‘सरकार' की या संघ की प्राधिकरण की कुर्सी किसकी: सूर्य हुए उत्तरायण, क्या अब होंगी निगम मंडल में नियुक्तियां
KHULASA FIRST
संवाददाता

‘पार्टी विथ ए डिफरेंस' में महज एक नियुक्ति पर इंदौर में फिर शुरू हुआ गुटीय घमासान
सबकी नजरें मुख्यमंत्री पर, इस बार आरएसएस का भी बताया जा रहा दखल
जमीन के धंधे के सिरमौर शहर इंदौर में प्राधिकरण की कुर्सी को लेकर हर नेता लालायित
‘घर बैठे' नेता भी उम्मीद से, युवाओं में उत्साह ज्यादा, विजयवर्गीय की भी घेराबंदी
सरकार ने ‘जी' लिए दो साल, निगम, मंडल, प्राधिकरणों को क्या मिल पाएगा एक भी कार्यकाल?
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
वैसे तो उम्मीद कम ही है कि ‘भागीरथपुरा जलकांड' की छाया में डॉ. मोहन सरकार इंदौर को पटाखे फोड़ने व जश्न मनाने का कोई मौका देगी। बावजूद इसके इंदौर विकास प्राधिकरण में अध्यक्ष की नियुक्ति की खबरें तेज हो गई हैं। अकेले ये नियुक्ति नहीं होना है।
प्रदेश के अन्य निगम, मंडलों में भी राजनीतिक नियुक्तियां होना हैं। मोहन सरकार 2 साल का कार्यकाल पूर्ण कर चुकी है। लिहाजा ये तय हुआ है कि इन निगम मंडल व प्राधिकरणों को भी कम से कम एक कार्यकाल, यानी 3 साल तो काम करने का मौका मिले।
मोहन सरकार इसे लेकर गंभीर भी है। वह शिवराज सरकार की तरह इन नियुक्तियों को सत्ता के समीकरणों के तहत अटकाकर बैठना नहीं चाहती। सरकार ने पार्टी संगठन के साथ एक मोटा-मोटा फ्रेमवर्क कर भी रखा है। दिल्ली दरबार से हरी झंडी भी ले ली गई है।
लिहाजा हलचलें तेज हुई हैं कि मकर संक्रांति तक रोकी गई इन नियुक्तियों की अब कभी भी घोषणा हो जाएगी। लेकिन ‘जलकांड' के जिंदा रहने व इससे जुड़े राहुल गांधी के दौरे के कारण इसमें इंदौर को भी खुश होने का मौका मिलने के आसार फिलहाल कम ही नजर आ रहे हैं। हां, ‘जल आपदा' से ध्यान हटाने के लिए ये हो भी सकता है कि इंदौर की ये अहम नियुक्ति हो भी जाए।
भगवान भुवन भास्कर के उत्तरायण होते ही जिस तरह ऊष्मा रश्मियां तेज हुईं, वैसे ही मध्य प्रदेश की भाजपाई राजनीति में निगम, मंडलों व प्राधिकरणों में नियुक्तियों की उम्मीदें भी तीव्र हो गईं हैं। मोहन सरकार पर नियुक्तियों से जुड़ा पेंडिंग काम निपटाने का दबाव बिहार चुनाव के पूर्व से बना हुआ है।
मकर संक्रांति पर्व को इस काम का ‘संक्रांति काल' मानकर नियुक्तियों को टाल दिया गया था। जैसे ही मकर संक्रमण का ये त्योहार संपन्न हुआ, निगम मंडलों में नियुक्तियों की सुरसुरी फिर तेज हो गई है। इस सुरसुरी को प्रदेश से बल भी मिला है।
बताते हैं मोहन सरकार ने इस पर होमवर्क कर लिया है। ‘लाभ के पद' की इन नियुक्तियों को दो चरणों में पूरा किया जाएगा। एक अभी और दूजा होली या वर्ष प्रतिपदा, यानी हिंदू नववर्ष गुड़ी पड़वा के आसपास।
यूं तो ये काम समूचे प्रदेश में एक समान होगा, लेकिन प्रदेश की ‘राजनीतिक राजधानी' इंदौर में इसे लेकर सबसे ज्यादा हलचल है। ये हलचल प्रदेश के किसी नामचीन निगम-मंडल से ज्यादा इंदौर विकास प्राधिकरण के लिए है। राज्य की दावेदारी से ज्यादा स्थानीय स्तर पर इंदौर के नेता दमखम भर रहे हैं।
प्राधिकरण ‘कमाऊ पूत' है। लिहाजा सबसे ज्यादा उठापठक अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर है। मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा जमीन से जुड़े ‘जमीनखोरी' के काम इसी शहर में होते हैं।
‘धरती के धंधे' में भी इंदौर का नाम सेंट्रल इंडिया में अव्वल है। इस काम में प्राधिकरण की भूमिका अहम रहती है। इसलिए इंदौर विकास प्राधिकरण पर सबकी नजर है।
इस बार ये कुर्सी सरकार, यानी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पसंद की होगी या मातृसंस्था आरएसएस की? इस राजनीतिक नियुक्ति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम इस बार इसलिए सामने आ गया है कि बताया जा रहा है अध्यक्ष पद के दो दावेदार व्हाया आरएसएस इस ‘कमाई की कुर्सी' पर आना चाहते हैं।
अभी ये खुलासा नहीं हुआ कि इनमें से कौन दावेदार ‘प्रांत' के भरोसे किला लड़ा रहा है तो कौन ‘क्षेत्र' के स्तर पर? हालांकि आरएसएस ऐसे मामलों में दखल नहीं देता, लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में कुछ भी डंके की चोट कहा नहीं जा सकता। संघ कोटे के दावेदारों की बात पर कान धरे जाएं तो इस काम में एक निवृत्तमान व एक मौजूदा ‘भाईसाहब' से मदद का भरोसा है।
यूं तो इंदौर में हमेशा की तरह मुकेश राजावत से लेकर दीपक जैन और सुदर्शन गुप्ता से लेकर गोपीकृष्ण नेमा तक के नाम दौड़ाए जा रहे हैं। हरिनारायण यादव से जीतू जिराती के नाम भी हर बार की तरह आगे-आगे दौड़ाए जा रहे हैं, लेकिन भाजपा का तो शुरू से ये ही मिजाज रहा है कि जिसका नाम चला, वह ‘चला' ही जाता है।
लिहाजा कोई बड़ी बात नहीं कि इन सबसे हटकर कोई नया नाम सबको चौंका दे। यूं तो प्राधिकरण की कुर्सी पर मुख्यमंत्री की पसंद ही पहला व आखिरी विकल्प होता आया है। लिहाजा कुर्सी तो उसे ही मिलना है, जो ‘मोहन मन भाये'। अब इसमें कोई कितना ही संघ के दबाव प्रभाव की बात करें, लेकिन ये तय है कि अगर ऐसा होता भी है तो मुख्यमंत्री की रजा अहम फिर भी रहना है।
मुख्यमंत्री पर सबकी नजरें, आखिरी मुहर डॉ. यादव की ही लगेगी
वैसे भी मौजूदा सीएम पूर्व में अपने गृह नगर के प्राधिकरण में ये भूमिका निभा चुके हैं, तो वे अब अपने मुख्यमंत्रीकाल में ठोंक-बजाकर ही नियुक्ति को अहमियत देंगे। लेकिन एक बार फिर इंदौर की भाजपाई राजनीति में उबाल आया हुआ है।
हर बार की तरह फिर एक तरफ सब नेता हैं और एक तरफ कैलाश विजयवर्गीय। विजयवर्गीय की राह को रोकने के लिए परस्पर घोर विरोधी नेता भी एक साथ हो लिए हैं। हरिनारायण यादव को कैलाश कैंप का नाम प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन विजयवर्गीय व राजनीतिक मिजाज को जानने वाले इस नाम से भी इत्तेफाक नहीं रख रहे हैं।
नगर व जिला इकाई में अपनी पसंद की नियुक्तियों के बाद विजयवर्गीय की मंशा है कि प्राधिकरण में भी उनकी पसंद को तरजीह मिल जाए। अब सब कुछ मुख्यमंत्री डॉ. यादव पर है कि वे ‘अपने नेता' का इस मामले में ‘उज्जैन विकास प्राधिकरण' जैसा साथ देते हैं या नहीं।
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