल सिर्फ यह नहीं कि गोवंश क्यों मरे, असली सवाल यह है कि इतनी मौतों से पहले गो-रक्षक हिंदू संगठनों की आवाज क्यों नहीं उठी?
गोशाला में गोवंश भूख से मरते रहे और हिंदू संगठनों को खबर तब लगी, जब लाशें गिनने का वक्त आ गया। जिंदा गायों की हालत पर ये संगठन अंधे रहे, लेकिन मरी हुई गायें उन्हें आंदोलन का मौका दे गईं। क्या गो-रक्षा अब जीवन से नहीं, बल्कि गौमाता की लाशों से जुड़ा हुआ एजेंडा बन चुकी है?
इन हिंदू संगठनों के नेता आज नगर निगम कार्यालयों के बाहर नारे लगा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि पिछले महीनों में वे कहां थे? जब गौशाला में चारे की कमी थी, जब गौमाता बीमार थीं, जब वह सड़कों लावारिस दम तोड़ रही थीं।
तब न कोई ज्ञापन दिया गया, न निरीक्षण हुआ, न कैमरे बुलाए गए। गौशालाओं में रोज घट रही त्रासदी इन संगठनों की प्राथमिकता में क्यों नहीं होती? सबसे बड़ा पाखंड सड़कों पर दिखता है। मध्य प्रदेश की सड़कों और हाइवे पर करीब 10 लाख गोवंश भटक रहे हैं।
हर साल सैकड़ों गायें वाहनों से कुचलकर मर जाती हैं। तब हिंदू संगठनों की आस्था कहां चली जाती है? तब न चक्का जाम होता है, न मशाल जुलूस, न मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन। क्या सड़क पर मरती गोमाता, आंदोलन के लायक नहीं होती?
गो-रक्षा के नाम पर राजनीति करने वालों को यह भी बताना चाहिए कि उन्होंने कितनी गौशालाओं का ऑडिट कराया? कितनी बार फंड के इस्तेमाल की पारदर्शिता मांगी? कितने ठेकेदारों और अफसरों के खिलाफ एफआईआर की मांग की? क्योंकि संघर्ष करना आसान नहीं, शोर मचाना, हो हल्ला करना आसान है।
और यह भी सवाल है कि गोशालाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर इन संगठनों की जुबान क्यों सिल जाती है? क्या इसलिए कि कई गोशालाएं इन्हीं संगठनों की ‘छत्रछाया’ में चलती हैं? क्या इसलिए कि सवाल उठाने से अपने ही लोग कटघरे में आ जाएंगे? गो-रक्षा अगर सचमुच धर्म है, तो उसमें आत्मालोचना भी होनी चाहिए। लेकिन यहां तो गो-रक्षा की आड़ में सुविधा का गठजोड़ दिखता है।
सरकारी स्लॉटर हाउस में गोमांस मिलने पर ये संगठन आग-बबूला हो जाते हैं, लेकिन सरकारी गोशालाओं में गायों की भूख पर उनकी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखती? यह दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या है? एक तरफ नारे, दूसरी तरफ चुप्पी और बीच में मरती-कटती गौमाता। सच यह है कि हिंदू संगठनों का एक बड़ा वर्ग अब गो-रक्षा नहीं, इवेंट आधारित आक्रोश में विश्वास करता है।
जहां कैमरा होता है, वहां इनका गुस्सा दिखाई देता है। जहां लगातार निगरानी चाहिए, वहां मौन है। यही वजह है कि प्रशासन भी इन्हें गंभीरता से नहीं लेता। क्योंकि उसे पता है, शोर, हो-हल्ला कुछ दिन होगा, फिर सब शांत। तो गोवंश की मौत का जिम्मेदार कौन है?
प्रशासन दोषी है। सिस्टम दोषी है पर हिंदू संगठनों की अवसरवादी संवेदनशीलता भी बराबर की दोषी है। अगर ये संगठन जिंदा गोमाता के लिए उतने ही मुखर होते, जितने मरी के लिए तो शायद अरवलिया गौशाला में छह लाशें नहीं गिननी पड़तीं।
गोरक्षा नारा नहीं, गहन-गंभीर जिम्मेदारी है। और जिम्मेदारी कैमरे के सामने नहीं, गोशालाओं और सड़कों पर लावारिस बिचरती गोमाता की सेवा करके निभाई जाती है।
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